Kalyani Nanda

Drama


3.9  

Kalyani Nanda

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जीवन का एक नया रंग

जीवन का एक नया रंग

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शाम होने वाली थी। सूरज धीरे धीरे ढल रही थी। अस्ताचल सूरज की किरण पश्चिम आकाश को अपने रंगों से रंजित कर रही थी। रोशनी छत पर बैठी उन रंगो को देख रही थी, जो कभी उसके जीवन को भी रंगीन किया था। अब वो रंग बेरंग हो गया है। एक सूनापन घिर गया था उसकी जिन्दगी में। फीकी फीकी जिन्दगी रोशनी को एकदम से तन्हा कर गयी थी। जब सूरज उसकी जिन्दगी मे आए थे, तो रंगो की जैसे बरसात हो गयी थी। प्यार के हर रंग से उसे भीगो दिया था उसने। सूरज से रोशनी की शादी को छह साल गुजर गये हैं।

इन छह साल में रोशनी के जीवन में कितना बदलाव आ गया था। आज भी जब उन दिनो की याद उसे आती है, उसकी आँखों में आँसू आ जाते। उस दिन भी ऐसी सुन्दर शाम आयी थी। लेकिन रोशनी या सूरज को पता नहीं था कि उस रंगीन शाम उनके जीवन को ऐसे रंगहीन बना देगी। उस शाम सूरज रोशनी को लेकर लंग ड्राइव पे निकले थे। बहुत ही हसीन शाम थी वह। सूरज और रोशनी दोनो बहुत खुश थे। लेकिन विधि का विधान ही कुछ ओर था। थोडी सी नजर हटी कि नहीं, बस सब कुछ पलट गया। उनकी गाडी सामने आती एक गाडी से टकराई और सूरज की तरफ गाडी पलट गयी जिससे सूरज के माथे पर बहुत जोर से चोट लगी थी और खून बहुत निकल रही थी।

सूरज को होश नहीं था। रोशनी को ज्यादा चोट नही आयी थी, लेकिन सूरज की बहते खून देखकर वह बेहोश हो गयी थी। लाल रंग की खून बहुत ही अधिक मात्रा में बह रही थी। शायद रोशनी की जिन्दगी के सारे रंग उसी बहती खून के साथ बह गयी थी। कैसे वे दोनो हस्पताल गये,रोशनी को कुछ पता न था। जब उसे होश आया तो सब कुछ खत्म हो गया था। सूरज उसकी जिन्दगी से बहुत दूर चले गये थे, कभी न लौटने के लिए। और रोशनी के जीवन में जैसे सूनापन के सिवा कुछ रह नहीं गया था। सूरज के जाने के बाद रोशनी अपने सास, ससुर के पास थी।

मायके मे जाना नहीं चाहा था उसने। वहीं सूरज की याद को समेटे ससुराल में रह गयी। सास, ससुर उसकी बहुत ख्याल रखते थे, अपनी बेटी जैसी प्यार करते थे। एक ननद भी थी उसकी। वह उसकी बहन जैसी थी पर सहेली ज्यादा थी। कुछ दिन लग गये रोशनी को अपने उस बेरंग जीवन को अपना बनाने में। कुछ दिन बाद रोशनी एक स्कूल में नौकरी पर लग गयी। उससे उसके मन का सूनापन थोडा कम हुआ।

जितनी देर वह स्कूल में रहती, स्कूल के बच्चों के साथ रहकर अपने गम को थोडी देर के लिए भूल जाती थी। स्कूल से लौटने के बाद उसका मन फिर से तन्हाई में गुम हो जाती थी। इसीलिए वह शाम को छत पर जाती, गमले मे लगी पौधे को पानी देती और रात आने तक वहाँ बैठकर सूरज के ख्यालों में डूब जाती। आज भी वह छत पर बैठी थी। तभी उसकी ननद उसे ढूँढती हुई वहाँ आई और बोली," अरे भाभी, चलो ना बाजार चले, मुझे कुछ सामान लाना है, कुछ किताब भी खरीदनी है।" " अब तो रात होने वाली है,कल दिन में जाऐंगे।" रोशनी के यह कहने पर उसकी ननद सुमी ने कहा," नहीं भाभी अभी चलते हैं। दिन को गर्मी बहुत होती है। जल्दी लौट आएंगे।"

रोशनी मना नहीं कर पायी। रोशनी को कुछ ड्रेस खरीदने थे। उसके बाद दोनो किताबों के स्टोर गये। रोशनी वहाँ अपनी किताब देख रही थी और रोशनी अकेली एक जगह पर खडी सुमी की इन्तज़ार कर रही थी। तभी अचानक रोशनी किसी को उसके नाम से पुकारते हुए सुनकर चौंक कर पलट कर देखा तो उसके पीछे आदित्य को खडा देखकर चौंक गयी। आदित्य उसके साथ कॉलेज में पढ रहा था। वह रोशनी को बहुत प्यार करता था लेकिन कभी इजहार नहीं किया था। रोशनी और वह दोनो ग्रेजुएशन के बाद अलग हो गये थे। रोशनी की शादी हो गयी थी और आदित्य कॉम्पीटीटीव परीक्षा देकर फॉरेस्ट अफसर हो गया था। रोशनी उसे वहाँ देखकर थोडा आश्चर्य हुई पर फिर उसने आदित्य को उसके बारे में पुछा कि वह वहाँ क्या कर रहा है। " मेरा यहां तबादला हुआ है।

चार महीने हुए यहाँ आए। पर मुझे मालूम न था कि तुम यहाँ हो।" आदित्य ने कहा। तभी सुमी आ गयी। रोशनी आदित्य से सुमी का परिचय कराया और फिर चलने के लिए निकले। तभी आदित्य के बहुत कहने पर वे दोनो उसकी गाडी में बैठकर घर गये। इसके बाद एक दिन आदित्य रोशनी के घर आया।

उसके सास, ससुर से मिला। इसी तरह दो चार बार उसका आना जाना हुआ और इतने कम दिनो में वह सबसे धूलमिल गया। वैसे वह था भी बहुत मिलनसार। रोशनी के सास, ससुर को आदित्य अपने बेटे सूरज की याद दिला देता था, इसीलिए शायद वे उसे चाहने लगे थे। इसी तरह आने जाने में एक दिन उसने रोशनी के सास, ससुर को अपने मन की बात बताई कि वह रोशनी से शादी करना चाहता है। वे दोनो बुज़ुर्ग भी चाहते थे कि रोशनी की फिर से शादी हो जाए, उसका घर बस जाए। रोशनी के मन का दुःख वह महसूस करते थे।

उसे वे लोग खुश देखना चाहते थे। लेकिन रोशनी को राजी कराना मुश्किल था। आदित्य ने भरोसा दिलाया कि वह उसे राजी कराएगा। तभी होली का त्योहार आया। उस दिन कुछ फल और मिठाई लेकर आदित्य रोशनी के घर आया। कुछ रंग भी लाया था। आज वह सोचकर आया था कि जैसे भी हो रोशनी को मनाएगा। सबको थोडे रंग लगाया और रोशनी के पास जाकर उसे कहा, " रोशनी, आज मुझे मना मत करो। तुम्हे रंग लगाने दो। मैं तुम्हे ऐसे रंगहीन जीवन जीते देखना नहीं चाहता। तुम्हारे जीवन में हर रंग भर देना चाहता हूँ।

तुम्हें तो मै कॉलेज के दिनो से प्यार करता हूँ, तुम्हारी पूजा करता हूँ। मेरा प्यार पवित्र है। तुम्हे मैं इस तरह अकेली, तन्हा देख नहीं सकता। तुम मुझे ये सारे रंग तुम्हारे जीवन में भर लेने दो। " रोशनी उसे एकटक निहार रही थी। उसकी बातों में उसे कोई छल,नजर नहीं आती थी। उसे उसके सास, ससुर भी बात कर चुके थे। उसने भी इतने दिनो में आदित्य का व्यवहार अच्छा लगने लगा था।

उसकी चुप्पी देखकर आदित्य ने हिम्मत करके उसके मुख और माथे में वे सारे रंग जो उसके हाथो में था लगा दिया। लाल, हरा, पीला, नीला सारे रंगो से रोशनी का चेहरा चमक उठा। सबके चेहरे खुशी ही खुशी थी। तभी रोशनी के माता, पिता भी वहां आ गये और दोनो को आशीर्वाद दिए। रोशनी अपने माता, पिता को वहाँ देखकर आश्चर्य हो गयी थी लेकिन बाद में जब उसके ससुर ने बताया कि उन्होने ही उन दोनो को बुलाया है उसकी शादी की बात करने के लिए तो पहले रोशनी थोडी सी मुस्कुराई और फिर लजागयी। आज उसे लग रहा था जैसे उसके सुरज फिर से लौट आए हैं। होली के रंग से उसके जीवन फिर रंग गया है और एक नयी जिन्दगी जैसे उसको देखकर मुस्कुरा रही है।


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