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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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तितली रानी (कहानी)

तितली रानी (कहानी)

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रंग-बिरंगी तितलियों की टोली जैसे ही हरे-भरे जंगल से निकली। उसे अजीब सी गंध का आभास हुआ। एक पीले पंख वाली नन्हीं सी तितली ने काली पंख वाली दादी तितली से पूछा।

अरे दादी हम किधर जा रहे हैं? यहाँ तो रंग-बिरंगे फूलों की जगह ये रंग-बिरंगी क्या वस्तुएं पड़ी हुई हैं । अरे इनसे खुशबू की जगह कितनी दुर्गंध आ रही है।

काली वाली दादी तितली ने कहा - अरे चलो यहाँ से वापस चलो। यहाँ तो पन्नियाँ ही पन्नियाँ पड़ी हैं । और भी नाना प्रकार का सड़ा-गला कचरा पड़ा है। तभी तो इतनी दुर्गंध है। यहाँ के सारे पेड़-पौधे भी इस कचरे के नीचे दब गए। और यहाँ पानी का झरना बहता था। जो पास की ही एक नदी में मिलता था। जहाँ सभी जानवर पानी पीते थे। वह भी कहीं गुम हो गया।

लाल पर वाली तितली को चिन्ता होने लगी - इस तरह तो एक दिन ये लोग हमारे जंगल को भी समाप्त कर देंगे। फिर जब पेड़-पौधे नहीं रहेंगे तो फूलों भी का रस कैसे मिलेगा। हम तो भूखे मर जाएंगे।

दादी तितली ने बीच में टोकते हुए कहा- अरे तुम्हें फूलों के रस की पड़ी है। जब फूल ही नहीं खिलेंगे तो फल कहाँ से आएँगे। जब फल नहीं आएंगे। तो जंगल के सारे जानवर भूख से मर जाएंगे।

यह सुनकर वही नन्ही सी पीले पंख वाली तितली ने कहा - फिर इस तरह तो भगवान की बनाई यह खूबसूरत प्रकृति भी खत्म हो जाएगी।

दादी तितली बोली - हाँ कितना बुरा ज़माना आ गया।

पहले सब इंसान, जानवर, परिन्दे सब मिलकर इस सुन्दर सी प्रकृति में एक साथ रहते थे। सब एक दूसरे का ख्याल रखते थे। कंद, मूल, फल खाकर पेट भरते । तब इंसान भी हमारे बंदर भाइयों जैसा था। खूब एक पेड़ की डाली से दूसरे पेड़ पर कुलाटी लगाता। उछलता कूदता। सब मज़े में थे। जंगलों में कल-कल बहते साफ सुथरे पानी के झरने थे। नदियाँ थीं। सब यहाँ इकट्ठा होकर अपनी प्यास बुझाया करते थे। इन्हीं के पास बड़े-बड़े पेड़ों की छाया में आराम भी करते थे। ये पेड़ इन्हें धूप सर्दी-गर्मी-बारिश से बचाते थे। हम तितलियों को कभी किसी से खतरा नहीं था। हमारा काम तो फूल खिलाना था। इस प्रकृति की सुन्दरता को बनाए रखने का काम भगवान ने हमें ही दिया था।

पीली तितली ने फिर पूछा - दादी तितली, फिर ये दुनिया कैसे बदल गई?

सभी तितलियों को भी जिज्ञासा थी। अब तक उनका झुण्ड वापस जंगल की तरफ एक फुलवारी में चला गया।

दादी तितली बोली- देखो कितने सुन्दर - सुन्दर फूल खिले हैं। सब हमारा इंतिजार कर रहे हैं। चलो पहले हम इनका रस लेते हैं। तुम सब बहुत थक गए होगे। फिर हम तुम्हें इस इंसान की कहानी सुनाते हैं। 

लाल तितली बोली- अरे ये फूल तो हमसे भी सुन्दर हैं, रंग-बिरंगे। हमारे रंगों से भी ज्यादा चटख रंग की हैं, इनकी पंखुड़ियाँ। इस इंसान ने इतने अच्छे फल-फूलों को छोड़कर, शहर को क्यों चुना? ये बात तो हमारी समझ में भी न आई?

दादी तितली फिर शुरू हो गई- ये इंसान है न इसमें सारे जानवरों की अपेक्षा थोड़ी अकल ज्यादा थी। लेकिन ताकत में ये जंगल के राजा से कम था। ये 

हमेशा जंगल के राजा की बराबरी करना चाहता था। हमेशा कुछ न कुछ प्रयोग करता रहता। सबसे पहले इसने आग जलाना सीखा। जब आग जली तो दूसरे जानवर इसको देखकर डर गए। फिर इसने पत्थर को हथियार बना कर कमज़ोर जानवरों को मारकर आग में भूनकर खाना शुरू कर दिया। फलों को आग में पकाने लगा। बस यहीं से सब जंगली जानवर इसके दुश्मन हो गए। अब इसका जंगल में जीना दूभर हो गया। तब ये छिप कर गुफाओं में रहने लगा। यही गुफाएं कालांतर में भी इसकी सुरक्षा पूरी नहीं कर सकीं। तब इसने अपने रहने के लिए ऊँची - ऊँची जगहों पर मकान बनाए। ताकि दूर से ये सब को देख सके।और आस पास के जंगलों को काट दिया। अपनी पैदा की हुई गंदगी को शहर से दूर जंगलों में फेकना शुरू कर दिया ।

लाल वाली तितली बोली- अगर ऐसे ही रहा तब तो सारे जंगल नष्ट हो जाएंगे। जब जंगल नष्ट होंगे तो हवा चलना भी बंद हो जाएगी। तब तो यही गंध पूरे शहर में फैल जाएगी। इस से तो इस इंसान का जीना भी दूभर हो जाएगा। 

दादी तितली फिर बोली - पहले तो इसको कुछ अहसास था। अपने घर के आंगन में पेड़-पौधे, बाग- बगीचे लगाता था। हम तितलियाँ इसी तरह टोलियाँ बना कर जातीं थीं। सर्दियों की गुनगुनी धूप में बहार के मौसम में इसके घर आँगन में फूल खिलते थे। हमें देख कर इसके बच्चे इकट्ठे हो जाते और खुशी के मारे ताली बजाते थे। ज़ोर-ज़ोर से तितली रानी-तितलानी रानी कह कर बुलाते थे।

फिर वही नन्ही सी पीली तितली ने कहा- इन पक्के घर वालों को जंगलों की याद आती होगी। तभी तो ये बड़े- बड़े बाग-बगीचे बनाते थे। फिर अब ऐसा क्या हो गया इसे?

दादी तितली बोली- ये तरक्की करते-करते आँखों से अंधा हो गया। अब इसे कुदरत के रंग-बिरंगे फूलों की जगह रंग-बिरंगी रौशनियाँ अच्छी लगने लगीं हैं।

देखना एक दिन इसका जब, इन कंक्रीट के जंगलों में जीना दूभर हो जाएगा। सारी हवा-पानी प्रदूषित हो जाएगा। तो सांस लेना भी मुश्किल होगी। फिर एक बार यह उन्हीं जंगलों की तरफ भागेगा। अब वह दिन दूर नहीं।

सारी तितलियाँ खुश हो गईं। फिर तो कहीं कोई कचरे का ढेर नहीं होगा और न ही ऐसी दुर्गंध आएगी। फिर इंसान भी हमारे साथ जंगल में रहेगा। इसके बच्चे हमें देख कर फिर तितली रानी बोला करेंगे। हम भी उन्हें अपने पंखों पर बैठा कर भगवान के बगीचों की सैर कराने ले जाया करेंगे। फिर हम सब जगह इसी तरह जाया करेंगे। खूब मजा आएगा।


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