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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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सुलझते धागे

सुलझते धागे

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कॉल बेल बजने पर जैसे ही सीमा ने घर का दरवाजा खोला सामने खड़े डिलीवरी एप वाले भैया ने कहा- "आपके द्वारा सामान को लेकर की गई कई शिकायतों के तहत हम आए हैं।"

 "कहिए।"

"जी, हम समझना चाहते हैं, कि सामान को लेकर आपको किस-किस तरह की,  क्या-क्या समस्याएँ हैं?" "अच्छा! पहली समस्या है सब्जियों व फलों को लेकर, ताजा न होने की।"

 "दूसरी?"

 "वजन सही नहीं होने की। पाँच सौ ग्राम लिखा होता है, लेकिन उतनी होती ही नहीं है।"

"दूध को लेकर भी समस्या है?"

 "बिलकुल, ऐसा तीसरी बार हुआ है, कि दूध फटा है। क्या आपके यहाँ स्टोरेज की समस्या है?"

 "मैं पता करवाता हूँ।"

"क्योंकि जब डिलीवरी बॉय लाते हैं, तब पैकेट ठंडे नहीं गर्म होते हैं। जिससे उन्हें बिना खोले ही वापस करने का मन करता है। कई बार दूध लेने के लिए ही आर्डर करते हैं। फटने के कारण हमें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।"

 "इन सबकी आगे से पुनरावृत्ति न हो इसका ध्यान रखा जाएगा।"

 "लेकिन ऐसा हर बार बोला जाता है पर सुधार नजर नहीं आता।"

 "आगे से मैं खुद व्यक्तिगत रूप से इन सब बातों का ध्यान रखूँगा।"

 "देखते हैं!"

 "ठीक है मैडम, हम लोग चलते हैं। आपकी समस्याओं का निदान हो गया है।"

 "माफ कीजिएगा! निदान नहीं हुआ है। अभी तो सिर्फ आपने सुनी है। निदान तो तब समझा जाएगा जब मेरे अगले ऑर्डर से मुझे कोई शिकायत नहीं रहेगी।"

 "जी...जी...! मैडम ऐसा ही होगा अब आप निश्चिंत रहिए।"


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