मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


4.6  

मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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विक्षोभ (कहानी)

विक्षोभ (कहानी)

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था तो सब कुछ वैसा ही, जैसा और दिनों की तरह होता था। उनकी पसंदीदा जगह थी। वही बड़ी सी झील। वही गुलमोहर का का पेड़ जिसकी छाया में बैठकर घंटों गप्पें किया करते थे। बातों के टॉपिक्स खत्म ही नहीं होते थे। डेट के लिए यह स्थान ऋचा को बेहद पसंद था। हवा का झोंका जब झील के पानी पर से गुजरता हुआ आता तो हल्की सी नमी भी साथ ले आता। गर्मी भी अपने शवाब पर थी। लेकिन आज ऋचा को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। 

उसने अपने आस-पास पड़े पत्थर का एक छोटा सा टुकड़ा उठाया और बेमन से झील के शांत जल में फेंक दिया। जिसके कारण पानी में गोल-गोल बेजान सी तरंगें उठीं और थोड़ी ही दूर जाकर समाप्त हो गईं। पता नहीं आज क्यों ये तरंगे उसको आकर्षित कर रहीं थी। अब की बार तो उसने पहले की अपेक्षा थोड़ा बड़ा सा पत्थर उठाया और फेक दिया । शायद अब की बार वह इन तरंगों को दूर तक जाते देखना चाहती थी। इस से पहले कि ये तरंगें अपना सफर तय करतीं, उसने पास ही छोटे से टीले पर बैठ वैभव से कहा।

हाँ तो वैभव तुमने, फिर यूएस जाने के निर्णय के बारे में क्या सोचा ?

तुम तो जानती हो ऋचा, ये मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है। कुछ दिन की ही तो बात है। फिर तुम्हारा वीज़ा बनवा लेंगें। तुम एक साल का समय दे दो। इस बीच सब कुछ सेटल हो जाएगा। फिर हम बहुत जल्द शादी कर लेंगे और फिर हमेशा के लिए यूएस में ही सेटल हो जाएंगे।

अब तक पानी में विक्षोभ के कारण पैदा हुई तरंगें तो बेजान पड़ चुकीं थीं लेकिन ऋचा के शांत चित्त में उठने वाली तरंगों ने कौतूहल मचा कर रख दिया। गुलमोहर से छनती हुई धूप से ऋचा के चेहरे पर पड़ रही चिन्ता की लकीरें वैभव को साफ दिखाई दे रहीं थीं। एक बार उसने समझाने की कोशिश की।

देखो ऋचा, अब ऐसा नहीं है कि विदेश आज के युग में कोई बहुत दूर है। या वहाँ से कभी भी आया जाया नहीं जा सकता। या फिर हम अजनबी बन कर रह जाएंगे। वहाँ हम जैसे भारत वर्ष के बहुत लोग हैं। जो दशकों से वहाँ रह रहे हैं। बल्कि उनमें से कुछ को तो ग्रीन कार्ड भी मिल गया है।

अब तक बदल का एक बड़ा सा टुकड़ा झील के ऊपर आकर ठहर गया था। जिसकी परछाईं पानी पर अलग ही दिखाई दे रही थी। तभी ऋचा ने कहा।

बात वह नहीं है वैभव, जो तुम सोच रहे हो। बात सिर्फ मेरी नहीं है। अब वह जमाना चला गया कि प्रेमी अपनी प्रेमिका को छोड़कर परदेश चला जाता था और वह उसके विछोह में तड़पती रहती थी। आज के ज़माने में तो बात करने के सारे साधन मौजूद हैं। दूरी भी अब कोई मायने नहीं रखती।

लेकिन क्या तुम ने कभी सोचा है कि हम दोनों अपने माँ-बाप की इकलौती संतानें हैं। हमारे इनके प्रति भी कोई कर्तव्य हैं। हमारे जाने के बाद ये लोग अकेले पड़ जाएंगे। आर्थिक रूप से भी ये लोग सम्पन्न हैं। इनको इस बात की चिंता नहीं है कि हम ढेर सारी संपत्ति कमा कर इनके चरणों में रख दें। बढ़ती उम्र के साथ इन्हें हमारी ज़रूरत हमेशा रहेगी।

ऋचा, ऐसा नहीं है। वे भी हमारे फैसले से खुश हैं। कल ही पापा अपने मिलने वालों को फोन करके बता रहे थे।

वे तो खुश होंगे ही। उन्होंने तो हमारी हर खुशी को ही अपनी खुशी मान लिया है। तुम अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को अपने देश के लिए ही क्यों नहीं शिफ्ट करते। "आत्म निर्भर भारत" के परिणाम शीघ्र ही आने लगेंगे। तब हमारे देश में भी यूएस की तरह ही युवाओं को अवसर मिलना शुरू हो जाएंगे। मैं तो कहती हूँ एक बार फिर अच्छी तरह सोच लो।

अब तक और भी बादलों के झुंड पूरी झील पर छा चुके थे। और देखते ही देखते बड़ी-बड़ी बूंदों ने पानी में अनेक छोटी-छोटी तरंगें पैदा कर दीं थीं जो एक दूसरे से टकरा रहीं थीं।

ऋचा, अब तुम कहती हो तो मुझे एक बार फिर से सोचना पड़ेगा। चलो यहाँ तो बारिश भी होने लगी। 

हम कार में चलकर बैठते हैं।


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