Kalyani Nanda

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4.7  

Kalyani Nanda

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सपनों का उडान

सपनों का उडान

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शाम अभी हुई नहीं थी। ठंड का मौसम था। अस्ताचल की और जाते हुए सूरज की गर्मी भी तेज नहीं थी। पार्क में बच्चे, बूढे, युवक, युवती की भीड थी। ऐसी भीड देखकर बबलू का मन खुश हो जाता था, क्यों कि उसकी मूंगफली की बिक्री अच्छी होती थी। बबलू, दस साल का छोटा बच्चा। माँ के सिवा दुनिया में उसका कोई नहीं था। एक बडे बाबू के घर उसकी माँ रसोई से लेकर सारे घर का काम करती थी। उस बाबू के घर के पिछवाड़े एक छोटे से घर में दोनो माँ, बेटे रहते थे। बाबू के घर से जो कुछ मिलता था उससे माँ, बेटे की गुजारा हो जाती थी।

बबलू पास में एक सरकारी स्कूल में पढता था। स्कूल की छुट्टी के बाद वह इसी पार्क में जाकर मूंगफली बेचने का काम करता था। शाम होते ही घर लौटकर अपनी पढाई करता था। रोज सुबह जल्दी उठकर बाबू के घर के सामने एक सुन्दर बगीचा था। एक बूढा माली वहाँ रोज आकर पेड, पौधे की देखभाल करता था, पेडों में पानी देता था। उस बूढे माली के साथ बबलू भी कभी कभी पानी दे दिया करता था। फिर उसके बाद माँ ने जो भी खाने के लिए रखी होती उसे खाकर स्कूल चला जाता। अच्छी पढाई करके एक दिन वह एक बडा इंजिनियर बनना चाहता था। इसीलिए माँ के मना करने पर भी वह मूंगफली बेचकर पैसा जमा करता था, ताकि आगे कभी माँ की मदद कर सके, अपने सपने को पुरा कर सके। वैसे अभी वो बच्चा था। उसके अभी के एक सपना था,

कि वो एक साइकिल खरीदे, और उस साइकिल पर सवार होकर स्कूल जाए, जैसे दुसरे बच्चे आते थे। उनकी तरह जोर जोर से साइकिल में हवा की तरह जोर जोर चलाकर सबसे आगे हो जाए, सबको चकित कर दे, अपनी माँ को भी। उसकी माँ भी जानती थी अपने बेटे की ख्वाहिशों के बारे में। रात को सोते हुए सपने देखकर बड़बड़ाता रहता था बबलू, " देखो मेरा साइकिल, कैसे हवा की तरह चलती है, मेरी साइकिल, उडान खटोला है,मैं इस साइकिल में आकाश में भी उड़ सकता हूँ।" ऐसा ना जाने क्या क्या बड़बड़ाता रहता सोते हुए। पहले उसकी माँ बच्चा समझ कर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी। लेकिन बबलू के मन में बस साइकिल की सवारी करने का मन तथा स्वप्न भी था।

रोज सुबह बगीचे में माली दादा के साथ जब वो पानी देता था तभी बडे बाबू की बेटी जो उससे दो, तीन साल बडी होगी, उसको साइकिल चलाते देखता था। लाल रंग की साइकिल, हैंडल पर दोनो तरफ दो घंटी, एक सुन्दर वास्केट, बबलू का मन उसी में अटका रहता। काश उसके पास भी ऐसी साइकिल होती। पर उनके पास इतने पैसे कहाँ है जो उसकी माँ उसके लिए खरीद देगी। मन मार कर रह जाता बेचारा। एक दिन जब वो स्कूल से लौटा, देखा कि उसके घर के सामने वही साइकिल थी। यहाँ कैसे आई ये साइकिल? पास जाकर उस साइकिल को सहलाया, और वहाँ खडे हो कर निहारता रहा। " क्यों बबलू, पसन्द है तुझे ये साइकिल? चलाएगा?" चौंक पडा बबलू। देखा पास खडी है बडे बाबू की बेटी। उसको देखकर हड़ बडा गया बबलू, " नहीं दीदी, " इतना कहकर सर झुकाकर खडा रहा। तभी मालकिन, जो दीदी की माँ थी वहाँ आई, और बोली," हाँ बबलू, ले लो, अब से ये साइकिल तुम्हारी है, पुरानी है पर ज्यादा पुरानी नहीं है। ले लो।" " नहीं, ये तो दीदी की है, मैं कैसे ले सकता हूँ।"" हाँ उसकी थी, अब तुम्हारी है। दीदी के लिए हम नयी ला देंगे। वह बडी हो गयी है,इसीलिए ये साइकिल उसके लिए छोटी हो रही है। ये अब तुम्हारी है।"

मालकिन ने जब इतना कहा तो बबलू साइकिल को छुआ,और बैठकर चलाने की कोशिश करने लगा। उसकी खुशी देखकर पास खडे उसकी माँ, दीदी, दीदी की माँ सब हँस रहे थे। और बबलू ना जाने किस दुनिया में था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। नींद में देखा सपना इतनी जल्दी सच हो जाएँगे उसने तो सोचा भी नहीं था। कुछ दिनों में वह साइकिल चलाना सीखगया। और जैसा वो सोचता था कि अपने स्कूल के दोस्तों को कभी ना कभी साइकिल होने से उनसे भी आगे जाएगा, वो सपना अब पुरा हो रहा था। बहुत ही खुश था उसका ये बाल मन। उसका पहला सपना एक उडान भर लिया था, आगे तो और भी सपनों को उडान देना बाकी था बबलू का।


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