Deepak Kaushik

Abstract


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उस जंगल में

उस जंगल में

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"अगर ऐसा है तो केवल एक ही टार्च जलाओ। इस तरह तीन टार्चे काम लायक रहेंगी।"

आनंद पहली बार बोला।

रवि ने टार्च निकाल कर जला ली। टार्च की रोशनी चारों तरफ फेंकने के बाद उन चारों ने आगे कदम बढ़ाया। कुछ दूर जाने के बाद रवि ने कहा-

"इस जगह पर अजीब सा लग रहा है। कुछ रहस्यमयी सा है। कुछ डर भी लग रहा है।"

"मुझे भी कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है।"

सुमित ने कहा। हालांकि ये चारों ही बहुत ही साहसी थे। फिर भी जंगल के इस हिस्से में कुछ तो था जो इन चारों को डरा रहा था।

"यही हाल मेरा भी है। मुझे भी सिरहन महसूस हो रही है।" कुशल ने कहा।

"मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए हैं।" आनंद बोला।

"कुछ भी हो। हम लोग जंगल में आ फंसे हैं। या तो बाहर निकलने का रास्ता खोजना होगा या फिर ऐसी जगह जहां आग जलाई जा सके। वो भी जितनी जल्दी हो सके।" कुशल ने कहा।

कुछ देर तक चारों चुपचाप आगे बढ़ते रहे। अचानक एक जगह पर पहुंच कर रवि ने टार्च बंद कर दी।

"टार्च क्यों बंद कर दी।" कुशल ने पूंछा।

"सामने देखो आग जलती दिखाई दे रही है।"

"हां! है तो। चलो चलकर देखते हैं। आग है तो कोई मनुष्य होगा ही।"

"हां, चलो।" बाकी तीनों जोश में भरकर एक साथ बोले।

चारों मित्र आग को लक्ष्य करके आगे बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वे आग के करीब आ रहे थे वैसे-वैसे रहस्य भी बढ़ता जा रहा था। एक अंजान खतरे का अहसास बढ़ता जा रहा था। मगर वे करते भी क्या? इस भयानक जंगल में रात के समय जाते कहां? चलते-चलते अचानक सुमित ठिठका। उसे ठिठकता देख अन्य तीनों भी रुक गये।

"क्या हुआ? रुक क्यों गए?" आनंद ने पूछा।

"ऐसा लगता है जैसे कोई हम लोगों के साथ चल रहा है। कोई लगातार हम पर निगाह रखे है।"

कुशल ने ध्यान दिया।

"हां, सचमुच। यहां आसपास जरूर कोई है।" 

कुशल फुसफुसाया। 

"मैं तो कहता हूं कि यहां से वापस लौट चलो।" आनंद बोला।

"वापस कहां जायेंगे। इस जंगल में भटकते-भटकते अंधेरा हो गया। कहीं आग जलाने तक की जगह नहीं मिली। अब तो कुछ भी हो जाये, हमें उस आग तक पहुंचना ही होगा। इस भयानक जंगल में आशा की यही एक किरण है।"

कहकर कुशल आगे की तरफ बढ़ गया। उसके आगे बढ़ते ही अन्य तीनों भी चल पड़े। कुछ भी हो, कुशल की बात में दम था। इस आग की तरफ़ बढ़ने के अलावा और कोई चारा नहीं था। कुछ दूर और चलने के बाद कुशल ने पुनः कहा-

"यहां कुछ बदबू सी आ रही है।"

"हां, जैसे कोई लाश सड़ रही हो।" आनंद बोला।

"साथ ही शराब जैसी गंध भी है।" सुमित बोला।

चारों उस जलती आग के पास पहुंच गए। यहां पर सिर्फ एक ही व्यक्ति था। एक भयानक आकृति वाला साधू। आग के समीप पद्मासन में बैठा था। उसके जटा-जूट को देखकर लगता था कि शायद इसके बालों में कभी कैंची नहीं चली होगी। बालों में कभी तेल भी नहीं डाला गया होगा। न कभी उन्हें धोया गया होगा। वह बैठे हुए भी अतिविशाल दिख रहा था। यदि वो खड़ा हो जाए तो शायद साढ़े छः फीट से कम ऊंचा नहीं होगा। शरीर गठा हुआ था। जो उसके अति शक्तिशाली होने का प्रमाण दे रहा था।

"आओ! आओ!! मैं तुम्हीं लोगों की राह देख रहा था।"

चारों ने एक-दूसरे का मुंह देखा। 

"आप हम लोगों को जानते हैं।"

वो हंसा। उसकी भीषण हंसी जंगल में दूर-दूर तक फैल गई। 

"मैं सब कुछ जानता हूं। तुम लोग समझते हो कि तुम यहां अपने आप आये हो। नहीं! तुम लोगो को मेरे दूतों ने यहां तक पहुंचाया है।"

"आपके दूत? मगर आप तो यहां अकेले हैं।" सुमित बोला।

वो फिर हंसा। उसकी हंसी ने फिर इन चारों के भय को बढ़ाया।

"मैं यहां अकेला नहीं हूं। कम से कम तीस-बत्तीस लोग यहां मौजूद हैं। हां! वो तुम लोगों को दिखाई नहीं देंगे।"

साधू ने सामने रखे नरकपाल को उठाकर मुंह से लगा लिया। कपाल में शायद शराब भरी थी। वो उसे गटागट पी गया। जब उसने कपाल मुंह से हटाया, उसकी पहले से सुरक्षा बड़ी आंखें और ज्यादा बड़ी और सुर्ख हो गई। जैसे उसकी आंखों में खून उतर आया हो।

"शराब पीते हो? पियोगे ?"

"मिल जाए तो जरूर पी लेंगे। मगर आप के पास इतनी शराब कहां होगी।" कुशल ने कुछ सोचकर कहा।

"निकुंभा के दरबार में किसी चीज की कमी नहीं है। वो पियो।"

साधू ने अपने पीछे रखे एक झोले से शराब की बोतल निकाल कर सामने रख दी। प्लास्टिक के चार गिलास भी दिये। पानी भी वहीं मिल गया। चारों ने एक-एक पैग बनाकर पिया। इस पैग ने इनके शरीर में थकान को मिटाकर नये जोश का संचार किया। साधू ने इन्हें खाने के लिए तली हुई मछली भी दी। 

"चलो तुम लोगों को निकुंभा के दर्शन कराऊं।"

"हम लोग भगवान में विश्वास नहीं करते। इसलिए दर्शन करने कहीं नहीं जाएंगे। यहीं से हाथ जोड़ लेंगे।"

"ऐसा सोचना भी मत। मां के दरबार में आकर दर्शन नहीं करोगे तो मां नाराज हो कर दण्ड दे देंगी। हां! यहां का एक नियम है कि दर्शन के लिए एक बार में एक ही व्यक्ति जाता है। मंदिर में आने और जाने के अलग-अलग रास्ते हैं। दूसरे रास्ते से बाहर होकर यहां तक आने में कुछ समय लगता है। इसलिए दस मिनट तक रूकने के बाद इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी। अगला व्यक्ति दर्शन के लिए जा सकता है।"


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