"सूरज की तपन तो कोने में भी ताक रही है। फिर आप सीधे इसके नीचे कैसे बैठ पा रहे हैं? गला नहीं सूख रहा? साँस ले पा रहे हैं क्या? त्वचा झुलस नहीं रही ? सूरज भी न..., थोड़ी-सी भी मानवता नहीं है इसमें।"
"मानवता ? वह तो देवता है, उसमें देवत्व है। इसीलिए सदियों से अपना काम करने आता है और पूरी निष्ठा से करके चला जाता है। हम सब मानव हैं लेकिन क्या हममें मानवता है? एक पेड़ तो लगाया नहीं, लेकिन पेड़ काटने की धृष्टता जरूर कर रहे हैं। सदियों से हमारे पुरखे और अब हम, यहीं बैठकर मोची का काम कर रहे हैं। पहले कहीं-कहीं मानवता दिखती थी, लेकिन अब वह पूरी तरह से झुलस गई है। पहले हवादार वृक्ष हमें सहलाते थे। अब इनके ठूँट हमें चिढ़ाते हैं।"