Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Inspirational


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Vijay Kumar उपनाम "साखी"

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अपनी कमी की तलाश

अपनी कमी की तलाश

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मेरा नाम गोलू है।में हाजीपुर गांव में रहता हूं।मेरे घरवाले पापा,मम्मी,भैया,टीचर सब मुझे डांटते रहते है।यहां तक की पड़ोसी,मेरे दोस्त भी मुझे चिढ़ाते रहते है।जैसे-जैसे समय निकलता गया,उनका डांटना बढ़ता ही गया।बड़े भैया छोटी-छोटी बातों पर भी मुझे टोंकते रहते।पापा-मम्मी भी भैया का ही पक्ष लेते है।स्कूल जाता हूं तो टीचर मुझे टोंकते है।मेरे दोस्त मुझे अलग चिढ़ाते रहते है।मेरे दोस्त कहते है,तू तो अंधा है,तेरी तो छोटी-छोटी आंखे है।कोई गलती कर देता हूं,टीचर गधा कह देते है।दुबला-पतला हूं पड़ोसी मुझे अगरबती कहते है।धीरे-धीरे मुझमें हीन भावना आने लगी।में 18 साल का आते-आते बहुत अधिक अवसाद में आ गया था।में सोचने लगा मुझमे कोई गुण नही है,में निकम्मा हूं।में बेकार हूं,सब ही ऐसा कहते है।एकदिन तो घरपर जब कोई नही था तो मेरे मन मे आत्महत्या तक के विचार तक आने लगे थे।एकदिन पापा ने बिना बात ही मेरी पिटाई कर दी,उसदिन मुझे बहुत गुस्सा आया और में आत्महत्या के लिये भी घर से निकल गया था।हुआ यूं उसदिन पापा सो रहे थे,में उनके पलंग के नीचे से मेरी गेंद निकाल रहा था तो उनके पलंग के सहारे कोने में पड़ी हुई लकड़ी उन पर गिर गई जिससे उनकी नींद खुल गई।में वहां से भागा भी था पर पापा ने वो लकड़ी मेरे पर फेंक दी।वो मेटे सिर पर लगी,सिर से खून बहने लगा इसके बाद पापा ने और पिटाई की।मेरा मन उसदिन बड़ा दुःखी हुआ।में घर छोड़कर निकला ही था।एकछोटा बच्चा दिखा।उसके कपड़े फ़टे हुए थे।मैंने पूंछा तेरे माता-पिता कहाँ है।क्या तू स्कूल नही जाता है।उसने कहा मेरे माता-पिता अल्लाह को प्यारे हो गये है।वह मामा के पास रहता है वो उससे भीख मंगवाते है,फिर उसको दो वक्त का खाना मिलता है।फिर गांव से कुछ बाहर आया तो एक दिव्यांग आदमी को देखा, उसके एक पैर नही था वो बैसाखियों के सहारे चल रहा था,उसके हाथ में फोन था जिसमे वो अपने धंधे की बात कर रहा था।मैंने उनकी बात पूरी होने पर उनको नमस्ते किया और उनसे पूंछा "अंकलजी आपके पैर नही है,आपको दुख नही होता है।उन्होंने हंसते हुए कहा नही बेटा,अब इनकी आदत हो चुकी है।"यही कम बात नही है,खुदा ने हम धन-दौलत,शोहरत,मकान आदि दिये है।जिनके पास पूरा शरीर सलामत है,उनके पास भी इतनी दौलत,खुशियां नही है,जितनी मेरे पास है,फिर भला में क्यों दुखी होऊं।उन्होंने एक और अच्छी बात कही जो मेरे दिल पर छू गई।

"बेटा तक़दीर तो उनकी भी होती है,जिनके हाथ नही है।मंजिल तो उनको भी मिलती है जिनके पैर नही है।

वो मंजिल पर नही पहुंचते जिनके इरादे मजबूत नही है।"

इसके बाद में ग़ांव के बाहर माताजी के मंदिर में आकर बैठ गया।वहां पर मैंने एक चींटी को देखा वो अपने से कहीं गुना भार की कोई चीज ले जा रही थी।वहीं एक कोने में एक मकड़ी को देखा जो बार-बार अपना जाल बना रही थी,पास के एक कीड़े को खाने का प्रयास कर रही थी परन्तु वह उसमे सफल नही हो पा रही थी।आखिरकार 10 बार प्रयास करने के बाद वह सफ़ल हो गई।उसके ऐसा करने के बाद मेरे दिमाग मे भी एक बिजली चमकी।यदि एक मकड़ी बार-बार अभ्यास से जीत सकती है तो में क्यों नही?

एक चींटी अपने से अधिक वजन उठा सकती है तो में क्यों नहीएक दिव्यांग आदमी शोहरत हासिल कर सकता,खुश रह सकता है में क्यो नही

एक अनाथ बालक अपना पेट भर सकता है तो में क्यो नहीइसके बाद मैंने आत्महत्या का विचार त्याग दिया।

फिर घर की तरफ लौटने लगा और सोचने लगा।वो खुशनसीब होते है जिनका परिवार होता है।वो सबसे ज्यादा भाग्यशाली है जिसका शरीर और दिलोदिमाग स्वस्थ है।आदमी जितना चिढ़ता है उतना ही ज्यादा दुनिया चिढ़ाती है।जैसे ही हम किसी समस्या का डटकर सामना करते है,ये दुनिया झुक-झुककर सलाम करने लग जाती है।वैसे भी इस दुनिया मे कोई पूर्ण नही है सबमे कोई न कोई कमी होती है।वो हम पर निर्भर करता है,हम कमी को अपनी ताकत बनाते है या कमज़ोरी।हमारे पास तो साग़र छलक रहा है और हम है की नाले की तलाश करते है और उसमे डुबकी लगाते हैं।पहले गावस्कर थे तो हम सोचते थे की इनसे बड़ा खिलाड़ी नही आयेगा।मगर इनके बाद सचिन प्रसिद्ध हुए हैं।अभी विराट का नाम चल रहा है।कोई भी आदमी ठोकर खाने के बाद ही बड़ा आदमी बनता है।अपनी कमी की तलाश करो और अपनी कमी पर काम करो।वो दिन दूर नही जब तुम्हे ये दुनिया वीर कहकर बुलायेगी।


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