Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract Inspirational


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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यशस्वी (14) ...

यशस्वी (14) ...

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सबकी पेट पूजा हुई थी। अब बारी 'भजन गोपाला' अर्थात यशस्वी-युवराज के प्रेम प्रसंग चर्चा की थी। सब बैठ व्यवस्थित हो चुके तब,

यशस्वी ने बताया - मुझे, जसलीन ने वीडियो कॉल पर लिया था। सामान्य कुशलक्षेम की बातों के उपरांत, जसलीन ने अपना मोबाइल युवराज को दिया था। युवराज ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया था फिर सकुचाते हुए कहा - मेरे परिवार में, मेरी शीघ्र शादी का, मुझ पर दबाव है। 

जसलीन ने आपसे हुईं सभी बातें मुझे बताईं हैं। जिसे जान लेने के बाद मैं जसलीन से विवाह को सहमति देने जा रहा हूँ। इसके पूर्व मुझे, आपसे इन दो प्रश्नों के उत्तर चाहिए हैं। क्या, आपने मुझे अपने योग्य नहीं समझा है ? और क्या, आपको ऐसा लगा कि आपसे, विवाह पश्चात मैं आपकी महत्वाकांक्षाओं की दिशा में बढ़ने में बाधा डालूँगा ?

इस पर यशस्वी ने यह उत्तर दिया - युवराज, आप मेरे ही नहीं, विवाह योग्य किसी भी लड़की के लिए, योग्य वर हो सकते हो। आपको जितना मैंने जाना है एवं जितना जसलीन ने आपके बारे में बताया, उससे मुझे मेरी उन्नति को लेकर संशय नहीं है कि आप, इसमें सहायक ही होते। तब भी आपसे, विवाह न करते हुए मैं, प्रेम को आत्मिक स्तर पर ही रखूँगी। वास्तव में, मेरे किये जा रहे कार्य, मेरे माने गए सामाजिक दायित्व की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मेरे इस दिशा में किये जा रहे पुरुषार्थ मेरा पूरा समय ले लेते हैं। अतएव आपसे विवाह करने की दशा में संभावना होती है कि मैं आपके प्रति या कार्य के (दोनों में से एक या दोनों के) प्रति अन्याय कर बैठूँ। यह मेरे इंकार का कारण है। 

यशस्वी ने आगे बताया कि - मेरे साथ संकोची रहे युवराज ने, फिर कोई और बात नहीं की थी। मेरा सच सुनकर, क्षमा सहित आभार मानते हुए, कॉल डिस्कनेक्ट किया था। यशस्वी के चुप होने पर प्रिया ने सबसे पहले कहा - यशस्वी, तुम चौबीस की हो रही हो। इस अवस्था में किसी लड़की की मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से विवाह करना उचित होता है। मेरे मत में, तुमने एक अच्छा वर, हाथ से निकल जाने देकर, ठीक नहीं किया है।  यशस्वी ने बताया - मेम आप एवं जीवनी दोनों नहीं जानते हैं कि मैंने किसी दिन अवसाद के वशीभूत, आत्महत्या करना चाही थी। ठीक उसी समय ईश्वर ने, (मेरी ओर इशारा करते हुए) सर को भेजा था इन्होंने मुझे नर्मदा में कूदने से पहले रोक लिया था। इसे सुन प्रिया और जीवनी ने तब मुझे हैरत से देखा, जिसे मैंने अनदेखा किया।

यशस्वी ने आगे कहा - यूँ मरते मरते बचा लिया जाना एवं सर का मुझे प्रदत्त मनोबल, व्यर्थ नहीं गया। यह सर भी नहीं जानते कि बाद में एक दिन, उसी स्थान पर नर्मदा किनारे मैं, फिर गई थी। तब नर्मदा के निर्मल प्रवाह को देखते हुए मैंने कल्पना की थी कि मैं उसमें डूब मर चुकी हूँ। और जो अभी प्रवाह को देख पा रही है वह, मेरी आत्मा है। तब मुझे कुछ बातों का स्मरण आया जिसे एक लेख में, मैंने पढ़ी थीं। लेख के अनुसारकामनाओं की पूर्ति न होना, मनुष्य में अवसाद का कारण बनता है। मनुष्य में कामनायें, आत्मा के शरीर संयोग से उत्पन्न होती हैं। अगर शरीर नहीं तो रूहें, कामनाओं एवं इनके अपूर्ण रहने से, अवसाद के खतरे से मुक्त रहती हैं। यह विचार आने के बाद मैंने, अपनी समस्त कामनाओं को हृदय से अलग कर नर्मदा प्रवाह के हवाले कर दिया। उस दिन के पश्चात मैं, एक रूह जैसी ही जी रहूँ। मैं, करती बहुत कुछ हूँ मगर उसमें व्यक्तिगत कामनायें कुछ नहीं होती हैं। हम सभी उसे मुग्ध से होकर सुन रहे थे। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये शब्द किसी देवी के श्रीमुख से झर रहे हैं। यशस्वी ने कुछ पल की ख़ामोशी के बाद फिर कहना शुरू किया - उस दिन जब, जसलीन मेरे पास आई और उसने अपनी दास्तान सुनाई तब, सर्वप्रथम मैंने, उसमें-अपने में तुलना की। मैंने पाया कि मैं, निज कामना रहित हूँ जबकि स्वाभाविक रूप से जसलीन में, कामनायें हैं। इससे मैंने सोचा कि युवराज का ना मिलना, मुझे प्रभावित नहीं करेगा। मगर जसलीन के लिए गहन अवसाद का कारण हो जाएगा। 

उस समय मुझे, सर के द्वारा, मुझ पर किया उपकार याद आया। मैंने अनुभव किया कि सर का आभार जताने का, यह एक अच्छा अवसर है। इस विचार के आने से मैंने मासूम-सुंदर जसलीन को संभावित अवसाद से बचाने का निर्णय लिया। फिर युवराज के लिए अपने प्यार को नकारते हुए सहर्ष ही मैंने, जसलीन एवं युवराज के साथ हो सकने का मार्ग सुलभ कर दिया। 

जो कहना था यशस्वी कह चुकी थी। हम तीनों ने लगभग एक साथ अपनी अपनी रोकी हुई सी श्वाँसें, छोड़ी थी। जीवनी ने पूछा - यशस्वी, माना तुमने एक संकल्प लिया हुआ है। फिर भी जीवन में अवसर आते हैं जब मनुष्य, लिए गए संकल्प को निभाने में कठिनाई अनुभव करता है। ऐसे अवसर पर, अपने संकल्प से डिग जाने से, तुम खुद को कैसे रोक पाती हो? यशस्वी ने उत्तर दिया - मैं तब सोच लिया करती हूँ कि सर, उस दिन मुझे बचाने नहीं आये थे एवं मैं मर चुकी हूँ। आप समझ सकती हो, मरने के बाद कोई व्यक्ति क्या पा लेता है और क्या खो देता है! ऐसे मेरा संकल्प बना रहता है। यशस्वी से यह सब सुनकर, स्वयं को अत्यंत बुध्दिमान मानने वाला मैं, यशस्वी के सामने स्वयं को, हीन अनुभव कर रहा था।

तब प्रिया यशस्वी से पूछ रही थीं - यशस्वी, मगर तुम्हारी निरंतर अर्जित की जा रहीं, व्यवसायिक सफलताओं से ऐसा लगता नहीं कि तुम में, कोई आकाँक्षायें शेष नहीं?यशस्वी ने उत्तर दिया - मेम, आकाँक्षायें तो मुझमें हैं मगर वे निज अपेक्षाओं से रहित हैं। अर्जित व्यवसायिक सुदृढ़ता, मुझे मेरे संकल्प अनुरूप सामाजिक सरोकारों को निभाने का माध्यम होती है। क्या हैं, हमारे सामाजिक सरोकार इस हेतु, आपने एवं सर ने ही, मेरा मार्गदर्शन किया होने से, इसे आप भली प्रकार से आप जानती हैं।  यशस्वी ने उठ रही हर बात का जैसा समाधान दिया, उससे हम तीनों में कोई तर्क शेष नहीं रहे थे। अंत में उस दिन, मैंने निष्कर्ष रूप में, अपने शब्द यूँ कहे - यशस्वी एवं जीवनी दोनों के लिए मेरा कहना है कि प्रिया एवं मैंने, जीवन को जितना समझने में 50 वर्ष लगाये हैं, हमसे चर्चा में रहते हुए आप दोनों, अपने ट्वेंटीज में उसके सार तत्व समझ रही हो। मुझे संशय नहीं कि ऐसा समझ लेने एवं ऐसे संकल्प सहित आप दोनों, लगभग 25 वर्ष पूर्व ही, वैचारिक (समृध्दता) रूप से हमारे, समकक्ष पहुँच चुकी हो। 

इस अवस्था में हमारी क्षमतायें जब चुक रही हैं तब, तुम दोनों की क्षमतायें चरम पर पहुँच रही है। स्पष्ट हैं हम देखने को शायद जीवित न रहेंगे मगर कुछ वर्षों में, यह दुनिया तुम दोनों के, मानव सभ्यता के विकास में महान योगदानों की साक्षी होगी।  फिर, अनायास मिले अवसर में हुए, यशस्वी पर मेरे उपकार का, गौरव अनुभव करने वाली अवस्था में मुझे छोड़, यशस्वी जा रही थी।

प्रिया और जीवनी उसे बाहर तक विदा करने गईं थीं ... 



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