Sweety Raxa

Tragedy


3.1  

Sweety Raxa

Tragedy


संघर्ष

संघर्ष

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आज जो तुम इन सड़को पे पैदल जा रहे लोगो को देख के दुख प्रकट करते हो ये सिर्फ मज़दूर नहीं ये वो है जो आपकी ख़ुशी का हर पल खयाल किया ।आप की रहने की छत से लेकर आपकी बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाली स्कूल कॉलेज सब इनकी खून पसीनों से तैयार इमारतें हैं।


क्या आप जानते हो अगर ये ना हो तो हम जो शहर बोल के अपना रुतबा दिखाते हैं ये ना हो पाता, जो मॉल शॉपिंग सेंटर है ये भी इनकी मेहनत के कारण है । जो सुबह उठ के टहलने निकल जाते हो पार्क वो भी इनकी मेहनत से बनी है। जहाँ बैठ के दोस्तों के साथ मस्ती करते हो वो क्लब वो भी, कोफ्फी शॉप, रेस्टुरेंट जहाँ अपनी परिवार के साथ जा के जो ख़ुशी के कुछ पल गुजारते हो वो भी।


सही मायने मे कही जाये तो हमारी पूरी दुनिया की एक तिहाई हिस्सा मज़दूरों की बनायी गई है । उस हर जगा मे उनकी मेहनत और शारीरिक परिश्रम लगी है तभी ये खूबसूरत दुनिया बनी है । अगर सोचो वो ना होते तो क्या हम खुद से ये सब करते क्या दीवार मे सीमेंट जोड़ के एक घर बना पाते नहीं ना ।ऐसे बहुत जगह हम सिर्फ अपनी बात और अपनी भावना को बोल सकते है लेकिन वो कर नहीं सकते ।


आज अगर ये मज़दूर अपनी भूख और खुद की छत के लिये संघर्ष कर रहा है तो वो सिर्फ हम जैसे कुछ ना समझ लोगो की वजह से जो सरकार की दी हुई हर वो सुविधा के बारे जानते हुए भी उनकी मदद को हाथ नहीं बढ़ाते कुछ तो ऐसे भी है जो सरकार से मज़दूरों के लिये आये सामान को या फिर उनकी धनराशि को अपना समझ लेते है उनके तक पहुंचने तो दूर की बात उनको बताते भी नहीं।


क्या जो हमारी खुशहाल और बेहतर जिन्दगी को सुधर ने के लिये इतनी दूर से आते है हर रोज कुछ पैसों के लिये अपनी जिन्दगी को संघर्ष भरा बना लेते है क्या हमारा कर्तव्य नहीं कभी हम भी उनकी छोटी सी घर मे झाँक के देखें क्या उनको कोई तकलीफ तो नही। लेकिन यहाँ किसी के पास वक़्त कहां ।चलो मान लिया तब वक़्त नहीं क्या अब भी वक़्त नही। जब वो इतनी दूर से अपने घर गांव छोड़ हमारी ख़ुशी का खयाल रखने शहर आ गया तो हम इस वक़्त उसको थोड़ी सी सहानूभूति थोड़ी सी मदद जो उसको और उसके परिवार को खुश रखे इतना नहीं कर सकते हैं । बस कुछ दिन की बात थी इस बुरे वक्त में घर के मलिक हो के घर से निकल दिया बस कुछ पैसों के चलते। काम नहीं किया तो मुलाज़िम ने कुछ पैसे नहीं दिये क्यो ,क्यो की अब काम बन्द है रे इतना दिन वफ़ादारी से किया ना उस वफ़ादारी के लिये कुछ तो देते।


आज अगर सब मिल के सहयोग करते तो शायद वो ये शहर छोड़ जाता नहीं। अपने मज़दूर होने की संघर्ष मे अपने परिवार और खुद को इतनी जल्दी शहर छोड़ने को मजबूर होता नही। हजारों मिल की दूरी और वो अपने उन पैरो को चले जाने को तैयार करता नही। आज अगर वो संघर्ष के पथ पे निकल पड़े है तो क्या फिर कल तुम्हारे लिये वापस आएगा क्या वो फिर तुम पे भरोसा कर पायेगा जरा अपनी उन दीवारों से भी पूछ लेना क्या फिर वो यहाँ वापस आएगा।


माना तकलीफ़ सबको है क्या हम एक हो के इस मुसीबत से नहीं निकल सकते एक दूसरे का साथ देते जैसे उसने मज़दूर हो के साथ दिया हम खुद को उसकी सहायक बन के साथ देते। आज तुम उसकी संघर्ष मे नहीं हो वो रास्ते, वो कडकतिधुप ,भूख प्यास ,बच्चों की नम आंखे उनकी नन्हे कदम और ये महामारी जो उनको इतनी दूर अपने घर जाने को मजबूर कर दिया क्योंकि उनको यहाँ कोई अपना नहीं लगा सब मतलबी जो इतने सालों उनको अपना खून पसीने से खुशियाँ दिया आज वो साथ भी ना दिया।


आज वो संघर्ष कर रहा है। शायद कल उसकी बेहतर हो लेकिन हम लोगो को सोचना है क्या हम भी कभी उनकी तरह।संघर्ष कर सकते हैं ? आज यहाँ प्रश्न बड़े शहरों को छोड़ के गया है ।



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