सजग- लघुकहानी
सजग- लघुकहानी
"सर जी सभी मजदूर छब्बीस जनवरी के दिन छुट्टी मिलेगी क्या? पूछ रहे हैं।"
"हाँ, काम से विश्राम जरूर मिलेगा, लेकिन सभी को सपरिवार साइट पर आना है।" कंस्ट्रक्शन साइट के मालिक परेश जी ने बताया।
"अच्छा! मैं बता देता हूँ।"
संदेश सुनते ही सब आपस में खुसुर-पुसुर करते चले गए।
अगले दिन सभी मजदूरों का स्वागत परेश जी ने स्वयं आगे आकर किया, तो सभी अभिभूत हो उठे।
सबके आते ही झंडा वंदन व राष्ट्रगान हुआ, फिर सभी को भोजन कराया गया।
"आप लोगों के बच्चे स्कूल जाते हैं क्या? साथ आए बच्चों की ओर देखकर परेश जी ने पूछा।
कुछ ने हाँ में सिर्फ हिलाया, तो कुछ मौन खड़े रहे। अपनी बात को जारी रखते हुए परेश जी ने बताया,
"मैं पास ही एक स्कूल भी बनवा रहा हूँ। जहाँ आप सभी के बच्चों को मुफ्त शिक्षा व दोपहर का खाना दिया जाएगा। यह अगले सप्ताह से शुरू हो जाएगा।"
"आप हम सबका कितना ध्यान रखते हैं, साब जी।
पहले भी आपने हम लोगों को मेडिकल की मदद दी है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!" कहकर सभी खुशी से तालियाँ बजाने लगे।
"आप सभी अपने आसपास के परिवारों को भी उनके बच्चों को हमारे स्कूल में दाखिला लेने के लिए कहिए।"
"वाह! बेटा, आज तुमने अपनी माँ का सपना लगभग पूरा कर दिया है।"
"पिताजी आप और माँ के आशीर्वाद से ही यह सब आसानी से हो पा रहा है।"
"बस अब एक और काम बाकी है।"
"बोलिए न पिताजी।"
"जितनी जमीन पर यह बिल्डिंग बनी है, पास की इतनी ही बड़ी जमीन खरीद कर एक मिनी जंगल बनाना है।"
"वाह! पिताजी, बहुत बढ़िया।"
"सभी अधिक-से-अधिक प्रकृति से जुड़े, इसके लिए ऐसा करना जरूरी है।"
"जरूर! पिताजी, मैं पास की जमीन खरीदने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू करता हूँ।"
"बहुत बढ़िया और अगली बार से कोशिश करना, कि जब भी बिल्डिंग बनाने के लिए जमीन खरीदो, उस वक्त मिनी जंगल के लिए भी जमीन खरीद लेना, ताकि दोनों काम साथ-साथ चले।"
"हाँ, यही सही रहेगा।"
"देखो बेटा भगवान का दिया बहुत है हमारे पास अब लौटाने की बारी हमारी है।"
"जरूर! पिताजी, ऐसा ही होगा।"
