देखभाल
देखभाल
"पिछली बार जब हम अपने घर गए थे तब हमारे सारे-के-सारे पौधे सूख गए थे। सभी कह रहे थे, कि आपकी बालकनी से लटक रहे पीले सूखे पत्ते सभी को आपकी अनुपस्थिति की सूचना दे रहे थे।" " हाँ, सही कहा, मुझसे भी पूछ रहे थे, कि तुम तो सुभद्रा की पड़ोसन हो, तुम्हे तो पता ही होगा।" "लेकिन तुम अपने सारे गमले बाहर क्यों निकाल रही हो बरखा? कोई खास बात? क्योंकि यहाँ कॉरिडोर में तो कोई खास धूप आती भी नहीं है न!" "हाँ, सही कहा तुमने। मैं अपने बच्चो को सूखते नहीं देख सकती। हम लोग भी बाहर जा रहे हैं। पंद्रह-बीस दिन लग जाएँगे आने में, इसीलिए माली से कहकर जा रही हूँ, कि वह रोज आकर पौधों को पानी से सींच दे, ताकि आने के बाद भी हमें अपने पौधे हरे-भरे ही मिले, फिर पंद्रह दिन बाद हम गमलों को फिर से अंदर लेकर बालकनी में रख देंगे ताकि उन्हें वही तरोताजा हवा, धूप पहले जैसी मिलती रहे।" "काश पहले ही यह मेरे दिमाग में भी आ जाता तो कम-से-कम मेरे पौधे भी सूखने से बच जाते और पूरी दुनिया में ढिंढोरा भी नहीं पिटता की हम एक महीने से घर पर नहीं हैं।" "पौधे संभालना जिम्मेदारी का काम होता है, सुभद्रा और उसकी सर्वश्रेष्ठ देखभाल करना हमारा कर्तव्य क्योंकि यह भी तो हमारे बच्चे ही हैं; ये हमें इतना कुछ देतें हैं कि हमारी सेवा उसके सामने कुछ भी नहीं।"
