Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Abstract


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Vijay Kumar उपनाम "साखी"

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व्यर्थ का दिखावा

व्यर्थ का दिखावा

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मेरा नाम राजू है।में एक छोटे से गांव मोहनपुर का निवासी हूं।मेरा पापा एक किसान है।हमारे परिवार की स्थिति मध्यमवर्गीय है।मेरे पापा मुझे उच्च शिक्षा के लिये मोतीनगर भेजते है।में वहां कमरा किराये लेकर,वहीं रहकर पढ़ाई करने लगा।शुरुआत में,में गांव का एक सीधासाधा राजू था।में भी शहर के रीतिरिवाज धीरे-धीरे सीखने लगा।शहर में गांव की तुलना में दिखावा ज़्यादा किया जाता है।में भी धीरे-धीरे दिखावा करने के तरीके सीखने लगा।शहर में कोई मेहमान आता तो दिखावे के लिये नाश्ते के रूप में काजू,बादाम,पिश्ता,दाख आदि रखते थे।ये नाश्ता उनकी अमीरी को दर्शाता था।शहर में कोई भी नाश्ता करता तो मात्र

दो,पांच टुकड़े ही खाते थे।में भी अपनी पॉकेट मनी से थोड़ा-थोड़ा बचाकर इस तरह का दिखावा करने लगा।एकदिन मेरे गांव से मेरे तीन दोस्त सोनू,नानू,कालू मोतीनगर आये।मेरे पापा ने उनके साथ मेरी पढ़ाई के लिये कुछ पैसे भेजे थे।मैंने शहरी दिखावे के रूप में उनके सामने काजू,बादाम,

पिश्ता,दाख का नाश्ता रखा।पर में भूल गया,ये मेरे दोस्त गांव के है।उन तीनों ने सारा नाश्ता खत्म कर दिया और बोले दोस्त तू बहुत अच्छा है,अब हम तीनों तो दो दिन तक तेरे पास ही रहेंगे और तू हमे शहर घुमाना।उनके ये शब्द सुनकर मेरा तो सर चकराने लगा।मैंने बेमन से कहा ठीक है,रुक जाना।मेरे गांव के वो तीनो दोस्त दो दिन ही रहे पर उन तीनों ने घूमने-फिरने में मेरा सारा पैसा खत्म करवा दिया क्योकि उनके पास पैसे नही थे।में चाहकर भी उन्हें कुछ कह न सका।मेरे तीनो दोस्त वापिस गांव गये तब जाकर मैंने राहत की।कुछ समय निकल गया।मुझे सर्दी की छुट्टियाँ हो गई।में इन छुट्टियों में गांव नही जाता था।में वहीं रहकर पढ़ाई किया करता था।पर इस बार मेरा स्वास्थ्य सही नही था।मुझे बुख़ार था और तेज सिरदर्द भी था।मैंने सोचा चलो इसबार गांव चलते है,स्वास्थ्य लाभ लेते है साथ मे अचानक जाकर पापा-मम्मी को सरप्राइज देते है।में अगले ही सुबह मेरे गांव मोहनपुर के लिये रवाना हो गया।पर यह क्या,जैसे ही घर पहुंचा वहाँ तो ताला लगा था।मैंने पापा को फ़ोन किया तो उन्होंने बताया,बेटा हम तो तेरे ननिहाल आ गये है।तेरे मामा की तबियत सही नही है

हमे आने में 8-10 दिन लेंगे।क्योकि तेरा ननिहाल बहुत दूर है।औऱ साथ ही बरसात ज्यादा होने से बसों का आवागमन इधर बन्द है।में रुआंसा हो गया।उधर से मुझे मेरे दोस्त सोनू,नानू और कालू गुजरते हुए दिखाई दिये।उनकी मेरे पर जैसे ही नज़र पड़ी।वो दौड़कर मेरे पास आये।वो बोले मित्र तू कैसा है।तेरे घर पर ताला क्यों लगा हुआ है।मैंने कहा पापा-मम्मी ननिहाल गये हुए है और दस दिन बाद लौटेंगे।में वापिस मोतीनगर जाने की सोच रहा हूं।सोनू,नानू और कालू तीनों एकसाथ बोले,नही मित्र कुछ दिन तो तू यही हमारे साथ ही रुक जा फिर चला जाना।कालू ने हाथ लगाकर देखा राजू तुझे तो बहुत तेज बुखार भी है।अब हम तेरी एक न सुनेंगे।तेरी बुखार उतर जाये फिर तू चाहे चला जाना।लेकिन अभी तो हम तुझे नही जाने देंगे।मरता क्या न करता,एक तो मुझे बुखार था ऊपर से सिरदर्द भी बहुत तेज हो रहा था।में चुपचाप उनके साथ चल दिया।में कुछ कदम चला ही था की कमजोरी,थकान, बुखार,सिरदर्द की वजह से गिर पड़ा और बेहोश हो गया।तीनो मित्र मुझे पास के एक कस्बे के अस्पताल में ले गये।करीब एक घण्टे बाद मुझे होश आया।मैंने अपने को अस्पताल के खटिये पर सोते हुए पाया।उस समय सोनू मेरे पास था।सोनू ने बताया तेरे खून की कमी हो गई थी।इस वजह से तुझे चक्कर आ गये।साथ ही तेरे डॉक्टर साहब ने तेरे मलेरिया बताया है।पूरी तरह ठीक होने में 7-8 दिन लगेंगे।नानू और तेरा ब्लड ग्रुप एक ही है।वो तुझे खून दे रहा है,सोनू ने मेरे पास ही सोये हुए नानू की तरफ इशारा किया।इतने में थोड़ी देर में कालू खाना लेकर आ गया।बड़े प्रेम से तीनों मित्रो ने मुझे खाना खिलाया।तीनो मित्रो ने दिन-रात मेरी सेवा की।में जल्द ही ठीक हो गया।7 दिन बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई।में वापिस मोतीनगर आ गया।इसके कुछ दिन बाद पापा-मम्मी दोनों मुझसे मिलने वापिस आ गये।मैने पापा-मम्मी के चरण स्पर्श किये ही थे तभी पापा बोल पड़े बेटा,तेरे मित्र बहुत अच्छे है।में बोला वो तो है।पापा बोले वो पढ़े लिखे भले कम है पर वो दोस्ती निभाना जानते है।तुझे पता नही है,बेटा उन तीनों ने तेरे ईलाज के लिये अपनी बकरियां बेच दी है।जबकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है।ये सुनकर मेरी आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी।सही है पापा,वो तीनो महान है।में उनके जैसे दोस्त पाकर धन्य हुआ।गांवों में दिखावा नही होता है।वहां पर सच्चा स्नेह होता है।गांव के लोग नफ़ा-नुकसान नही जानते है।वो रिश्ता निभाने के लिये हद से गुजर जाते है,जैसा मेरे तीनो दोस्तो ने किया।मेरे गांव के दोस्तों,तुम अनमोल रत्न हो,कोहिनूर भी तुम्हारे आगे फ़ीका है।इसलिए कहते है जिंदगी जीना है गांव में जाओ

जिंदगी काटना है शहर आ जाओ

तुमको अकेला रहना है,

दिखावे की जिंदगी जीना है,

शहर मे जाकर तुम बस जाओ

सयुंक्त परिवार में तुमको रहना है,

गांव की माटी का तुम तिलक लगाओ!


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