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Priyanka Gupta

Abstract Inspirational Others

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Priyanka Gupta

Abstract Inspirational Others

सपने अपनी औकात के अनुसार ही देखने चाहिए!!!

सपने अपनी औकात के अनुसार ही देखने चाहिए!!!

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"अपनी कामयाबी को इतना छोटा भी मत समझो सिर्फ नसीबवालों को नसीब होती है यह। तुम प्रतियोगिता के दो चरणों को पार करके तीसरे चरण में सफलतापूर्वक पहुँचने वाले कुछ भाग्यशाली लोगों में रहे हो।" सुदर्शन अपने सबसे प्रिय विद्यार्थी आशुतोष को समझा रहे थे। 

आशुतोष सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था और यह उसका अंतिम प्रयास था। इस तैयारी के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा रखा था। उसने सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए डिपार्टमेंट ऑफ़ पोस्ट की ब्रांच पोस्टमास्टर (BPM )की नौकरी तक छोड़ दी थी। नौकरी मिलने के बाद भी वह ज्वाइन करने नहीं गया था। 

ग्रामीण पृष्ठ्भूमि के आशुतोष को उसके पिताजी ने कितना समझाया था कि "कलेक्टर -वलेक्टर बनने के सपने छोड़ दे। सपने अपनी औकात के अनुसार ही देखने चाहिए। पोस्टमास्टरी कर और सुख से रह।"

लेकिन आशुतोष नहीं माना था तब भी उसके दिमाग में अपने आदर्श हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के यही शब्द थे कि" सपने ऐसे देखो जो तुम्हें सोने न दे।"

आशुतोष साहूकार से क़र्ज़ लेकर अपने सपने पूरे करने के लिए दिल्ली आ गया था। वह सिविल सर्विसेज का मक्का कहे जाने वाले मुखर्जी नगर में रहने लगा था। अपने खर्चों की पूर्ति के लिए वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा था। पहले प्रयास में ही उसने प्री यानि की प्रतियोगिता का प्रथम चरण पास कर लिया था। कुछ नंबरों से ही उसका मैन्स रह गया था और उसका इंटरव्यू कॉल नहीं हुआ था। 

आशुतोष तब सुदर्शन सर के संपर्क में आया था। फिर वह सुदर्शन सर की कोचिंग के लिए कंटेंट राइटिंग भी करने लगा था इससे उसकी तैयारी भी हो रही थी और आर्थिक सहारा भी मिलता था। अपने दूसरे प्रयास में वह साक्षात्कार तक पहुँचा था लेकिन अंतिम रूप से चयनित नहीं हो सका था। 

अब उसने सर की कोचिंग में क्लासेज लेना भी शुरू कर दिया था और सर की सलाह पर नेट -JRF भी पास कर लिया इससे उसे स्कॉलरशिप मिलने लगी थी। आशुतोष अब धीरे -धीरे साहूकार का क़र्ज़ भी लौटाने लगा था। आशुतोष से पढ़े हुए विद्यार्थी चयनित हो रहे थे लेकिन आशुतोष हर प्रयास में साक्षात्कार तक पहुँचकर भी असफल था। सफलता का स्वाद वह चख नहीं पा रहा था। 

अपने इस अंतिम प्रयास में तो उसने अपनी जी -जान लगा दी थी उसने अपने आपको तैयारी में झोंक दिया था। न दिन को दिन देखा और न रात को रात। अब आशुतोष को ही नहीं सबको उससे पूरी उम्मीद थी कि इस बार अंतिम रूप से चयनित कैंडिडेट की सूची में उसका नाम होगा। आशुतोष अपने सिलेक्शन पर मीडिया से क्या कहेगा इसके लिए भी सिविल सेवा एग्जाम के साक्षात्कार के बाद से ही तैयारी करने लगा था। वह इस बार अपने सिलेक्शन को लेकर 200 % sure था। जितनी ज्यादा बड़ी उम्मीद होती है असफलता का झटका भी उतना ही बड़ा लगता है। 

आशुतोष के सपने तो मुँगेरीलाल के हसीन सपने भी नहीं थे उसने अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए बहुत मेहनत भी की थी। लेकिन अफ़सोस मेहनत का कोई प्रतिफल नहीं मिला। 

"सर उससे क्या फर्क पड़ता है। अंतिम रूप से तो मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ। पिताजी ने ठीक ही कहा था अपनी औकात में रहकर सपने देखो। मुझे क्या मिला ?एक स्टेबल नौकरी तक नहीं है मेरे पास।" आशुतोष ने रूँधे गले से कहा। 


"आशुतोष तुम्हें ज्ञान मिला है। सरस्वती के धन को तुमसे कोई चुरा नहीं सकता। तुमने जो पढ़ाई की है वह कहीं न कहीं काम जरूर आएगी। अभी भी तुम टीचिंग तो कर ही रहे हो। तुम्हारे जैसे गाइड टीचर और दोस्त की जरूरत बहुत से तैयारी करने वाले बच्चों को

होती है।" सुदर्शन सर ने समझाया। 


"सर आप सिर्फ मुझे सांत्वना देने की कोशिश कर रहे हो।" आशुतोष ने कहा। 

"आशुतोष ईश्वर ने तुम्हारे लिए शायद इससे भी बेहतर कुछ सोच रखा है। अपने आप पर भरोसा रखो अपने आप पर भरोसा रखना ही ईश्वर पर भरोसा है। तुम गरीब और मेधावी बच्चों को तैयारी करवाओ। मेरे कुछ चयनित विद्यार्थी इस काम में तुम्हें आर्थिक सहायता देंगे। वाकई में उनमें से कुछ तुमसे पढ़े हुए भी हैं।" सुदर्शन सर ने कहा। 

"जी सर अब तो यही एक विकल्प है।" आशुतोष ने कहा। 

सर की बात मानकर आशुतोष ने मेधावी बच्चों को स्कॉलरशिप टेस्ट के जरिये चुना और उन्हें तैयारी करवाना शुरू कर दिया। 5 साल में आशुतोष द्वारा पढ़ाये गए बच्चों में से 60 बच्चे अंतिम रूप से चयनित हुए। आशुतोष सिविल सर्विसेज फैक्ट्री नाम से प्रसिद्ध हो रहा था। उसे राज्य सरकार द्वारा एक विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 


"सर आपने सही कहा था। ईश्वर ने मेरे लिए कुछ और बेहतर सोच रखा है।" आशुतोष ने अपना पुरस्कार सर के चरणों में रखते हुए कहा। 



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