Sweety Raxa

Abstract


3.0  

Sweety Raxa

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उलझी हुई जिन्दगी

उलझी हुई जिन्दगी

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आज फिर उसी घर से आवज आ रही है। क्या तुम्हें घर वालों की फिक्र है अगर होती तो तुम यूं ना खाली हाथ वापस आती पता नहीं किस घड़ी मेंं तुझको हमने चुना । ये बात उसको कांटे की तरह चुभती है मगर वो कुछ नहीं बोलती, सोच लेती ये तो मेरी किस्मत मेंं है।


कुछ सालों पहले सरिता नजदीक के गावं में ब्याह कर गयी थी ।कितनी खुश थी और क्युं ना हो . उसने जो सपना देखा वो सच जो हो गया ,अब वो खुश है ।प्रदीप भी अच्छा लड़का है ।प्रदीप उसका पति है दोनो खुश थे नई नई शादी हुई थी जैसे हर किसी के मन में होता है वेसे सरिता भी अपने आनेवाली जिन्दगी को लेके खुश थी । घर में सास -ससुर ,छोटी ननद भी जो हर बात पे मस्ती करते रहती । सरिता को और क्या चाहिए था। अब सब है प्यार करने वाला पति कुछ दिन यूं ही हंसते गुजर गया एक दिन पता चला सरिता मां बनने वाली है अब और क्या घर में खुशियों की बारिश होने लगी ।सभी खुश हो गये।


प्रदीप नजदीक की सहर में एक बैंक में क्लर्क का काम करता है ।रोज सुबह नौ बजे जाना शाम को पाँच बजे घर वापस आना उसके हर दिन का ड्यूटी है ।बस जैसे की रविवार को उसकी छूटी रहती है उसदिन वो सरिता और उसकी छोटी बहन को लेके घुमने जाता है ।आज भी वो उन दोनो को। लेके घुमने गया।क्युं की आज रविवार है सोचा आज दोनो को शहर घुमा के लाता हूं । वे सहर गये घूम ही रहे थे तभी उसकी बहन बोली भैया मुझे कपड़े खरीदने हैं, प्रदीप ने बोला चलो तुम दोनो।जावो दुकान पे, मैं थोडी आगे से माजी की दवा लेते आता हूं वे दोनो गाड़ी से उतर के कपडे़ की दुकान की तरफ गये प्रदीप अपनी गाड़ी स्टार्ट करके आगे की और चला जाता है ।


कुछ समय बाद सरिता और उसकी बहन अपनी मन पसंद कपडे लेने के बाद प्रदीप को फोन लगाती है । लेकिन ये क्या प्रदीप फोन नही उठाता उस तरफ से कोई अनजान सा अवाज।सुनाई देती है आवज में घबराहट पता चलती है वो अनजान आदमी कहता है यहां अभी अभी एक दुर्घटना हुई है क्या आप उनके घरवाले हो अगर हो तो कृपया सिटी हॉस्पिटल आजाईए हम उनको हॉस्पिटल लेके आये हैं ।इतना सुनते सरिता रोने लगती है उसकी ननद को बोलती है हमें जल्दी हॉस्पिटल पहुंचना है तुम्हारे भैया का एक्सीडेंट हुआ है ।इतने में वो दोनो निकल पड़ते है ।


रास्ते से रिक्शा़ किया और अपने दर्द को छुपाते वो हॉस्पिटल पहुंची फिर से प्रदीप के नम्बर पे फोन किया पुछा भाईसाब हम आ गये ,कहाँ पर रखा है ।सामने से बोलते हुए उनको।आई सी यु में लेके गये है आप आजाईए उपर।वो दोनो उपर जाते है ।तभी छोटी घर में फोन करके अपने पापा को सारी बाते बोलके रोने लगती है ।अब सरिता और उसकी बहन प्रदीप के पास पहुंच जाते हैं।सरिता अभी मां बनने वाली है इस वक़्त उसको जादा परेशान नहीं होनी चाहिए ।


मगर तक़्दीर का लिखा कोन टाल सका है ।कुछ समय बाद घर वाले भी आजाते है ।लेकिन सायद उसदिन सरिता के हसी खुशी जिन्दगी में ग्रहण लग चुकी थी।अब डॉक्टर बाहर आके बोलते है सॉरी उनकी सर पे चोट जादा लगने की करन खुन बह गया था हम बचा नही पाये फिर क्या था घरवाले रोने लगे लेकिन सरिता नी सब्द होग्यी ।अब वो रोने को भी चाहती है मगर उसको पता है उसके अनदर एक छोटी सी जान पल रही है ।अब उसको भी संभालन है ।वो करे तो क्या ।।

अब कुछ दिन बित चुका है प्रदीप के मौत का सब नॉर्मल होचुके हैं ।लेकिन सरिता अब पहले जैसे नही है ।कुछ दिन बचे हैं फिर वो मा बनजायेगी ।प्रदीप के बैंक वालो ने सरिता को काम देने का वादे किये है ।जैसे उसका डीलिवरि हो जायेगी सरिता काम पे जा सकती है।अब सरिता एक नन्ही सी प्यारी सी बची को जनम दिया है । अब वो घर और बची का खयाल रखती है प्रदीप एक ही लड़का था घरमें कमाने वाला अब सरिता पे सारी जिम्मा आग्यी ।अब वो ड्यूटी भी जाती है और बची और घरवालो का खयल भी रखती है ।फिर भी उसको कहिन कही उसकी सास बोल्देती है ।तू तो मनहूस है तेरी वजे से बेटा चलगया ।

सरिता सारी बातो को चुप चाप सहैती है । यहां तक जब ओ ऑफ़िस भी जाती है तो ये सुनती है काम पे ही जा रही होना गुलछरे उड़ाने कभी कभी वो सोच लेती है प्रदीप को और रोने लगती है ।फिर अपने बच्ची को देख के मुस्कुराते सारे गम भुल जाती है


कुछ एक दो महिने होने को है सरिता को पगार नही मिली है ।बैंक में पता नही क्यु कुछ लोगो की पगार रुकी हुई है ।घर में उसकी वजह से परेशानी हो रही है ।छोटी की पढाई बच्ची का दूध ,सास-ससुर की दवाई की पैसे हो नही पा रहे ।सरिता अपने कुछ ऑफ़िस के मित्रो से पैसे की सहायता मांगी थी मगर उतनी मिलना सकी अब जो मिला उसमें सरिता सबकी जरुरत मुताबिक सामान लेके जाती है लेकिन ये क्या उसकी सास उसको ताने सुना ही देती ।तू क्या काम करती भी है या नही जो तेरा ही पगार रोक लेते हैं । अब ये सब बात सुन के सरिता टूट जाती है । वो चाहती तो प्रदीप क देहांत के बाद जब उसके माता पिता उसको ले जाने आये तभी चलेजती ।मगर तब वो सोची वो अब प्रदीप की जिमेंदारी संभालेगी और वही पर रहेगी भी वो दसवीं तक पढी हुई थी।

बैंक बालो ने काम भी देने का वादे किये थे अब वो मां भी बनने वाली थी इस हालत में वो अपने ससुराल वालो को छोड़ के नही जाना उचित समझी।लेकिन उसकी भावनाओं को उसके ससुराल वाले सम्मान नही किये।फिर भी वो।अपने फर्ज को पुरी इमानदारी से निभाती ग्यी।


पत्नी का फर्ज बहू होने की फर्ज और एक मां का कर्तब्य ।समाज में एक नरी का फर्ज जो ये सभी नही समझ सकते ।क्य जब वो ओफिस गयी तोलोगो की नजरें उसको हवस की निगाहों से नही देखे देखे मगर वो वहाँ अपनी फर्ज की खातिर गयी थी तो उनसब की नजरों से अपनी मान सम्मान को बचा के काम करती है अब वो बिधवा है और जवान भी लोगों का नजर तो लगेगा सब मौका ही तलाशतें है कोई आजकल युं ही खुबसूरत और बिधवा को अच्छे मन से नहीं देखता ना कोई सहयोग करने की सोचता । सबकी नजरों में वो बस एक मौका होती है लेकिन उसने कभी अपनी मर्यादा पार नही की.


एक अच्छी बहू की तरह सब जिम्मेदारियों को निभाती गई ।



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