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Yashwant Rathore

Classics Inspirational


4.7  

Yashwant Rathore

Classics Inspirational


ठाकुर साहब

ठाकुर साहब

12 mins 950 12 mins 950

(यह कोई कहानी नही, सच्चा जीवन परिचय हैं ,ठाकुर राम सिंह जी का।

30 साल तक उनका जीवन अपनी आंखों से देखा और सुना भी, सो पूरी ईमानदारी रखने की कोशिश करूंगा।

यह किसी जाती या धर्म के खिलाफ नही हैं पर जो सत्य आंखों से देखा उसको कहने का साहस होना ही चाहिए।

इस बार इस परिचय को लघु रखने की कोशिश करूंगा, आगे साहस हुआ तो इसपे उपन्यास भी लिखा जा सकता हैं।)


ठाकुर साहब राम सिंह जी के पिताजी का नाम ठाकुर नाहर सिंह जी था।

वे जोधपुर जिले ,ओसियां तहसील के गांव बैठवास के थे।

बैठवास गांव 7 हिस्सो में बटा हैं, उसमे एक छोटे से हिस्से रावली ढाणी- के जमींदार ठाकुर नाहर सिंह जी थे।

1922 के आसपास राम सिंह जी का जन्म हुआ था।

इस छोटे से गांव को न ये पता था कि भारत पर अंग्रेजो का शासन हैं,

ना ही महात्मा गांधी जी के बारे में जानते थे।

जोधपुर के राजा ही उनके लिए एक मात्र सच्चाई थी।

गांव के फसल का 8वा हिस्सा टैक्स के रूप में जाता था, यानी 12।5 परसेंट।

कम फसल हो तो उसके हिसाब से हिस्सा।

रसाला फोर्सेस में 5 से 8 लोगो तक नौकरी दी जा सकती थी इस गांव से।

उससे कुछ पैसो की आमदनी होती थी, साथ ही मृत्यु उपरांत ,एक वीर का सम्मान ,उनका गौरव बढ़ाने वाला था।

लाइट , रेडियो से दूर इस गांव का सादा जीवन था।

पानी की अत्यधिक कमी थी, बारिश में पहाड़ो से रिसते पानी से बने तालाब से पानी की पूर्ति होती थी।

गांव में कोई ट्यूबवैल ना थी, कुवे भी न थे, बारिश पर ही खेती निर्भर थी।

ठाकुर साहब नाहर सिंह जी का घर भी घास फूस से बना सामान्य घर था। रहन सहन भी बाकी गांव की तरह ही था।

बस सम्मान ज्यादा था क्योंकि वो न्याय उचित गांव में फैसला करते थे और कुछ हाली( नौकर) उनके यहां काम करते थे ,जिनको वो उनके काम अनुसार

अनाज दे दिया करते थे।

2 एक सोने और चांदी की थाली थी बस यही धन था, गायें ओर ऊंट काफी थे।

इन्ही सब को धन माना जाता था, रुपये पैसे बहुत कम ही हुआ करते थे।

नाहर सिंह जी का रास्ते चलते अगर कोई औरत से सामना हो जाता था और औरत को परेशानी न हो सो आप मुँह फेर कर जमीन पर बैठ जाते थे।

आदर्श चरित्र की वजह से उनका सम्मान था।

नाहर का अर्थ शेर होता हैं ऐसा ही उनका स्वभाव था।

वो अपने पुत्र राम सिंह जी को गाले के भोमियाजी जिन्होंने गायो से चोरो डाकुओ से छुड़ाने के लिए अपने प्राण दे दिए थे, उनके अलावा महाराणा प्रताप , स्वामी भक्त दुर्गादास की कहानियां सुनाया करते थे।

राम सिंह जी बहुत शांत स्वभाव युक्त व्यक्ति थे।

एक बड़ी सी लम्बी सी शाल( लंबा कमरा) व दो और कमरे जो घास फूस से बने थे, आगे घर का चौक और उसके बाहर कंटीली झाड़ियो से बनी चारदीवारी थी जिसे बाड़ भी कहते हैं।

घर के बाहर एक बड़ा सा नीम का पेड़ जिसपे बहुत सारे तोते रहते थे। उस पेड़ की छांव के सहारे ही एक कोल्डी ( लोगो के बैठने का कमरा) बनाई हुई थी।

ना उनके पास कोई हवेली थी ना ही पोल।

उनके घर पर सभी काम करते थे और उनके अनुसार अनाज पाते थे, आज छूत, अछूत जितना बड़ा करके बताया जाता है उतना न था।

भेरूजी के भोपे भील जाती के ही थे , बिछु , सांप का जहर उतारने वाले मंत्र पड़ते थे और अपने हाथ से ही पानी पिलाते थे मरीज को।

छाबड़िया और ठाठिये ( भोजनऔर समान रखने के बर्तन) उनके घर पर ही बनते थे, हरिजन समाज के लोग बनाते थे।

गाने वाले लोग देवी के भक्त माने जाते थे, पहली आरती वो ही करते थे।

हां, शादी ब्याह की दूरियां थी वो अपने अपने जातियों में ही ठीक मानी जाती थी।

बाकी सब ठीक ही था।

पानी की मटकी के तो बच्चो को भी हाथ न लगाने दिया जाता था, ताकि पानी मेला गंदा न हो सो सब बूक ( ऊपर से पानी डालने और हाथ से पीना) लगा कर ही पीते थे।

कोल्डी में आने का और अपनी बात कहना को सबको अधिकार था फिर किसी जाति धर्म का हो।

हारी बीमारी में वो सबको उधारी दे दिया करते थे और सबका हालचाल पता करते रहते थे।

पूरे गांव की उनको खबर रहती थी, बाहर से आनेवाले कोई यात्री या मेहमान उनके कोल्डी में रुकता था, उसके खाने रहने का प्रबंध वो कर दिया करते थे।

गांव में हरजी भाटी और बाबा रामदेव का प्रशिद्ध मंदिर होने से जातरू, भक्त गण आते ही रहते थे। साधु सन्यासियों का भी डेरा लगा रहता था।

मंदिर में धान की व्यवस्था भी उन्होंने संभाल रखी थी।

इस वजह से उनके परिवार का सम्मान काफी था।

राज को टैक्स देने के बाद ,एक साल खाने पीने का धान ही वो जमा रखते थे बाकी काम अनुसार लोगो मे बांट दिया जाता था।

गांव वाले उनसे खुश थे और वो गांव से।

गणगोर इनके घर से ही निकलती थी , सारा गांव औऱ आसपास के गांव भी त्योहार में हिस्सा लेते थे।

होली की भी खूब धूम होती थी।

अचानक से समय बदला , देश के लिए खुशखबरी थी, भारत आज़ाद हुआ।

जमींदारी प्रथा समाप्त हुई। राजा खुद मजबूर थे।

नाहर सिंह जी के परिवार की ढाणी ( घर) जिस खेत मे थी, वो खेत और उसके अलावा उनके 2 खेत, इसके अलावा सारी जमीन जो काम करते थे उनकी हो गयी।

उनका काम सिपाही तैयार करना और जमींदारी का था , वो खुद खेती नही करते थे तो ऊनको ज़मीन भी कम मिली।

वो ज्यादा पढ़े लिखे भी नही थे। चार पांच करना भी उन्हें नही आता था।

जो किसान उनके यहां काम करते थे, उनके पास ज्यादा ज़मीन थी अब और उनके पास 10 वा हिस्सा भी नही।

कई आंदोलन चल रहे थे जिन्होंने किसानों को ज्यादा जानकारियां दे दी थी, सब अपना अपना देखने लग गए थे।

राजाओ की मदद न रही औऱ धान आना बंद हो गया था।

निराश होकर राम सिंह जी ने एक दिन अपने पिताजी को पूछा - अब हम क्या करेंगे, ऐसे तो मारे जाएंगे।

नाहर सिंह जी ने उनको समझाया कि राजा पृथू ने जब सन्यास ले लिया था तब वो अपना धान खुद उगाते थे और उसी से भोजन करते थे, मान लो अब सन्यासी का जीवन जीना हैं।

राम सिंह जी ने कहा हमने तो कभी खेती की ही नही, हमसे कैसे होगा।

नाहर सिंह जी ने पहाड़ पर बनी छतरियों की तरफ इशारा करके कहा कि

देखो ये तुम्हारे पूर्वज पहले कन्नौज से आये, 11 राठौड़ राजाओ ने चित्तौड़ के अधीन नौकरी की, सब युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुवे उसके बाद जोधपुर बस पाया।

जब कन्नौज से आये थे तो खाने पीने रहने का भी ठिकाना न था। धीरे धीरे राज पा गए।

राम राजा होते हुवे भी 14 साल कष्ट देखा, करना चाहोगे तो सब हो सकता हैं।

कई पूर्वज राजाओ के साथ विदेशो में युद्ध मे गए, उनकी लाशें भी न आयी।

इजराइल का हापा का युद्ध उन्होंने जोधपुर में सुना था वो भी सुनाया।

राम सिंह जी के बात बैठ गयी।

राम सिंह जी के 3 भाई तो सेना में चले गए।

एक भाई व राम सिंह जी खेती में लग गए।

एक बार अकाल पड़ा, खेत वैसे ही कम थे ,जमा अनाज खत्म हो गया।

राम सिंह जी की शादी हो गयी थी और 3 बच्चे भी , खाने के लाले पड़े थे।

बाकी गांव के लोगो की भी हालत खराब थी।

एक बड़ा किसान परिवार जो नाहर सिंह जी के यहां खेती करते थे, उनको काफी जमीन मिल गयी थी, उनके पास कुछ धान जमा था।

नाहर सिंह जी ने रामसिंह जी को थोड़ा धान उधार लाने को कहा।

राम सिंह जी को बड़ी शर्म आ रही थी, फिर भी वो ना न कह सके और गये।

पर किसान परिवार ने रूखे भाव से उन्हें मना कर दिया।

स्तथि गंभीर थी और घर मे बच्चे थे तो वो खुद बात करने गए।

किसान परिवार पहले तो टालमटोल करता रहा फिर उनका मुखिया गुस्से से बोला - तुम लोगो ने हज़ारो साल हमारा शोषण किया, मरो तो मरो, कुछ न मिलेगा।

ये शब्द उनके हृदय पे तीर की तरह लगे।

उन्होंने कहा तुम्हे ये सब किसने समझाया

मेने कब किसी पे अत्याचार किया था।

मुखिया बोला तुम नही तो तुम्हारे बाप दादाओ ने किया होगा।

नाहर सिंह जी ने कहा मेरे पिताजी ओर दादाजी दोनों ही शांत स्वभाव के थे, उनको ऐसा करता मेने तो देखा नही।

वो घर आये और सारी बात बताई।

राम सिंह जी का भाई गुस्से में आ उनसे लड़ने गया। मार पीट के उसे फेंक दिया गया। उसकी दवा दारू का खर्चा और बढ़ गया।

नाहर सिंह जी बदले मौसम और मरी हुई इंसानियत को सहन ना कर सके और चल बसे।

राम सिंह जी को ठाकुर बनाया गया, वो बस नाम के ठाकुर थे।

उनके पास ना शिक्षा थी, ना पैसे ना नौकर।

अब गणगोर पर अकेले उनके समाज के लोग ही उनके घर आते थे।

घर चलाने के लिए उन्होंने अपने ऊंट और बाद में गाये बेचने लगे।

उनका भाई एक बार खेजड़ी पर लूंग काटने चढ़ा और आदत थी नही तो पहले कुल्हाड़ी गिरी और ऊपर वो, सो मारे गए।

उनके 3 भाई सेना में थे और सैनिक ही थे तो ज्यादा पैसे मिलते नही थे और अब उनका भी परिवार था तो पैसे की कमी थी।

उस समय फौज में पैसा कम भी था।

कपड़े के भी पैसे उनके पास न थे, एक धोती जो मेली हो चुकी थी उसमे भी बीड़ी के जलने से छेद थे।

जैसे तैसे समय गुजर रहा था।

मेजर शैतान सिंह जी जो बैठवास के भांजे थे उन्ही के पदचिन्हों पर चलते हुवे ठाकुर साहब के छोटे भाई के लड़के जेठू सिंह जी फौज में शहीद हो गए।

उस बात ने राम सिंह को ओर हिम्मत दे दी।

वो लगे रहे।

राम सिंह जी के बड़े बेटे गुलाब सिंह पढ़ न सके, पिता के कामो में हाथ बटाते रहे और उस समय गांव में स्कूल भी न थी।

वो पत्थर तोडना सिख गए थे जिससे घर का खर्चा निकलता था और छोटा मोटा कारीगर का काम कर लेते थे, जैसे घरो पे प्लास्टर करना।

एक दिन गुलाब सिंह जी ने पूछा ,अपने पिताजी से - ऐसे तो हमारी कौम ही खत्म हो जाएगी।

राम सिंह जी ने कहा - भगवान चाहेगा तो हो जाएगी, कई जीव जंतु खत्म हो गए, पहले कहते हैं बड़े बड़े हाथी थे अब वो नही दिखते, उनकी उपयोगिता खत्म हो गई होगी, हमारी खत्म होगी तो हम भी।।।। डरना क्या।

राम सिंह जी के दो लड़के करण सिंह जी व हुकम सिंह जी थोड़े पढ़ लिख लिए थे। गांव से 2 किलोमीटर दूर पंडित जी की ढाणी में स्कूल थी, वहीं से पढ़ लिए थे।

उनके पिताजी के भाई हीर सिंह जी ,जो रसाला फौज ( जोधपुर राजा की फ़ौज)में थे उनके लड़के जो बाद में शहर चले गए थे, वकील बन गए थे, अब उन्होंने गांव में सरकारी स्कूल बनवा दी थी।

अब गांव के लड़के लड़कियां भी पढ़ने लगे।

समय काफी गुजर गया

रावली ढाणी को छोड़ आसपास सब जगह लाइट आ गयी थी।

जिनके पास जमीने ज्यादा थी, उन्होंने ट्यूबवेल खुदवा दी।

किसानों के पास शिक्षा, ट्रेक्टर, ज़मीन, जीपे सफेद चमकती धोतियां थी।

सबके पक्के मकान हो गए थे।

वो गांव के सरपंच भी थे और राजनीति में भी वर्चस्व था।

हॉस्पिटल गांव से 2 किलोमीटर दूर था ,बीमारी में भी जीप के 2 पैसे न लगे सो पैदल ही जा आते थे।

राम सिंह जी अभी भी उन्ही झोपड़ियो में थे।

मैंने अपने बचपन मे राम सिंह जी को ब्लेड से एक तीली के दो टुकड़े करने की असफल कोशिश करते देखा, उन्हें लगा माचिस ज्यादा दिन चलेगी।

कोशिश व्यर्थ थी पर वो हर काम मे कोशिश करना नही छोड़ते थे।

गांव में रेडियो आ गया था, अब उन्हें हर बात की खबर लगने लगी।

जमाने मे कितना जहर और जातिवाद घुल गया है समझ आने लगा।

राम सिंह जी हर काम खुद से करते थे और बच्चो को भी समझाते थे।

गुलाब सिंह जी की शादी तो हुई पर बच्चे ना थे।

उनके छोटे लड़के करण सिंह ने पढ़ाई पूरी होने के बाद कई सरकारी नौकरी में कोशिश की पर पढ़ाई में ज्यादा होशियार ना होने की वजह से और आरक्षण की वजह से सफल न हो सके।

कुछ सोच कर बड़ी नौकरी का मोह त्याग उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में चपरासी की नौकरी पकड़ ली। सुख ये था नौकरी सरकारी थीं।

कई सालों तक उन्होंने गांव को न बताया ,ठाकुर साहब का बेटा चपरासी ये सोच के वो अपने आप को बाबू बताते रहे।

छोटा बेटा हुकम सिंह जयपुर चला गया और टूरिज्म लाइन में चला गया।

वकील साहब जिन्होंने स्कूल बनवाई थी, जी तोड़ कोशिश कर गांव में लाइट ले आये।

बच्चो की नौकरियां लगने से राम सिंह जी को आमदनी होने लग गई।

गुलाब सिंह जी खुद ही पत्थर निकालते थे, धीरे धीरे घर को पक्का बनाने में लगे रहे।

सम्मिलित परिवार था पैसे की आमदनी हुई तो नई जमीने खरीद ली गयी।

कुछ सालों में ट्यूब वेल भी हो गयी।

एक दिन गुलाब सिंह जी ने राम सिंह जी को कहा कुछ किसान परिवार दारू निकालने का और अमल का धंधा करने लग गए हैं।

काफी कमाई हैं हमारे समाज के एक दो लोग उनके साथ हैं।

राम सिंह ने कहा समाज मजबूत पैसो से नही बनता, जो बहाव के विपरीत जूझता हैं वो समाज अपना चरित्र बनाता है।

इसलिए हमारे पूर्वजों को झुंझार भी कहते हैं।

खाने को कुछ न था ,तब से यहां तक आ गए अब क्यों गंदगी में पैर धरना।

राम सिंह जी अब बूढ़े हो चले थे। उनके पोते शहर की कॉलेज में ही पढ़े ,गांव कभी कबार ही आते थे।

पोतों ने ज़िद कर घर के बाहर पोल ( आर्क) बनवा दी थी।

अब घर मे टी वी , कूलर सब आइटम आ गए थे। एक छोटी कार भी थी।

पर उन्हें न चलानी आती थी। वो अभी भी हर काम खुद ही करते थे।

पोते की शादी के दिन, किसान मुखिया के घर छापा पड़ा, कुछ देसी कट्टे और डोडे, अमल बरामद हुवे उनके पोते को पुलिस ले गई।

शादी के दिन उनका पोता राजाओ की तरह सजा, अपने खूब दोस्तो को बुलाया, कईयो ने ब्रिचीस और जोधपुरी कोट पहन रखा था।

कइयों ने मफलर डाल रखे थे, कपड़ो के बारे में पूछने पर उनका पोता किसी को कह रहा था - "हम रॉयल फैमिली से बिलोंग करते हैं हमारा यही पहनावा हैं"

राम सिंह जी से जब पूछा गया तो उन्होंने कहा - मेरे पिताजी और दादाजी तो धोती ही पहनते थे, उससे पहले का मुझे पता नही।

अपने ससुराल गए राम सिंह जी को काफी साल हो गए थे। उम्र भी 75 से ऊपर हो गयी थी, किसी शादी में बुलाया तो चले गए, बाकी सब वापस आ गए थे, उनको वहां अच्छा लगा तो कुछ दिन ओर रुक गए।

आते वक्त एक मिठाई और गिफ्ट का कट्टा उनके लिए पैक कर दिया था, बहुत आग्रह के बाद उनको ले जाना पड़ा।

गांव के स्टैंड पे बस ने 3 बजे उतारा। गांव को कोई आदमी ने दिखा तो अकेले ही कट्टा उठा निकल पड़े।

चुटिये (चलने का डंडा) का सहारा ले कुछ दूर चले फिर थक गए।

एक एक पैसे की कीमत का उनको पता था इसलिए जीप भी किराये न की।

रुक रुक कर चलते गए। 2 किलोमीटर पार करने में घंटे से ऊपर लग गया।

घर आये अपनी धर्म पत्नी को सामान सुपुर्द किया।

प्यास से जान निकली जा रही थी पर गरम शरीर का सोच पानी न पिया।

थोड़ा विश्राम कर पानी पिया और लैट गए।

6 बजे उठाने के टाइम नहीं उठे। वो यात्रा पूरी कर चुके थे।

अगले दिन उनके घर के बाहर हज़ारो की भीड़ थी।

उनका पक्का मकान अब पोल के साथ हवेली सा लग रहा था।

नीम के पेड़ पर आज भी तोते हैं।

उनके फैले हुवे परिवार की सब गाड़ियां घर के बाहर जगह न होने से खेतों को भी भर चुकी थी।

एक बाहर से आया आदमी कह रहा था -,भीड़ बहुत आयी ठाकुर साहब के लिए।

दूसरे ने कहा - ये लोग यार ठाकुर हैं पुश्तेनी अमीर, पैसो की कमी नही सब गाड़ियाँ उठा उठा के आ जाते हैं।

ये रॉयलियें हैं इनको किस चीज की कमी।

ठाकुर साहब सुनते तो ठहाके लगा के हंस पड़ते।



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