STORYMIRROR

Shailaja Bhattad

Abstract

4  

Shailaja Bhattad

Abstract

नया एकदम नया

नया एकदम नया

2 mins
6

नया एकदम नया- लघुकथा- डॉ शैलजा भट्टड

 "यह कैसे लिखा है? तुमने शिल्पा।" "क्यों, क्या हुआ? अच्छा नहीं लिखा है।" "तुम्हें अपनी शर्त याद है न?" "हाँ, हमने निर्णय लिया था, कि हमें साहित्य समाज का दर्पण होता है का उलट लिखना है। कुछ नया सोचकर लिखना है।" "सही कहा। सोचना तो तुम्हारे नियंत्रण में था न? फिर अच्छा सकारात्मक सोचती। अपनी सोच को इंद्रधनुषी बनाती, कल्पना के घोड़े दौड़ाती, सोच में तो तुम कहीं भी पहुँच सकती थी न? अपनी सोच को सावन का अंधा बना लेती। सब हरा-हरा लिखती।" "हाँ, मैंने कोशिश तो की थी, लेकिन क्या करूँ समाज ही सोच पर हावी रहा। लिखते समय उँगलियाँ भारी होने लगी। कलम चलने को तैयार नहीं थी। समस्याएँ फिल्म की रील की भाँति आँखों के सामने चलने लगी। बिरजू का नौकरी के लिए गिड़गिड़ाता चेहरा, बोरवेल से पानी न आना, सड़कों के गड्ढे, प्रदूषण, कटे हुए पेड़ों के ठूूँँठ, समाचार पत्रों में छपे अनगिनत नकारात्मक समाचार अब यही सब देख-सुनकर मन में जो रच-बस गया है व्यक्ति उसी दिशा में ही सोचेगा न?" " यही तो कला है न, कि हमें कुछ परिष्कृत सोचना है, सकारात्मक सोच को परिष्कृत करना है, समाज को नया, रचनात्मक दृष्टिकोण देना है।"
लेकिन ये सब मेरी हर कल्पना के पंख कुतर रहे थे। मेरे लेखन का भँवर जाल से निकलना मुश्किल लगता है।" "यह कोशिश तो तुमने पहली बार ही की थी न? बार-बार करो, जारी रखो, कब तुम्हारी सोच आकाशगंगा के पार चली जाएगी, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा। सब कुछ अच्छा होने में समय लगता है, लेकिन होता जरूर है।"
 "अवश्य मेरा अगला लेखन शर्तानुरूप ही होगा। वादा रहा।" "यह हुई न बात!"


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Abstract