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Dr Jogender Singh(jogi)

Abstract

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Dr Jogender Singh(jogi)

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नाशपाती

नाशपाती

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टहनी को किसी तरह झुका कर अरविंद चिल्लाया “अबे! तोड़, देख कितनी बड़ी है “।  जीवन ने उछल कर अधमनी सी एक कोशिश की, पर टहनी से उसका हाथ काफ़ी दूर रह गया । “ सब्र से, सांस भर फिर उछल,पेड़ पर चड़ा अरविंद उसे समझाते हुए बोला ।देख एक बार में फिर टहनी झुकाता हूँ ।अरविंद पेड़ की मोटी टहनी पर लेट, आगे की पतली टहनी को हाथ बड़ा कर झुकाते हुए फिर बोला “ पकड़ “ जीवन ने अनमनी उछाल भरी, उसका हाथ नाशपाती से दूर रह गया ।

तब तक अरविंद फिसल कर नीचे आ गिरा, हरी/ भरी घास के बिस्तर ने चोट से तो बचा लिया, पर नाशपाती के हाथ से निकल जाने का दुख उसको गुस्सा दिला दिया । उसने एक थप्पड़ जीवन के बाँयें गाल पर जड़ दिया “ जब नाशपाती तोड़नी ही नहीं थी, तो मुझसे मेहनत क्यों करवाई? वो गुस्से से बोला ।

तोड़ लेता तब भी बड़ा हिस्सा तो तू ही खाता भरी आँखों से जीवन ने अरविंद से खामोश शिकायत की ।

दोनों उदास बैठे थे और नाशपाती डाल पर हवा के झोंके के साथ झूल रही थी ।


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