समाज सुधार
समाज सुधार
"चलो अच्छा हुआ आपकी समस्या का निदान बारिश के पहले हो गया।"
"हाँ, सही कहा विनोद जी, समय रहते सब ठीक हो गया।"
"अब चलते हैं। राम प्रसाद, आ जाओ, अब निकलना है।"
"जी साबजी, अभी आया।" अपने क्लाइंट की छत ठीक करने के ठेके का काम पूरा कर विनोद जी ने निकलते हुए अपने सहायक राम प्रसाद को आवाज दी।
"कहाँ रुक गए थे? राम प्रसाद।" कार में बैठते हुए पूछा।
"वो सर, बस यूँ ही।"
"यूँ ही मतलब? साफ-साफ बताओ?"
"वो सर..., अगले साल फिर यही छत ठीक करने का ठेका मिले इसलिए..., एक छोटा-सा छेद कर आया।"
"क्या! यह तुमने ठीक नहीं किया, राम प्रसाद।"
"आजकल सभी ऐसा ही करते हैं न? साब जी।"
"किसी की समस्या सुलझाने वाले मध्यस्थ खासकर।"
"तुम्हें इन बातों की बहुत जानकारी है!"
"जी साब जी, हमारे घर के आसपास यह बहुत चलता है।"
"अच्छा!"
"दो की लड़ाई में तीसरा मध्यस्थता करता जरूर है, लेकिन कुछ ऐसा चुभने वाला एक को कह देता है, कि कसर रह ही जाती है, फिर दोबारा वे दोनों उसकी शरण में ही जाते हैं, यानी उसकी पूछ-परख बनी रहती है।"
"पूछ-परख..." विनोद जी कुछ अनमने भाव से बुदबुदाए फिर रामप्रसाद से कहा-
"क्लाइंट के घर की ओर गाड़ी मोड़ो।"
"क्यों साबजी? क्या हुआ?"
"..."
क्लाइंट के घर पहुँचकर विनोद ने कहा,
"माफ कीजिएगा सर, छत के काम में थोड़ी-सी कमी रह गई है, अभी-ही पूरा किए देते हैं, ज्यादा समय नहीं लगेगा।"
"ठीक है, कर दीजिए।"
फिर रामप्रसाद को आँखों के इशारे से कसर को पूरा करने के लिए कहते हैं।
भयभीत आँखों से राम प्रसाद "हाँजी सर" कहते हुए, तेज कदमों से अपने छोड़ें निशान मिटाने की ओर प्रस्थान करता है।
