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Shailaja Bhattad

Abstract Inspirational

4.0  

Shailaja Bhattad

Abstract Inspirational

मोल-भाव

मोल-भाव

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"भैया स्ट्रॉबेरी कैसे दी है?"

 "एक बॉक्स अस्सी रूपए में और दो लेने पर एक सौ पचास रूपए।" "एक सौ चालिस में दोगे भैया, क्योंकि ऑनलाइन में तो इससे भी कम में मिल रहा है।" "मैडम, ये महाबलेश्वर की हैं। क्वालिटी अच्छी है। आप टेस्ट करके देख लीजिए।" "दे भी दो भैया।" "ठीक है, ले लीजिए।' "मुझे तीन पैकेट लेना है।" "सत्तर के हिसाब से दो सौ दस बनता है, मैडम।' "भैया, राउंड फिगर में दो सौ कर दीजिए न।"
"मैडम, एक काम कीजिए, आप राउंड फिगर में दो सौ बीस दे दीजिए।"

 "अच्छा ठीक है, दो सौ दस ले लो।"
 "देखा, आप दस रूपए अधिक देने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन मुझे दस रूपए कम लेने के लिए कह रहीं थी।" दुकानदार के माथे पर दर्द की लकीरें उभर आई जिसे देखकर पास खड़ी एक महिला ने उस किशोरवय दुकानदार से कहा, "भैया मुझे भी तीन डिब्बे दीजिए, लेकिन दो सौ बीस में ही।" यह सुन उस दुकानदार के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई, फिर भी वह सशंकित भाव से पूछ बैठा- "क्या आप वाकई में मुझे देंगी?"
 "बच्चे तुम्हारे चेहरे पर आई मुस्कान से अधिक नहीं है ये। अब ये स्ट्रॉबेरी जरूर फलेगी हमें।" उसके हाथ में पैसे थमाते हुए, वह महिला घर की ओर निकल पड़ी और पीछे छोड़ गई उस दूसरी महिला के चेहरे पर ग्लानि का भाव और उस दुकानदार की आँखों में आत्मसम्मान की चमक।
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मोल-भाव रचना 29/3/26 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित


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