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Dr Jogender Singh(jogi)

Romance

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Dr Jogender Singh(jogi)

Romance

तीन दिन का चाँद

तीन दिन का चाँद

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क्या हुआ मनीष? क्यों उदास हो ? सुदर्शन ने पूछा !

नहीं यार उदास बिल्कुल भी नहीं हूँ। मैं उसको क्या बताता, वो लम्बी, बड़ी / बड़ी आँखों वाली लड़की। परसों ही कॉलेज में आयी है, नालागढ़ से। वो दिल में ऐसे उतरी कि तब से हर तरफ़ वो ही दिखाई दे रही थी। रत्नाकर बाबू को पान खिला कर, पचास का नोट पकड़ा कर, कितनी मुश्किल से उसके बारे में जानकारी इकट्ठी की। शर्मा है (पण्डित) ! और मैं बनिया ( गोयल ) बात बन ही नहीं सकती, किसी भी तरह से नहीं। उसके पापा ज़िला वन अधिकारी ( DFO) और मेरे पापा ? पंद्रह साल पहले ही मम्मी को छोड़ कर जा चुके हैं। मेरी मम्मी माध्यमिक स्कूल में हिंदी टीचर, किसी तरह से परिवार चल रहा है। परिवार मतलब नानी, मम्मी, मैं और सलोनी ( मेरी छोटी बहन )। हॉस्पिटल राउंड पर उसके पापा को बड़ा सा सरकारी बँगला मिला हुआ है। कहाँ वो, कहाँ मैं, दो दिन से ख़ुद को बार / बार समझाया कि यह कभी नहीं हो सकता, पर जितना भूलने की कोशिश की उतनी ही ज़्यादा वो ख़्यालों में आने लगी। 

चल एक राउंड मारते हैं, बाज़ार का। बड़े चौक से छोटे चौक तक ? रास्ते में और भी दोस्त मिल जाएंगे,  सुदर्शन रोज़ की तरह बोला। यह हम दोस्तों की रोज़ की आदत थी। शाम को सब इकट्ठे होकर बाज़ार के तीन / चार चक्कर लगाते थे फ़ालतू में। 

हॉस्पिटल राउंड की तरफ़ चलें आज ? थोड़ा बदल जायेगा। 

हॉस्पिटल राउंड में क्या रखा है ? चार /पाँच सरकारी बँगले, झाड़ियाँ, नेवले और आख़िर में बदबू मारता एक अस्पताल। फिर चढ़ाई अलग से। तू पागल हो गया क्या ? बाज़ार की रौनक़ छोड़ कर उस सड़े हुए इलाक़े में जायेगा। और अस्पताल के नाम पर तुझे उबकाई आती है मुझे पता है। ”मज़ाक़ मत कर ” चल हो सकता है चाँदनी भी दिख जाए ? आ चल, सुदर्शन ने मुझे खींचा। 

थोड़ा बदलाव हो जायेगा, हॉस्पिटल से पहले ही वापिस मुड़ जाएंगे। एक चक्कर मार कर वापिस आ जाएंगे। फिर दो चक्कर बाज़ार के। मानो मैंने अपना फ़ैसला सुनाया। 

ठीक चल !! वैसे भी सुदर्शन मेरी बात बहुत कम काटता था, स्टडीज़ में मेरी मदद के बग़ैर उसकी नैया जो डूब जो जाती थी। 

हॉस्पिटल राउंड में सन्नाटा पसरा था। इक्का / दुक्का लोग ही दिख रहे थे। मैं जानता था सुदर्शन मन ही मन भुनभुना रहा है, पर मेरे दिल पर मेरा ज़ोर नहीं था। वो तो बस उन बड़ी / बड़ी आँखों वाले चाँद से मुखड़े की झलक पाने को पागल हुआ जा रहा था। 

कभी / कभी तू यार एकदम पागलों जैसी हरकत करने लगता है, यह देख ले सुनसान / वीरान सड़क हॉस्पिटल राउंड की। देख रहा है ना ! न आदमी / न औरत, कोई लड़की मिलने का तो चान्स ही नहीं। उधर राजीव, आकाश, महेन्द्र, सनी सब आ गए होंगे। चल अब वापिस चलते हैं ? 

अरे यार, थोड़ा सा तो बचा है, बस अगले मोड़ से वापिस आ जाएंगे। मेरी धड़कन तेज हो रही थी, DFO निवास की पीली बिल्डिंग दिखने लगी थी। 

बँगले के सामने से मैंने अंदर झांका। दरवाज़े बंद थे, लॉन सुनसान। एक गार्ड कुर्सी पर बैठा ऊँघ रहा था। धत तेरे की। चल वापिस चलते हैं। 

हाँ, जल्दी चल। सुदर्शन तो वहाँ से जल्दी से जल्दी भागना ही चाहता था। 

मैंने निराशा से एक बार फिर बँगले के अंदर नज़र दौड़ाई, खिड़की पर अपने लम्बे बालों को सँवारता चाँद दिख गया। मैं इसके बिना जी न सकूँगा, क्या करूँ ? 

थोड़ा तेज़ चल ले, सामने देख कर। सुदर्शन खीज कर बोला।

चल तो रहा हूँ। मुझे उस पर ग़ुस्सा आ रहा था।

नानी / मम्मी, सलोनी का ख़्याल आते ही मैंने अपने नये / नवेले प्यार को बिना किसी को बताए अलविदा कह दिया।

अलविदा तीन दिन के चाँद।



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