मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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कसम (कहानी)

कसम (कहानी)

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"तुम साईकिल ठीक से क्यों नहीं चलाते? कभी तुम्हारा हैंडल इधर जाता है तो कभी उधर। इतने बड़े होगए, सीधी साइकल क्यों नहीं चलती तुमसे?"

" साईकिल तो ऐसे ही चलेगी दीदी, तुम भी तो सीधी नहीं बैठतीं कैरियर पर। कभी इधर झुक जाती हो, तो कभी उधर। तुम्हें पता है, अभी सीट पर बैठकर मेरे पैर पूरा पैडल नहीं मार पाते न। और फिर कहीं तुम्हें गिरा दिया तो मम्मी की मार अलग खाना पड़ेगी। इसीलिये तो कैची चलाता हूँ।"

" एक बात बताओ, थोड़ी देर का तो स्कूल का रास्ता है। तुम पैदल ही क्यों नहीं आ जातीं? पता है, छुट्टी के बाद मैं अपने दोस्तों के साथ नदी के पुल पर साईकिल चलाने नहीं जा पाता तुम्हारे कारण।"

" मम्मी ही तो भेजतीं हैं तुम्हारे साथ, जबरदस्ती ! मैं तो अकेली ही आ-जा सकतीं हूँ स्कूल। मुझे भी अपनी सहेलियों के साथ आना रहता है बातें करते हुए। तुम्हारे चक्कर में फस जातीं हूँ।"

ये कोई एक दिन की बात नहीं थी। रोज़ की बहस थी उन दिनों, जब मैं आठवीं में था और दीदी दसवीं कक्षा में। कभी-कभार, ये लड़ाई मम्मी के सामने और उग्र हो जाती थी। और मैं कह देता था, -" देखना तुम्हारी शादी के बाद मैं कभी तुम्हें लेने जाऊँ तो कहना। "

और वह भी गुस्से से बोल देती ..." हाँ, मेरी शादी हो ही जाएगी तो तेरे साथ जाने की ज़रूरत भी क्या? मत दिखाना अपनी सूरत कभी।"

पच्चीस वर्ष बाद परिस्थितियां बदल चुकी थीं। शादी के कुछ दिन बाद ही जीजा जी का इसी शहर में तबादला हो गया। अब हम लोग एक ही कालोनी निवासी हैं। मम्मी-पापा तो अब रहे नहीं। हर दुःख-दर्द में दीदी एक चट्टान सी बनकर, खड़ी नज़र आतीं हैं। बच्चों की डिलीवरी से लेकर शादी-ब्याह तक। वक़्त जरुरत पर घर-बाहर की पूरी ज़िम्मेदारी का निर्वहन। और तो और हर ख़ुशी के मौके पर तैयार होकर सबसे आगे-आगे नेग पर अपना अधिकार जमाते हुए।अब तो रोज़ सुबह-सुबह कॉलोनी के गार्डन में भी मिल जाती है टहलते हुए। 

जैसे मुस्कुराती हुई कह रही हो, "तेरी क़सम झूठी निकली न आवेश?"


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