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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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दादी का कमरा

दादी का कमरा

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 पुराने मित्र के यहाँ से नए घर के उद्घाटन का जब इनविटेशन आया, तो मन प्रफुल्लित हो उठा। लगा, चलो बड़े दिनों बाद मुलाकात होगी, पुरानी यादें ताजा होंगी क्योंकि कोविड के दौर में तो घर में बैठे-बैठे बस परिवार के सदस्यों का ही मुख देखा करते थे। आज बाहर आए तो सब बदला-बदला-सा अच्छा नजर आया। मित्र के घर पहुँचते ही आवभगत हुई, फिर उसने अपनी बेटी से सभी मेहमानों को नया घर दिखाने के लिए कहा। शुरुआत मास्टर बेडरूम से हुई बिलकुल महल जैसा, फाइव स्टार होटल का कमरा, दस झोंपड़ियाँ बेचकर भी न बने। फिर बच्चों का रूम, एकदम आलीशान, किचन और अंत में स्टोर रूम। "यहाँ बेड किसलिए लगा है?" मैंने पूछा।

 "फिर दादी माँ कहाँ सोएँगी? यह स्टोर रूम कम दादी का बेडरूम है।"

 "अच्छा!" चेहरे पर असहज भाव लिए पास खड़ी महिला बुदबुदाई, "आप लोगों से इससे अधिक अपेक्षा और की भी क्या जा सकती है।" यह सुन, मैं भी अपनी हँसी रोक न सकी। फिर धीरे-से उससे बोली, "झोपड़ी का कमरा भी इससे अच्छा होता है।"


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