Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Drama


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Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Drama


दृढ़ इच्छाशक्ति

दृढ़ इच्छाशक्ति

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विजयपुरी में वासु नाम का एक मंदबुद्धि बच्चा रहता था। उसके माता-पिता उसके जैसे नही थे। वे दोनों कुशाग्र बुद्धि के थे। वासु उनकी इकलौती संतान थी। उसकी माता उसे बहुत स्नेह से रखती थी। वो हमेशा कहती थी,तू एकदिन वासु बहुत बड़ा पुलिस अफसर बनेगा। वासु वर्तमान में कक्षा 7 का छात्र था। कक्षा हो या मोहल्ला हो सब उसका मजाक उड़ाते थे। वासु जी-तोड़ मेहनत करता,फिर भी वो पढ़ाई में बेहद कमजोर था। वह याद करता,पर वापिस भूल जाता। वह खाना खाता तो खाता ही जाता,बोलता तो बोलता ही जाता,उसे कुछ भी भान नही रहता था। फिर भी उसकी माँ सदा ही उसका हौंसला बढ़ाती और कहती तुम एक होनहार बच्चे हो,आज नही तो कल तुम भी अच्छे नम्बर लाओगे।

कुछ दिनों बाद जब उसके वार्षिक परीक्षा होती है,दुर्भाग्य से उसकी माता का देहांत हो जाता है। वासु बहुत रोता है क्योंकि इस दुनिया मे उसका एक सच्चा दोस्त उसकी माँ जो चली जाती है। वासु जैसे-तैसे परीक्षा देता है। हमेशा की तरह वह बहुत कम ग्रेड D से उतीर्ण होता है। पर अब उसे ढांढस बढ़ाने वाला कोई नही होता है। उसके पिता अक्सर अपने काम मे ही व्यस्त रहते है। सब उसको आसपास के गधा,बेवकूफ,मूर्ख आदि नामों से बुलाते है। अब वह कक्षा 8 में आ जाता है। एकदिन उसकी बुआ घर पर आती है,उसके पापा भी घर पर ही होते है। वो वासु को बहुत बुरा-भला कहती है। नालायक़,गधा कहीं का न जाने परिवार में किस को गया है। उसी दिन उसके पड़ोस वाले भी उसे ताने मारते है,जब उसके घर पर कोई नही होता है। वो सुनता है कि,ये लड़का

तो बड़ा मनहूस है,अपनी माँ को ही खा गया है। ये तो गधा है,लगता तो ये है कि,ये इनकी संतान ही नही है। इसके माता-पिता दोनों ही कुशाग्र बुद्धि के है,जबकि ये तो जड़ बुद्धि है। ये किसी सुअर की औलाद हो सकता है,इन शेरों की तो नही। वासु को उनकी बातें बड़ी गहराई तक दिल मे चुभ जाती है। वासु सबकुछ सहन कर सकता है,पर अपने माँ के बारे में कुछ गलत नही सुन सकता है।

उस दिन वो खाना भी नही खाता है। वो भगवान के सामने बहुत रोता है। वो कहता है,भगवान तूने मुझे मंदबुद्धि बनाया है,कोई बात नही। पर इन बुद्धिवालों को क्या हो गया है,जो मेरी माता-पिता के बारे में अनाप-सनाप बोल रहे है। में आज भगवान अपनी माँ की कसम खाके कहता हूं,में भी इस दुनिया को होशियार बनकर दिखाऊंगा। हर आदमी के जीवन मे कोई घटना ऐसी होती है जो जड़बुद्धि कालिदास को भी महाकवि कालिदास बना देती है। जिसके हाथ मे पढ़ाई की लकीर नही होती है,उसे संस्कृत का विद्वान पाणिनि बना देती है। वासु के साथ भी ऐसा ही होता है। वह अब इस घटना से पूरी तरह से बदल जाता है। वासु अब कम बोलता है और खाना भी कम खाने लग जाता है। वो अब अपनी पढ़ाई का कार्य,सीखने का कार्य नियमित रूप से करने लग जाता है।

कहते है बार-बार के अभ्यास से तो एक कोमल रस्सी के भी कठोर पत्थर पर निशान हो जाते है। वासु के साथ भी ऐसा ही होता है,उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति व बार-बार के नियमित पढ़ने के अभ्यास से वो धीरे-धीरे होशियार होने लगता है। वो उसी साल कक्षा 8 वीं में A ग्रेड से उतीर्ण होता है।

अब तो उसे पढ़ने का शौक़ ऐसा लगता है कि वो बहुत सी बार खाना-पीना ही भूल जाता है। वो कक्षा 10 में जिले की वरियते सूची में प्रथम स्थान प्राप्त करता है। ऐसे ही कक्षा 12 में वो राज्य स्तरीय वरीयता सूची में दूसरा स्थान प्राप्त करता है। उसकी माँ उसे सदा एक पुलिस अफसर के रूप के देखना चाहती थी। इसके बाद वह स्नातक की परीक्षा उतीर्ण कर ras की परीक्षा उतीर्ण करता है,उसमे वह rps यानी राजस्थान पुलिस सर्विस का चयन करता है।

इस प्रकार वो एक पुलिस अफसर बनता है। वो सबसे अपनी मां की तस्वीर के सामने फूट-फ़ूटकर रोता देख माँ,तेरा मंदबुद्धि बेटा आज एक पुलिस अफसर बन गया है। मैंने मां तेरा सपना साकार कर दिया है। इस प्रकार दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी किया जा सकता है। एक जड़ बुद्धि वासु भी पुलिस अफसर बन सकता है। इस दुनिया मे सब वैसे भी कद बुद्धि है जो अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं करता है। हर आदमी की योग्यता एक काले गहरे कुँए में यूँही बेकार पड़ी हुई है। इसको निकालने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। बहुत कम आदमी ही ऐसा कर पाते है। ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति लिये भी दिल पर ऐसी गहरी चोट का लगना आवश्यक है जो आपको कोयले से एक चमकता हुआ कोहिनूर हीरा बना सके।


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