Kalyani Nanda

Abstract


4.6  

Kalyani Nanda

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दर्द से भरा गुल्लक

दर्द से भरा गुल्लक

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ये यादें भी बड़ी अजीब होती है। न चाहते हुये भी जेहन पर छा जाती है। वक्त बेवक्त आ जाती है। खुशी की यादें एक मुस्कुराहट लाती है, पर दर्द की यादें पुरे तन, मन को झिंझोड़ देती है। आज मैं बहुत खुश था। क्यों न होता। मेरी बेटी की शादी जो होनेवाली है। दो दिन बाद ब्याह करके ससुराल चली जाएगी मेरी बेटी, हाँ मेरी ही तो बेटी। अचानक मुझे ख्याल आया कि मैं तो अलमारी से रूपये निकालने आया था, और किस ख्याल में ड़ुब गया।

अलमारी खोलकर पैसे निकाला, तभी मेरी नजर कोने में रखे गुल्लक पर पड़ी। एक पिगी बैंक था, गुलाबी रंग का, टीन का था।थोड़ा जंक लग गया था। उसके पास छोटी सी मिट्टी की बनी, थोड़ी टेढी मेढी सी एक छोटी गुल्लक भी थी। मैंने उन दोनो गुल्लक निकाला और उसे लेकर पलंग पर बैठ गया। मेरी आँखे आँसू से भर गये थे। बहुत सारी बातें मन में आ रहे थे। वैसे भी आज सवेरे से ही मेरा मन भारी भारी सा था। अब तो आंसू छलक छलक कर बह रहे थे।

खुद को रोक नहीं पा रहा था। बीस साल बीत गये। पता न चला।याद आ रही थी वो सारी बातें।वो मनहुस रात। दीवाली की रात थी। चारों तरफ दीये जगमगा रहे थे। मैं अपने छोटे भाई के घर फल, मिठाई, फटाके सब लेकर अपनी पत्नी मीता और मेरी दो साल की बेटी को लेकर शाम को ही पहुँच गया था। सब बहुत खुश थे। मेरा भाई राजेश का दस साल का बेटा सोनु और तीन साल की बेटी रानी और भाई की पत्नी नीलू ही उसके परिवार में थे। नीलू बहुत सुन्दर थी। उस दिन वह और भी प्यारी लग रही थी। पीले रंग की कांजीवरम साड़ी में बहुत खुबसूरत लग रही थी। उसकी बेटी भी उसकी जैसी सुन्दर थी। बच्चे आपस में खेलने लगे।दोनो औरतें रसोई के काम में लग गये।

तभी सोनु अपना पीगी बेंक लाकर मुझे दिखाने लगा और मुझे कहा, " बड़े पापा, कुछ पैसे दीजिए, मैं इस गुल्लक में ड़ालूंगा। "। मैंने उसे दस का एक नोट दिया और पुछा," सोनु, इस पैसे से क्या खरीदेगा ?" " मैं कुछ नहीं खरीदूंगा, बस एक पेंटिग बक्स खरीदूंगा और जब रानी बड़ी होगी उसके लिए एक दुल्हा खरीद कर उसकी शादी कराऊंगा।"उसकी बात सुनकर हम सब हंस पड़़े थे। उसने अपने हाथ से एक छोटा मिट्टी का एक गुल्लक बनाया था। वह इस तरह मिट्टी से कुछ न कुछ बनाता था। बच्चा था फिर भी कोशिश करता रहता था। वो गुल्लक भी ज्यादा अच्छा तो नहीं बना था, लेकिन फिर भी अच्छा था। मैं ने जब उसे पूछा कि, " इस छोटे गुल्लक का क्या करोगे ?" तब उसने कहा कि वह उस गुल्लक को अपनी बहन को दहेज में देगा। हम सब उसकी बात पर हंसने लगे। फिर बाहर गये फटाके छोड़ने के लिए।

सब बहुत मजे से, हंसते हुए फटाके जला रहे थे। नीलू भी फुलझड़़ी जला रही थी और मीता दोनो बच्चियों को अपने पास बिठा कर बरामदे में बैठी थी। तभी अचानक एक रॉकेट बम आकर नीलू के ऊपर गिरगयी और नीलू की कांजीवरम की साड़ी हू हू होकर आग पकड़ ली और फिर नीलू चिल्ला रही थी। इधर उधर दौड़ रही थी,फिर नीचे गिर गयी। मैं अन्दर से कम्बल लाकर उसे ओढाता, तब तक नीलू पुरा जल गयी थी। राजेश और हम सब कुछ सोच नहीं पा रहे थे। देखते देखते क्या से क्या हो गया। नीलू को हम बचा नहीं पाए। राजेश तो जैसे पत्थर सा हो गया था। वह अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था। सोनु भी चुपचाप रहता था। बहुत मुश्किल की घड़ी थी। दिन बीत रहे थे।

लेकिन नीलू के जाने के दो साल के अन्दर राजेश भी अपने दोनो बच्चो को मेरे हवाले करके नीलू के पास चलागया। दोनो बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे। मैं उनके बड़े पापा से पापा और मीता ममी बन गये थे। आज राजेश की बेटी बड़ी हो गयी है, उसकी शादी है। मैं राजेश और नीलू के बारे में सोच रहा था। आज अगर वे दोनो होते तो कितने खुश होते। ये सोच कर मेरे आँखो से आंसू बहने लगे। मुझे पता न चला कि कब सोनु और मीता मेरे पास आ कर खड़े थे। सोनु जो चुपचाप रहता था, वास्तव में उसके मन में अपने माता, पिता के इस तरह अचानक चले जाने से गहरा सदमा पहुंचा था। मन में एक अभिमान था। उसने जब उस गुल्लक को देखा उसे उठाकर कहा, " इसका अब क्या काम ?

फेंको इसको, इतना कहकर कर जब फेंकने को हुआ तो मीता ने उसे रोक कर गुल्लक उसके हाथ से ले लिया, कहा," क्यों सोनु,क्यों फेंकोगे इसे ? कितनी यादें जुड़ी है इसमें। कैसे भूल सकते हो। तेरे पापा ने दिया था तुम्हें और इसे तू फेंक देगा ?" " क्या करूंगा इसे रखकर, जिसे रहना था वे तो छोड़ गये हमे।"सोनु ने कहा। बहुत दर्द भरे थे उसके दिल मे। तभी रानी अन्दर आई। उसने उस गुल्लक देख कर खुशी से उसे लेकर पुछा, " पापा ये किसका है "?" ये सोनु का है और ये छोटा वाला तेरा है, सोनु ने बचपन में तेरे लिए बनाया था।" " तो पापा चलो देखते हैं इसमे कितने पैसे हैं।"

इतना कहकर उसने बड़ा वाला गुल्लक नीचे से खोल कर देखा पुराने सिक्के थे।सब पैसे निकाला और बोली " पापा ये अब किस काम की ? ये तो पुराने सिक्के हैं। इसका क्या मोल है अब ?" " बेटी ये अनमोल है। तेरे ममी, पापा की यादगार है।" मैं ने कहा। तभी मेरी निगाहें एक मुड़ी हुई कागज पर पड़ी। उसे उठाया और खोलकर देखा, एक चिट्ठी थी,राजेश, मेरे भाई ने लिखा था सोनु को, अपने बेटे को। चिट्ठी सोनु को देकर कहा," सोनु बेटा ये तेरे लिए है, ले पढ़।" सोनु लेना नहीं चाहता था, मैं ने जबरदस्ती उसको दिया और पढने के लिए कहा। सोनु ज्यों ज्यों चिट्ठी पढता गया, उसकी आंखो से आँसू बहते गये। अंत में अपने आप को संभाल नहीं पाया, मुझे पकड़ कर जोर जोर से रोने लगा।

मैं ने भी उसे रोने दिया। राजेश ने लिखा था, " सोनु बेटा, तेरी माँ के जाने के बाद मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा हूं। लेकिन तेरा और रानी बेटी का ख्याल जब आता है मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है कि मैं क्या करूँ ?ज्यादा सोचने पर सीने में एक दर्द महसूस होता है। और ये दर्द एक दिन ज्यादा बढ गया।

मैं ने किसीको नहीं बताया। ड़ाक्टर को जाकर दिखाया था। उसने जो दवाई दी थी उसे ले रहा हूँ, पर मुझे लगता है कि मैं ज्यादा दिन नहीं बच पाऊँगा। अगर मुझे कुछ हो गया तो तू घबराना नहीं। रानी की जिम्मेदारी तेरी है। तू ही उसके लिए माँ, बाप सब है।और तेरे लिए तेरे बड़़े पापा और ममी सब कुछ हैं। तू मेरा राजा बेटा है। जानता हूँ तू सब संभाल लेगा। मुझे तुम दोनो के बारे मे सोचकर जितनी चिन्ता होती है उतना दुःख भी होता है।

तुम दोनों को कभी मुझे छोड़कर जाना पड़ेगा ये सोचकर मैं ओर भी घबरा जाता हूँ। अगर मेरा कुछ हो गया तो बेटा मुझे माफ कर देना। सारी जिम्मेदारी निभाना मुझको है पर तुझे सौंप दिया। " बस इतना लिख पाया था शायद वह, क्यों कि चिट्ठी के नीचे ओर कुछ लिख नहीं पाया था वह, आंसू के बूंदे ही बूंदे गिर कर स्याही के साथ बह गये थे। मेरी बेटी आ कर सबको बाहर जाने के लिए कहने लगी। मै सब को देख रहा था। सच समय कितने जल्दी बीत जाते हैं। जाने वाले तो चले जाते हैं,जो रह जाते हैं बस दर्द को समेट कर जीते रहते हैं। मैं ने बड़ा वाला गुल्लक सोनु को दिया और छोटा वाला रानी को दे कर कहा ये तुम दोनो के लिए तुम्हारे ममी,पापा के धरोहर है। इसे संभाल कर रखना। ये गुल्लक नहीं तुम दोनो के ममी, पापा हैं। चलो आंसू पोछ लो। आंसू बहाने से उनकी आत्मा को कष्ट होगा। वे दोनो तुम्हारे पास ही हैं। मैने दोनो को अपने बाहों में ले कर बाहर की ओर चला। बाहर के शोरगुल में हम सब के दिल के दर्द भरी आवाज दब सी गयी।


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