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Neha Bindal

Romance Others


4  

Neha Bindal

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काश,नियति बन जाता है।

काश,नियति बन जाता है।

14 mins 233 14 mins 233

टेबल से फ़ाइल पास करके आखिरकार आज का कार्य मैंने पूरा कर लिया था। ऑफिस का समय पूरा होने में केवल आधा घंटा बचा था तो मैंने कल की पूरी करने वाली फाइल्स की टू डू लिस्ट बनानी शुरू कर दी। कार्य यदि पहले से तय हो तो पूरा कर पाना आसान होता है। लिस्ट बनाकर एक कोने में रख जुड़ चुके पैर फैलाये ही थे कि एक क्लाइंट आकर मेरे सामने पड़ी कुर्सी पर आ बैठीं। उनकी ओर देख मैंने एक मुस्कान छोड़ी और उनसे उनकी परेशानी पूछने के लिए जैसे ही मैंने बोलना चाहा उनके बराबर में वो आकर बैठ गईं, जिन्हें देखकर मैं बस कुर्सी के पिछले छोर पर जा टिका। चेहरे पर एक अजीब सी टीस उतर आई थी और शायद वही टीस उनकी आँखों में भी।

दो पल ठिठक कर अपने आस पास के माहौल को देख हम दोनों ही सामान्य होने में जुटे। मैंने सामने बैठीं उन स्त्री से उनकी परेशानी पूछी।

उनके पति का स्वर्गवास एक कार एक्सीडेंट में हुआ था जिसका क्लेम वो बैंक से माँगने यहाँ आई थीं। मैंने उनको निश्चित कार्यवाही का आश्वासन दिया तो वो स्त्री अपने अब तक बह आये आँसू पूछती हुई उठ खड़ी हुईं और साथ ही वो भी। इस पूरे समय में हम दोनों ही एक दूसरे को ढकी छिपी निगाहों से देख रहे थे। और अब मेरी नज़रें उसे एक बार फिर बिना कुछ कहे ही जाता देख रही थीं।

वो चली गई और मैं अपना सामान उठा घर के लिए निकल गया। मन में मेरे हलचल मची थी। उसका यहाँ होना, क्यों? किसलिए? किस कारण से था मैं समझ नहीं पा रहा था। अतीत मेरी आँखों में हिलोरें खा रहा था और मैं उस धुँधलके में आखिर खो ही गया....

रंगों से सराबोर वो पलटी थी तो बस आँखें ही दिखी थी उसकी। पैर ज़मीन पर फेविकॉल का जोड़ लेकर जुड़ गए थे तो आँखें फेवी क्विक लिए जा जुड़ी थीं उसकी आँखों में। काले पीले रंगों में वो कंजी आंखें एक धागे से खींच ले गई थीं मेरी आँखों को!

आज भी वही आँखें हैं सामने मेरे, चश्मे के पीछे से झाँकती, झुर्रियों को धता बताकर आज भी उसी सफाई से मेरी आँखों को खींच रही हैं, अपनी ओर, उसकी ओर....

होली का दिन था। कॉलोनी में पहली होली थी हमारी। एक दूसरे पर रंगों की बौछार करते, एक दूसरे के पीछे हो रही भागम भाग में जा टकराया था मैं उससे। कुछ देर तक उसके सामने खड़ा मैं ताकता रहा उसे। फिर वो ओझल हो गई आँखों से और मैं बस अभी अभी बीती उसकी मौजूदगी समेटता रह गया।

20 का था मैं, जब पहली बार देखा था उसे। अगले दिन हमारे फ्लैट के ठीक सामने वाले फ्लैट में फिर से वही कंजी आँखें दिखी थीं मुझे। एक पल को जम सा गया था अपनी जगह पर। ये यहाँ? पहले तो कभी इसे यहाँ नहीं देखा।

मन ही मन सोच रहा था कि सामने फ्लैट से श्रीवास्तव अंकल निकल आये और मुझे उसे असमंजस में ताकते हुए देख ख़ुद ही बोल पड़े,"अनूप, मेरी बहन की बेटी है ये, सिया!"

औपचारिक हेलो बोलते हुए भी उसकी मीठी बोली मेरे भीतर उतर गई थी।

"यहाँ होली की छुट्टियों में आई है। एक हफ़्ते बाद चली जायेगी।" मेरे कुछ पूछे बिना ही उन्होंने बताया था।

मैंने एक बार मुस्कुराकर उसे और अंकल को देखा और सामान लाने नीचे उतर गया।

वापिस आया तो वो मेरे घर के अंदर थी।

और बस, उसी पल से अगले एक हफ़्ते के लिए हमारा घर उसका डेरा बन गया।

मेरे 6 साल के जुड़वा भाई बहन में बहुत घुल मिल गई थी वो। बच्चे बहुत पसंद हैं उसे, उसकी आँखों से ही पता चल जाया करता था। एक चमक आ जाती थी जब मेरे भाई- बहन के साथ खेलती।

वो उस वक़्त 18 साल की थी। अपनी उम्र से बहुत छोटी थी वो। बचपना कूट कूटकर भरा था उसमें लेकिन उसका बचपना बहुत ही अच्छा लगता था मुझे। मेरी अक्सर बीमार रहने वाली माँ को उस हफ़्ते में न जाने कितनी ही बार सुकून और खुशी के लम्हें दे दिए थे उसने! जब हँसती थी तो मन के तार झनझना जाते थे। जब ख़ुशी से उछलती तो मन उछाल खाने लगता मेरा। कौन कह सकता था कि उस "बच्ची" ने उसी साल एम बी बी एस का एंट्रेंस पास किया था! स्वभाव से जितनी मुलायम थी वो, दिमाग से उतनी ही मजबूत थी। जिस काम को ठान लेती, उसे करके ही दम लेती थी। हर काम में जमी जमाई परिपाटी से हटकर काम किया करती। सबकी आँखों में सवाल छोड़ती वो अक्सर ही कुछ ऐसा कर जाया करती थी जो किसी ने भी सोचा नहीं होता था।

अक्सर ही अब हमारी रसोई से रोटी की खुशबू के साथ उसकी और माँ की हँसी की खुशबू भी उड़ आती और मैं जैसे उस खुशबू में बह सा जाता।

पापा भी उसकी मौजूदगी से ख़ासे खुश थे। इन 6 सालों में पहली बार हमारे घर में इतनी हँसी की गूँज सुनाई पड़ती थीं।

ईशा और अनम को जन्म देने के बाद से माँ का स्वास्थ्य अक्सर ख़राब ही रहता। अक्सर घर के काम मुझे और पापा को ही करने होते और ईशा और अनम को तो मैंने ही पालन दिया था। पापा को हमेशा माँ की गर्भावस्था के लिए अफ़सोस होता। वो हमेशा ख़ुद को दोषी ठहराते कि क्यों उन्होंने माँ को उस समय गर्भावस्था से बाहर नहीं निकाला? इस गिल्ट में गिल्टी गिल्टी से वो भी घुल रहे थे और मैं चाहकर भी कभी कुछ कह नहीं पाता। कुछ ऐसा जो उन्हें इस गिल्ट से बाहर निकाल पाता। अक्सर उन्हें यूँ घुटता देख मैं भीतर से टूट जाता, और मेरी इसी टूटन को जोड़ने के लिए ही शायद ईश्वर ने उसे भेजा था।

एक हफ़्ता उसके साथ कैसे बीत गया पता ही नहीं चला! श्रीवास्तव अंकल से हमारे अच्छे संबंध होने के कारण उन्होंने उसे हमारे घर आने से कभी मना नहीं किया और इस तरह कब वो हमारे घर का ही एक हिस्सा बन गई हमें पता न चला!


कल सुबह वो निकलने वाली थी। इस एक हफ़्ते में जो अहसास उपजे थे उसके लिए, उन्हें बयानगी देना ज़रूरी लग रहा था मुझे।

माँ के साथ बैठी वो गप्पे मार रही थी। दिल में सुगबुगाहट लिए मैं भी उन दोनों में शामिल हो गया।

अब दो की जगह तीन गूँजे गूँज रही थीं हँसी की।

माँ उठकर कमरे में चली गईं, थकान तारी हो गई थी उनपर। उसने भी अब घर जाने के लिए इजाज़त माँगी तो मैं मन थाम कर रह गया।

वो हमारे घर से बाहर निकल गई और मैं अब भी बंद हुए दरवाजे को ताक रहा था।

मन नहीं माना और तुरंत मैं उसके पीछे भागा। उसने अपने फ्लैट का गेट खोला ही था कि मैंने उसका हाथ थाम लिया। चौंककर वो पीछे मुड़ी। मैं उसके कानों तक ओंठ ले आया और एक सरगोशी हवा में घुल गई।

"तुम्हारी मुस्कुराहट मुझे किसी और ही दुनिया में ले जाती है। मुझे लगता है कि मुझे तुम पसंद आ गई हो।"

उसने पलकें उठाकर मुझे देखा और एक भीनी मुस्कुराहट लिए फ्लैट के भीतर चली गई। मैं बालों में हाथ फेरता अपने इज़हार की कामयाबी का जश्न मनाता अपने घर के भीतर हो लिया।


फ़ोन पर बातों का सिलसिला ज़ोरो पर था। अक्सर हमारी रातें एक दूजे की धड़कन सुनते ही बीत जातीं। वो बोलती कम थी और हँसती ज़्यादा थी और मैं उसकी इसी हँसी का दीवाना था।


उसकी यादों में डूबा मैं घर पहुँच चुका था। सुनैना( मेरी पत्नी) ने मेरे सामने चाय ला रखी और मेरी ओर मुस्कुराती हुई वो मेरे सामने बैठ गई।

रोज़ की तरह वो मुझसे आज भी शायद एक मुस्कुराहट की उम्मीद रखे थी और मैं आज भी उसकी आँखों में उन्हीं आँखों को खोज रहा था.....

समय बीत रहा था। सिया और मेरे बीच नजदीकियाँ पाँव पसार रही थीं। अब हर छुट्टी में श्रीवास्तव अंकल का घर उसका ठिकाना होता था। नाम तो उन्हीं का होता था ख़ैर, पर पाई वो मेरे घर में ही जाती थी।

उस दिन उसने मुझे अपने आने की ख़बर न होने दी थी।

मैं बैंक में नौकरी के लिए तैयारी कर रहा था। पापा के कंधे अब और कमज़ोर पड़ रहे थे और माँ का सिर भी पानी में डूबने को था। ऐसे में मेरी मेहनत का पहिया दुगनी तेज़ी से घूम रहा था। इन सब हालातों को पार करने के लिए संघर्षरत मैं जब शाम को घर में घुसता था तो लगभग आधा ख़तम हो चुका होता था, ऐसे में बस उसका फ़ोन कॉल ही अगले दिन दोबारा शुरू होने का चार्ज देता था मुझे।

आज जब घर में घुसा तो घर से जानी पहचानी हँसी गूंज रही थी। माँ भी जैसे पानी के भीतर से हँस रही थीं और पापा के बोझ से दबे कंधे के ऊपर झूलता उनका चेहरा भी आज खुश था। ईशा और अनम भी पेट पकड़कर लोट रहे थे।

उसकी मौजूदगी मुझे ताज़ा कर रही थी। मुस्कुराता हुआ मैं उनकी टोली में शामिल हो गया और हँसी की आवाज़ें और तेज़ हो गईं।


हमारे घर के भीतर हँसी की आवाज़ आज रुदन में बदल गईं। हँसती हुईं माँ कुछ यूं सोईं कि सुबह का सूरज न देख सकीं। माँ के अंतिम संस्कार की विधि चल रही थी। पापा बेसुध से माँ को सुहागन के रूप में तैयार होते देख रहे थे। ईशा और अनम सिया से चिपक कर सुबक रहे थे। आस पड़ोस की आँटी फुसफुसाहट करती हुईं माँ के अच्छे चरित्र की चर्चा कर रही थीं। पंडित जी के हामी भरते ही माँ को उठा दिया गया था और अचानक ही रुदन ही आवाज़ें तेज़ हो गई थीं।

माँ को श्री चरणों में अर्पित करके लौटे पापा को किसी का होश न था। कितने ही दिन वो बेसुध से माँ की तस्वीर को थामे बैठे रहे! घर की पूरी ज़िम्मेदारी उन दिनों सिया ने संभाल ली थी। उस समय वो हम सबकी माँ बन गई थी। अपनी पढ़ाई को दरकिनार कर वो उन दिनों मेरे भाई बहन को संभालने में जुटी थी। माँ की तेरहवीं में आये उसके माँ पिता ने अब उसकी और मेरी नजदीकियों को देख हमें साथ जोड़ने का प्रस्ताव रख दिया था पापा के सामने।

तय हुआ था कि उसका एम बी बी एस पूरा होते ही हमारी शादी कर दी जाएगी। कोई और समय होता तो हम दोनों खुशी से झूम उठते, लेकिन इस समय औपचारिकता की हंसी भी न थी होंठों पर!


कल उसे जाना था। उसकी पढ़ाई अवरुद्ध हो रही थी जो न मैं चाहता था, न ही वो। पिताजी अभी भी सदमे में ही थे तो मैंने अपनी कोचिंग को कुछ दिनों के लिए अब तक टाला था लेकिन आज का टॉपिक इतना ज़रूरी था कि मेरा जाना ज़रूरी हो गया। मैंने उससे कहा कि आज का पूरा दिन वो कैसे भी करके संभाल ले जिसे एक ज़हीन मुस्कुराहट के साथ उसने मान लिया।

मैं शाम तक लौटने का कह निश्चित होकर घर से निकल गया।

दोपहर को चूँकि टॉपिक पूरा हो चुका था इसीलिए मैं घर जल्दी पहुँच गया।

दरवाजा खोलते ही देखा कि ईशा कोने में खड़ी सुबक रही थी और अनम के ऊपर हाथ ताने सिया खड़ी थी। इसे देखते ही मैं आग बबूला हो उठा और फिर मैंने आंव देखा न तांव, सीधा सिया के गाल पर एक तमाचा रसीद कर दिया।

ईशा और अनम सहम गए और मुझसे लिपट गए।

मैं गुर्रा रहा था, लगभग चीखते हुए बोला, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे भाई बहन को मारने की? शादी के पहले तुम्हारा ये हाल है तो बाद में तुम क्या करोगी?"

सिया ने अपनी नज़रें झुका लीं और चुप्पी साध ली।

मैं दोबारा गुर्रा उठा,"सच कहती थीं मल्होत्रा आँटी, माँ की जगह कोई नहीं ले सकता। और आज तुमने ये साबित कर दिया। तुमसे एक दिन भी न संभाले गए ये दोनों और तुम सारी उम्र साथ रहने का दम भरती हो?"

सिया ने आँख से बहते नीर को समेटा और मेरी ओर एक नज़र डालती हुई घर के बाहर निकल गई।


वो जा रही थी, मैं ज़हन में अब तक का सफ़र लिए सूनी आँखों से उसे जाता देख रहा था। हर पल हर लम्हा बस दिल ने यही पुकार लगाई थी,"एक बार, बस एक बार मुड़ जाए वो, थाम लूँगा उसे, कैद कर लूँगा दिल के किसी अंदरूनी कमरे में, जहाँ से दरवाज़ा ढूँढने में ही उम्र बीत जाए उसकी!"

लेकिन अफसोस! वो नहीं मुड़ी थी।

आज भी आँखों में झिलमिल सितारे लिए मैं बस यही मना रहा था," बस एक बार, एक बार मुड़ जाए वो, कैद कर लूँगा उसे आँखों के कोनों में कहीं, जहाँ से आँसू बन बह जाने में ही उम्र बीत जाए उसकी..."

घनघोर बारिश हो रही थी। मैं बैंक से लौटते वक़्त, अपनी खराब हुई गाड़ी को लात मारता सड़क के किनारे खड़ा था। तभी एक गाड़ी मेरे सामने आकर रुकी। शीशा खुला और वो मेरे सामने थी। मैं बिना कुछ कहे ड्राइवर को गाड़ी की चाबी पकड़ा उसकी गाड़ी में जा बैठा। उसने मुझसे मेरा पता पूछा। हड़बड़ाते शब्दों में अपने घर का पता बताया मैंने तो उसने गाड़ी मेरे घर की ओर मोड़ दी।

सारे रास्ते हमारे बीच एक गहन ख़ामोशी छाई रही। उस थप्पड़ की गूँज अब भी शायद हम दोनों के कानों में गूँज रही थी।

उस दिन सिया के जाने के बाद ईशा ने मुझे बताया कि सिया ने उन दोनों को नहीं मारा था। वो दोनों पढ़ाई नहीं कर रहे थे तो बस सिया उन्हें डरा रही थी।

मुझे बहुत अफसोस हुआ था। किस तरह मैंने बिन सोचे समझे उसपर हाथ उठा दिया! उसी दिन मैंने उसके घर का दरवाजा खटखटाया था लेकिन उसने मुझसे मिलने से मना कर दिया। न जाने किस पल में मुझपर भी मेरा अहम हावी हो गया और उसके बाद मैं उससे कभी नहीं मिला। अगले रोज़ वो चली गई और मैं बस सूनी आँखों से उसे जाता ही देखता रहा।

उसके जाने के बाद मेरे ज़हन में रम गई वो लेकिन मेरा अहम, मेरे अहम ने मुझे उसके पास दोबारा नहीं जाने दिया। पापा के ज़िद करने पर मैंने सुनैना से शादी तो कर ली लेकिन ताउम्र मैं उसमें सिया को ही ढूँढता रहा। श्रीवास्तव अंकल ने अपना ठिकाना बदल दिया और उसके बाद सिया की कोई ख़बर मुझे न मिली। ईशा और अनम को सुनैना में एक बेहतरीन माँ मिली, आज दोनों बच्चे अपने जीवन में सुखी और सम्पन्न हैं तो केवल सुनैना के कारण। उसने अपने ही बच्चे जैसी देखभाल मेरे भाई बहन की की लेकिन मैं आज तक भी उसे सिया से हटकर केवल सुनैना के रूप में न देख सका।

अतीत से बाहर आया तो सिया को सड़क पर ताकता पाया। अब भी हवा में ख़ामोशी तारी थी।

मैंने ही चुप्पी को तोड़ते हुए कहा," कैसी हो? क्या कर रही हो आजकल?"

"हार्ट स्पेशलिस्ट हूँ। सिटी हॉस्पिटल में ट्रांसफर होकर इसी साल आई हूँ।"

"पति और बच्चे?" कहते हुए मेरी ज़ुबान अकड़ रही थी।

"दोनों हैं। अच्छे हैं।" सीमित सा उत्तर दिया उसने।

"पति प्यार करते हैं?" निहायती बेवकूफी भरा सवाल था लेकिन अब तो पूछा जा चुका था।

"सम्मान करते हैं।" फिर से चंद ही शब्द गूँजे थे हवा में।

"सिया, उस दिन के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। मैं नहीं जानता था कि तुमने ...."

मैं आगे न कह सका।

"अच्छा ही हुआ अनूप कि तुम नहीं जानते थे। उस दिन मुझे ये अहसास हुआ था कि हमारे बीच रिश्ते के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ ही नहीं पनप सकी।"

मैं उसे असमंजस से देख रहा था तो उसने फिर कहा, "विश्वास और सम्मान!"

मेरी नज़रें एक बार फिर शर्म से झुक गईं। मेरे शब्द मेरे गले में ही अटक गए। और न जाने फिर क्या ही हुआ कि सिया ने झटके से गाड़ी रोक दी और अचानक ही फट पड़ी, "क्या ही हुआ था अनूप जो मैंने उनपर हाथ ही उठाया होता? क्या माएँ अपने बच्चे को मारतीं या डाँटती नहीं? क्या मेरा हक़ नहीं था कि अगर वो कुछ ग़लत करें तो मैं उन्हें सही राह पर लाऊँ? अगर मैंने उन्हें मारा भी होता तो भी क्या उससे मेरा उनके प्रति प्यार कम हो जाता? क्या मेरे सभी किये पर पानी फिर जाता?"

मैं ख़ामोश था। भीतर शोर मचा था। नहीं, वो ग़लत नहीं थी। मैं ग़लत था। ज़िम्मेदारियों के साथ अधिकार भी आते हैं, मैं शायद भूल गया था। वो गाड़ी से बाहर निकल गई। सामने कल कल बहता समुंदर था।

थका हुआ सूरज पूरे दिन की नौकरी के बाद घर को लौट रहा था। लाल सा वो उस नीले पानी में डूब रहा था और ठीक वहीं उसी की मद्धम रोशनी के तले हम दोनों एक हाथ की दूरी पर बैठे थे। आँखों में कई सवाल थे, कुछ गहरे ग़म थे, आँखों की पलकों पर तैरती शिकायतें भी थीं और दिलों की गहराई में बसा प्रेम भी था। मैंने उसका हाथ न जाने किस पल में बहकर थाम लिया और आँखों से उसकी सारी नाराज़गी बह गई....

कुछ देर बाद हम दोनों उठे और गाड़ी में आ बैठे। इतने सालों का गुबार निकल चुका था। मन के भीतर चलता शोर थम गया था। सोचता हूँ कि काश मैंने उसपर भरोसा किया होता। काश वो दिन घटता नहीं, काश मैं उसे समझ पाया होता। काश अपने अहम को पीछे रख मैं उसे वापिस ला पाया होता लेकिन कुछ काश शायद कभी पीछा नहीं छोड़ते। ज़िन्दगी के सफ़र में जो मक़ाम गुज़र जाते हैं वो कभी नहीं लौटकर आते। वक़्त रहते जो संभाल लिया जाए बस वही अपना है, वरना लोगों को, बातों को और चाहतों को काश में बदलना ही नियति बन जाती है।

उसने मुझे मेरे घर छोड़ा। मैं उसे जाता देख रहा था। सुनैना ने पीछे से आकर मुझे थाम लिया था और आज पहली बार मैंने उसमें सिया को नहीं ढूँढा था.....

समाप्त



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