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Neha Bindal

Abstract Inspirational


4  

Neha Bindal

Abstract Inspirational


समर्पण

समर्पण

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उस बड़े से अस्पताल के एक कैबिन से निकलते हुए पैर थरथरा रहे थे मेरे। आँखों के आगे जैसे अंधेरा सा छाया हुआ था और दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था। पलकों के पर्दे पर कुछ लम्हे चल रहे थे मेरे।

चाय की ट्रे पकड़े शरमाती, सकुचाती, और धीमे कदमों से चली आती वो!

शादी के मंडप में मुझ संग फेरे लगाती वो!

मेरी हर छोटी छेड़खानी पर आँसू की एक नन्ही बूँद गिराती वो!

समाज के सामने, औलाद न दे सकने के लिए ताने सुनती वो!

बस चंद कदमों की दूरी से उसे बचाने में नाकामयाब हो गया था मैं, बिल्कुल मेरे सामने उस तेजी से आती कार ने उसको एक दफा हवा में उछाल कर नीचे ज़मीन में ला पटका था।

एक हफ़्ते से वो मशीनों से घिरी वेंटिलेटर पर थी।

तरह तरह की जाँचों के बाद आख़िर आज डॉक्टर ने जवाब दे दिया था।

"दिमाग का एक हिस्सा बुरी तरह चोटिल हुआ है अनीश। टेस्ट्स से तो यही मालूम पड़ता है कि ऑपेरशन के बाद, परिणाम कुछ भी हो सकते हैं। वो कोमा में जा सकती है, अपनी मेमोरी पूरी तरह या पार्शियली खो सकती है या फिर पूरी तरह या कुछ हिस्सों से पैरालाइज़ हो सकती हैं। कुछ भी हो सकता है!"

"और अगर ऑपेरशन न कराया जाए?"

"कोई वेंटिलेटर पर कब तक ज़िंदा रह सकता है अनीश? तुम पेमेंट करते जाओ, हम उन्हें वेंटिलेटर पर रख छोड़ेंगे।"

डॉक्टर ने तो सीधा व दो टूक जवाब दे दिया था लेकिन मेरे मन में हलचल मची थी।

बाहर आकर माँ पापा को बताया तो माँ बोलीं," बेटा, देख, जो भगवान की मर्ज़ी थी वो हुआ। अब हमारे हाथ में कुछ नहीं। डॉक्टर ने जो भी कहा, अगर उसके मुताबिक़ कुछ भी हुआ तो जीवन भर के लिए वो तुझपर बोझ बन जाएगी। एक बच्चा तक तो तुझे दे न सकी...."

मेरी आँखों को देख माँ की आगे बोलने की हिम्मत न हुई।

तो क्या करूँ? उसे मरने के लिए छोड़ दूँ?

मैं कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था।

उस गुमशुदगी की हालत में मैं बस ड्राइव कर रहा था औऱ उस मनहूसियत भरी रात में मैं तब तक ड्राइव करता रहा जब तक गाड़ी ने डीज़ल ख़त्म होने का सिग्नल न दे दिया।

होश आया तो देखा कि शहर से कोसों दूर निकल आया हूँ। चारों और सनसनाती हवा के बीच काली रात के साये में काले लगते पेड़ मुझपर जैसे झुक से रहे थे।

मैं चारों और देखने की कोशिश कर रहा था कि मैं कहाँ आ गया हूँ। फ़ोन का जीपीएस चेक किया तो उसके नेटवर्क डाउन मिले। 

लैपटॉप खोलकर देखा तो उसकी बैटरी डाउन! ये हो क्या रहा था, मुझे उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था। आस पास देखा तो मुझे कुछ नज़र नहीं आया।

गाड़ी को रिज़र्व मोड में डालकर मैं कुछ आगे बढ़ा तो तीन चार घरों की एक पंक्ति मुझे दिखी।

इतनी रात हो चुकी थी, ज़ाहिर से बात थी कि सब सो चुके थे। मुझे अटपटा सा लग रहा था इतनी रात को किसी को जगाना लेकिन जगाना ज़रूरी भी था।

एक तो यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मालूम, दूसरे पेट ने अब माँग रखनी शुरू कर दी थी। कितने भी ग़म में हो इंसान, ये पेट अपनी शर्म खोकर मांगें ज़रूर रखता है!

ख़ैर, आगे बढ़कर मैंने तीन दरवाजें खटखटाये, लेकिन एक से भी जवाब न मिला। शायद सभी आलस में थे!

चौथे दरवाजे पर पहुँच मैंने बहुत ही आरज़ू लिए कुंडा खटखटाया और 2 मिनट में ही दरवाजा खुल गया।

सामने मेरे एक प्रौढ़ महिला थीं।

उन्होंने मुझे जिज्ञासा भरी नज़रों से देखा तो मैंने उन्हें अपनी स्थिति से अवगत कराया। बाहर खड़ी कार की ओर एक नज़र डाल उन्होंने मुझे भीतर आने को कहा और कुछ सकुचाता, झिझकता सा मैं भीतर चला आया।

घर क्या था! घर के नाम पर चंद ईंटों, गारा और घास पूस को मिलाकर रहने के लिए एक ठौर खड़ा कर लिया गया था।

एक लकड़ी के फट्टे, जिसको कुछ ईंटों पर टिकाया गया था, की ओर इशारा करते हुए, उन्होंने मुझे बैठने को कहा और मैं घर का मुआयना करता हुआ उसपर जा बैठा।

उस घर के एक कोने में चंद मिट्टी और काँसे के बर्तन थे, एक सुंदर व साफ लीपा हुआ चूल्हा, उसके बराबर में कटी छँटी कुछ लकड़ी के टुकड़े और चंद डिब्बे थे, जिनमें शायद कुछ खाने का सामान था।

इसे देखकर ये अहसास हुआ कि औरतें चाहे किसी भी दशा में हों, घर के इस एक हिस्से को बड़े ही जतन से सम्भालती हैं।

दूसरे कोने में एक लोहे की बाल्टी में कुछ कपड़े थे और उसी के बराबर में गिनती के कुछ कपड़े, नीचे लीपी हुई ज़मीन पर एक कपड़ा बिछाकर जमाये हुए थे, साफ़, करीने से।

घर के मुआयने को विराम लगा जब वे पानी का ग्लास लिए मेरे सामने आ खड़ी हो गईं।

पानी पीकर मैंने उन्हें धन्यवाद दिया ही था कि घर के तीसरे कोने से एक आवाज़ आई।

वो झट वहाँ गईं। एक खाट पर एक प्रौढ़ पुरुष लेटे थे, उनके मुँह से निकलती लार को उन्होंने पास ही में रखे एक कपड़े से साफ किया और एक बार मुस्कुराकर उन्हें देखा। बदले में उन्होंने भी इनकी तरफ एक कंपकंपाती मुस्कुराहट दी। उनके हाथ पर हाथ रख ये वापिस चली आईं।

आँखों से शायद कुछ कह भी आई थीं।

ये एक लम्हा ऐसा था जिसे कि प्रेम की पराकाष्ठा कहा जा सकता है। इतना संयत व इतना पावन।

वापिस वो मेरे पास आईं और मेरी आँखों में चंद सवाल तैरते देख बोलीं," मेरे पति हैं!"

"इस अवस्था में? कैसे?"

थोड़ा हिचकते हुए वो बोलीं, "चार साल पहले एक घर की पुताई करते हुए चौथे माले से गिर पड़े थे। तब से ऐसे ही हैं। शरीर का कोई हिस्सा काम नहीं करता, बस आँखें ही बोलती हैं। मुँह खोल तो लेते हैं लेकिन बोल नहीं पाते।"

उनकी आँखों के कोर पर मोती उभर आया था। साड़ी के कोने से उसे पोंछती हुई बोलीं, "भूख लगी है?"

एक अनजान इंसान के मन की बात भी कैसे चुटकियों में पढ़ लेती हैं न ये औरतें!

मैंने हाँ में सिर हिला तो दिया लेकिन फिर आधी रात और घर की हालत देख मुझे अफ़सोस हुआ।

मेरा अफ़सोस उन्होंने 15 मिनट में ही दूर कर दिया जब एक ग्लास दूध के साथ मक्के की दो रोटियाँ मेरे सामने रख दीं। सकुचाती हुई बोलीं," इस वक़्त तो बस यही...."

"अरे अरे, बहुत है।" मैंने उनकी बात काटते हुए कहा।

"आपने इन्हें डॉक्टर को नहीं दिखाया?"

कहते हुए मैंने अपनी ही जीभ दाँत तले काट दी। ये क्या पूछ बैठा था!

"दिखाया था, कहते हैं कि ऑपेरशन हुआ तो शायद ठीक हो जाए। लेकिन..."

उनके कुछ कहे बग़ैर ही सब समझ गया था मैं।

खाना खा चुका था और प्लेट रखने चला तो प्लेट को हाथों से लेती हुए उन्होंने एक ओर इशारा किया और बोलीं," आप वहाँ सो जाइये, भोर होने पर आपको मैं बाहर तक छोड़ आऊँगी।"

"नहीं, नहीं, मैं कार में ही सो जाऊँगा।"

"रात में यहाँ ठंड हो जाती है। बाकी जैसी आपकी इच्छा।"

मैं उनकी बात मानकर वहीं सो गया।

3 घंटे बाद मेरी आँख खुलीं तो देखा कि वो अपने पति के सिरहाने बैठीं कुछ लेप सा लगा रही थीं उनके माथे पर। फिर उन्होंने एक तेल से उनके हाथों और पैरों की मालिश की। उन्हें पूरा साफ किया और उनके कपड़े बदल कर उठ गईं।

कितना समर्पण था उनके मुख पर उस समय!

मुझे जगा हुआ देख वो मेरी ओर मुस्कुराई और बोलीं," कुछ चाहिए?"

मैंने न में गर्दन हिलाई और उनसे पूछा," ये क्या लगा रही थीं आप उन्हें?"

"इसी जगह पर मिलने वाली कुछ जड़ी हैं। सुना है कि अच्छे से अच्छे रोगी को उठा देती हैं ये, तो बस एक कोशिश!" बोलते हुए उनकी आँखों की ख़ामोशी को मैं अच्छी तरह महसूस कर सकता था।

"बहुत मुश्किल होता होगा न ऐसे जीना?"

"मर जाने से तो बेहतर है!"

बेहद सपाट स्वर था उनका।

मुझे अपनी ओर ताकता देख वो बोलीं," 20 बरस का साथ है हमारा, मेरे हर सुख दुःख में साथ थे वो हमेशा। मेरे मान को अपना मान और मेरी इच्छा को अपनी इच्छा समझा उन्होंने। पैसे से कमज़ोर थे, लेकिन मन से उन्होंने मुझे हमेशा मालामाल रखा। आज भी उनकी आँखें मुझे मालामाल किये देती हैं। वो मेरे साथ हैं, मेरे पास हैं, मेरे लिए इतना काफी है।"

" और आपकी संतान?"

"नहीं हैं।" बहुत छोटा सा जवाब था उनका। आगे कुछ पूछने की हिम्मत ही न हुई उनके मुख के भाव देखकर। लेकिन उनके जीवट के लिए सम्मान ज़रूर बन गया मेरे मन में।

उनसे बात करते हुए पता चला कि वो पिछले चार सालों से घर घर झाड़ू पोंछा और बर्तन करके अपनी जीविका चला रही हैं। पति के कारण ज़्यादा काम नहीं ले पातीं लेकिन जितना भी कमाती हैं उससे गुजर बसर हो जाती है।

अपने पति के प्रति उनका समर्पण और सेवा भाव देखकर मैं नतमस्तक था।

सूरज निकलने पर मैं उनके साथ बाहर आया। सूरज की लाल किरणों के बीच लहलहाते पेड़ दिख रहे थे मुझे। सूरज काली रात का काला साया पीछे ही छोड़ आया था।

हाईवे तक वो मेरे साथ आईं। वहाँ से उनको मुड़ते देख उनके पैर छूने से मैं ख़ुद को रोक न पाया।

गाड़ी एक बार फिर हवा से बात कर रही थी और एक बार फिर आँखों के आगे जीवन की रील चल रही थी।

एक लम्हा आँखों के सामने था जब माँ के तानों की बौछारों के बीच भिंचती मेरी मुट्ठी को उसने अपने कोमल स्पर्श से खोल दिया था। मेरी कमज़ोरी को अपने ऊपर ओढ़ लिया था उसने।

" मैं बच्चे के बिना रह सकती हूँ लेकिन तुम्हारे बिना नहीं। आज के बाद इस मुद्दे पर कोई बहस नहीं चाहिए मुझे।"

मेरे दोबारा खुलते होंठों को एक बोसे से बन्द करती वो खिलखिला उठी थी।

इन 7 सालों की शादी में उसने न जाने कितनी ही बदनामी झेली, न जाने कितने ही ताने झेले लेकिन उसका इरादा टस से मस न हुआ। एक पल में ही दुनिया से मुझे ऊपर रखने का फ़ैसला ले लिया था उसने।

फिर मैंने कैसे फ़ैसला लेने में एक पूरी रात गुज़ार दी।

भले ही किसी भी हालत में हो, वो होगी न मेरे साथ। ज़िंदा, साँसें लेती हुई। जो भी परिस्थिति होगी, मैं देख लूँगा लेकिन उसका ऑपेरशन ज़रूर कराऊँगा। चाहे कुछ भी हो, लेकिन अब उसे किसी हाल में भी मैं अकेला नहीं छोडूंगा।


ऑपरेशन के बाद, साँसे रोके मैं, उसके होश में आने का इंतज़ार कर रहा था।

पल पल आँखों के सामने अंधेरा छा रहा था।

चंद घंटों बाद जब उसे होश आया तो मैं मुट्ठियाँ भींचे, ईश्वर से दुआ मनाता उसके आगे खड़ा था।

मुझे देख मुस्कुराई वो।

"अनीश"

अहा, आज अपना नाम कितना ख़ूबसूरत लग रहा था।

वो ठीक थी, वापिस आ गई थी मेरे पास, मेरी खुशियाँ वापिस लिए, मेरी बांहों में। और इस बार मैंने उसे कसकर थाम लिया था।

हॉस्पिटल के चैरिटी काउंटर पर खड़ा मैं, उन देवी के घर का पता और उनके पति के इलाज में होने वाला खर्चा जमा कराकर अपनी खुशियाँ लिए घर लौट आया था।

समाप्त



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