परहित सरिस धर्म नहिं भाई
परहित सरिस धर्म नहिं भाई
पिछले कई दिनों से कभी माँ को, तो कभी पिता को अपने बच्चे को वॉकर पर घंटों आगे-पीछे, एक ही रास्ते पर घूमाते देखती रही। दोनों अपने हाथ में मोबाइल पर रील्स देखने में व्यस्त रहते और बच्चा कभी मुड़कर उनको ताकता, कभी सामने देखता फिर मायूस होकर चुपचाप बैठा रहता। अंत में ऊबकर, चिड़चिड़ा हो जाता, फिर रोने लगता, तब माँ पूछती, "क्या हुआ? हम तो घूम लिए।" रोज का यही सिलसिला देख मुझसे रहा नहीं गया और उस बच्चे की खातिर मुझे उनसे कहना पड़ा, "देखिए, आप एक अच्छी माँ हैं और, और भी अधिक अच्छी बन सकती हैंI बस अपना मोबाइल घर पर रखकर, अपने बच्चे को वॉकर में नहीं, पैरों पर लेकर आइए। उसके साथ बाॅल व अन्य कई गेम खेलिए फिर देखिए, उसमें और स्वयं में भी अंतर।"
यह सुनकर थोड़ी देर वह मुझे देखती रही, फिर मुस्कुराकर कहने लगी, "मैं अभी मोबाइल घर पर रख कर आती हूँ।"
घर की ओर जाने के लिए जैसे ही वह मुड़ी, पीछे से बच्चे ने कहा- "माँ, मुझे वाॅकर से नही निकालोगी?"
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