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Neha Bindal

Romance Inspirational


4  

Neha Bindal

Romance Inspirational


ओ साथी रे...

ओ साथी रे...

9 mins 226 9 mins 226

चारों तरफ़ अफरा तफ़री मची हुई थी। उस बड़े से छज्जे के चारों और से झाँकने पर नीचे की भीड़ साफ़ दिखाई पड़ रही थी लेकिन उस छज्जे से नीचे कोई उतर नहीं सकता था।

वो खून से लथपथ उसे हाथों में थामे बुरी तरह रो रहा था। उसी से लिपट कर एक बच्ची भी खड़ी थी जिसकी सूनी आँखें आकाश के शून्य को ताक रही थीं।

चारों तरफ़ पुलिस के डंडों की आवाज़ और उन डण्डों के पड़ने से कराहते लोगों की आवाज़ें गूँज रही थीं।

उसकी साँसें उखड़ रही थीं। वो पागलों की तरह उसे ज़िंदा रखने की कोशिशों में लगा था और वो बस उड़ान भरने की ज़िद किये हुए थे।

आख़िर उसकी उखड़ती साँसों के बीच उसके ओठों को अपने मुँह के पास लाकर उसने एक मीठा बोसा दे ही दिया। पहला और आख़िरी स्पर्श था उनके बीच। उसने एक बेचैन मुस्कान के साथ वो बोसा स्वीकारा और प्राण पखेरू उड़ चले।

*****

वो आज कई दिनों बाद उस तरफ़ आया था। अपने शहर का जाना माना गुंडा, न जाने कितने ही लोगों की आहें लिए वो घूमता था। अपने मन और तन, दोनों की हवस निकालने वो यहाँ चला आया करता था।

लाख बुराइयाँ होने के बाद भी किसी की सहमति के बगैर उसे छूना, उसको नहीं ही भाता था।

ये जगह, जो इसी तरह के लोगों की ज़रूरतों के लिए मसौदा उपलब्ध कराती थी, जिसे आसान भाषा में कोठा कह दिया जाता है, न जाने कितनी ही लड़कियों के सपनों, उनके भोलेपन और उनकी आज़ादी की बलि चढ़ाकर ख़ुद को आबाद किये हुए थी। दिनों दिन इसकी चमक बढ़ती ही जाती थी, जिसे रोकने में पुलिस, संस्थाएँ और हमारी सरकार, सब नाक़ाम थे।

इस "सभ्य काम" को अपराध की श्रेणी में न रखे जाने का कानून भी समझ के परे ही है!

इन सब बातों से बेखबर, लोग चले आते हैं यहाँ। कुछ जो अपने जीवन साथियों में संतुष्टि नहीं ढूँढ पाते, वो यहाँ आकर इन उजड़ी और बिखरी हुई कलियों में संतुष्टि ढूँढने की कोशिश करते हैं। और कुछ, जिन्हें कभी इन गलियों में आना ही नहीं था, वो अब इन गलियों में जबरन ही खिंचे चले आते हैं। शरीर है, इसकी भूख शायद पेट की भूख से भी बड़ी होती है!

वो चिल्लाता हुआ बाहर आया और कोठे की मैडम की आँखों में आँख डालकर, उसे घूरता हुआ बाहर निकल गया।

मैडम की आँखों में एक बार फिर ख़ून उतर आया।

उसने कुछ आदमी बुलाये और फिर हवा में कई आद्र चीखें गूँज गईं।

"स्साली! रोज़ एक ग्राहक खराब करती है। तुझे एक बार में समझ नहीं आता? अब तुझे ये ही करना है।"

मैडम बोल रही थी और वो अपने रिसते खून को दबाने की कोशिश कर रही थी। आवाज़ में आहें ज़रूर थीं लेकिन आँखें उसकी बगावत पर उतारूँ थीं।

"आँखें नीची कर, मैं कहती हूँ, आँखें नीची कर!"

मैडम ने बोलकर उसकी ओर एक चाबुक और उठाया तो वहीं काम करने वाली एक औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"मैडम, बस! और मारेंगी तो कल का ग्राहक भी खराब हो जाएगा। मैं इसे समझा देगी, कल से ऐसा नहीं होगा।"

उसने मैडम से जैसे विनती सी की। मैडम और उसके आदमी कमरे से बाहर आ गए और वो अपने रिसते ज़ख्म लेकर उसके सीने से लिपट गई।

उसकी सिसकियों में एक सिसकी और शामिल हो गई थी।

****

वो गुस्से से कोठे से बाहर निकल तो गया था लेकिन गुस्सा हवस के न निकलने का था या उन गहरी आँखों में डूब जाने का, वो समझ नहीं पा रहा था।

ग़फ़लत में, चौतरफ़ा दिमाग़ चला रहा था लेकिन रंग बिरंगे मेकअप के बीच से झाँकती वो मासूम आँखें, जिसमें न जाने कितने दर्द बह रहे थे, उनसे पार पाने का तरीका समझ नहीं पा रहा था।

थक हारकर उसने आँखें बंद कर लीं और एक बार फिर वो कमरा और कमरे के बीच बैठी वो, उसकी पलकों पर तैर गए।

छू भी न सका था वो उसे, इतना तेज था उसकी उन दो आँखों में!

उसने फिर आँखें खोल दीं और इस बार शराब की बोतल दीवार से टकरा कर चूर हो चुकी थी।

अगले दिन वो फिर उसी कोठे पर था। मैडम ने जब उसे कोई दूसरी लड़की सौंपी तो उसने कल वाली ही लड़की की माँग उठा दी।

मैडम उसे घूर कर देख रही थी लेकिन वो दृढ़ था।

"पैसा देना पड़ेगा, चाहे कुछ मिले या न मिले!"

उसने एक चमकता नोट उसकी काउंटर पर चिपका दिया और कुछ देर बाद वो उसी कमरे में था।

अब ये रोज़ का नियम हो चला था। उसके रिसते घाव अब सूखने लगे थे और इसके मन के घाव उसकी गीली हँसी के तले अब भरने लगे थे।

वो जब भी हँसती तो इसे अपने अंदर से एक बुरा साया हटता नज़र आता।

हर रात का वो एक घंटा अब इसके जीवन का सबसे खुशनुमा वक़्त बन चुका था जिसे बेनागा ये हासिल कर लेता था।

कोठे में अब वो इसके नाम की हो चुकी थी।

सख्त हिदायत थी मैडम को, कि वो किसी और के बिस्तर तक न पहुँचे।

दबदबा ऐसा था इसका कि मैडम की ज़ुबान पर ताले लगे थे। धीरे धीरे उसकी डोर मैडम के हाथ से छूटने लगी थी और मैडम ने उसे थामने की कोशिश भी नहीं की। जानती थी वो, इसके एक इशारे पर उसका पूरा धंधा चौपट हो सकता था।

****

समय के साथ अब इनके बीच नजदीकियों ने डेरा डालना शुरू कर दिया था। इसके साथ होने पर पूरे दिन की घुटन वो निकाल कर हल्की हो लेती और ये उसके हल्केपन में अपना सुकून ढूँढ लेता।

उसे पढ़ना था, अपना अस्तित्व हासिल करना था, और अब उसका लक्ष्य इसका लक्ष्य बनने लगा था।

इसने उसे किताबें मुहैया करा दी थीं लेकिन उसके यहाँ से निकलने के आसार नहीं बना पा रहा था।

******

उस रात वो किताबों में नज़र गढ़ाए थी। समय का पता ही नहीं चला था कि इसके कदम उसके कमरे में पड़ गए।

इसने उसके सामने एक अखबार का पन्ना रख दिया जिसे उसने उठाकर पढ़ा तो उसकी आँखों में जैसे खून का उबाल आकर एक शांति दे गया।

वो चाचा जिसने उसकी माँ को धोखा दे, उसे यहाँ ला पटका था, एक एक्सीडेंट में मारा गया था।

उसने इसके चेहरे की ओर देखा और इसके चेहरे के कड़ेपन को देख, समझ गई कि ये एक्सीडेंट क्यों हुआ!

कसमसाकर इसके गले जा लगी वो। पहला प्रेम भरा आलिंगन कितना सुखद होता है, ये उन दोनों ने ही आज जाना था!

उनके बीच कोई वादें नहीं थे। कोई कसमें नहीं थीं। वो जानता था कि वो उसके लिए नहीं बना। वो एक गुंडा था, जिसका कोई भविष्य नहीं था। अब बस उसके अतीत की स्याही गहरा रही थी जिसका साया भी वो इसपर नहीं पड़ने देना चाहता था।

प्रेम था, भरपूर था लेकिन पाने की चाहत न थी।

वो भी इस बात को भली भांति जानती थी लेकिन प्रेम तर्क कहाँ देखता है?

दोनों इस प्रेम की गहराई में उतर सीपियों में छुपे सुकून के मोती ढूँढ लिया करते थे और अपनी बनाई उस एक घण्टे की सुखद दुनिया में खुश हो लिया करते थे।

****

वो एक संस्था के ऑफिस में बैठा, पैरों को ज़मीन पर थपका रहा था। मन की बेचैनी उँगलियों के नाखूनों को कुतरने पर मजबूर कर रही थी।

"अतुल शर्मा" नाम की प्लेट से उसका बहुत गहरा नाता था। यही अतुल शर्मा उसके पहले खून के समय उसके गुनाह को कबूलने की बात लिए उसके सामने खड़ा था। वो इसका बचपन संवार देना चाहता था। 17 की उम्र में इसे खून की कम से कम सज़ा दिलाकर, इसके भविष्य को उज्ज्वल बना देना चाहता था लेकिन इसने इसकी बात न मान अपने गुरु को तवज्जों थी जिसने इसे आज यहाँ तक पहुँचा दिया था कि अपने ही साये से भाग जाने का जी चाहता था।

वो खटखटाते कदमों को विराम दे चुका था। अतुल ने एक बार उसे गहरी नज़रों से देखा और कहा, "क्या चाहते हो तुम? मैं क्या कर सकता हूँ?"

"वो बस पढ़ना चाहती है, मैं उसे वहाँ से निकालना चाहता हूँ लेकिन बिन आपकी मदद ये मुमकिन नहीं।"

"बिना उसकी सहमति के हम उसे वहाँ से नहीं निकाल सकते हैं।

दो दिन दो मुझे, मैं कागज़ तैयार कराता हूँ। उसके साइन चाहिए होंगे फिर ही हम कुछ कर पाएंगे।"

अतुल शर्मा ने आज पहली बार उसकी हँसी देखी थी।

दो दिन बाद वो उसके साइन ले चुका था और अब बस कल का इंतज़ार था। उसके बाद वो आज़ाद होगी। अपनी एक अलग दुनिया में, जहाँ उसपर किसी की नज़र नहीं होगी, उसमें वो अपने सपने पूरे कर रही होगी।

आज बरसों बाद उसने शराब नहीं पी थी। सारी रात बस सुबह होने का ही इंतज़ार करता रहा था वो। आँखें एक पल को बंद न हुई थीं कि कहीं सुबह का उगता सूरज छूट न जाये!

****

सट्ट की आवाज़ के साथ एक गोली उसके सीने के साथ जैसे इसके सीने से भी पार हो गई थी।

एक सहमी सी बच्ची उसका आँचल थामे खड़ी थी और वो गोली खाकर ज़मीन की ओर गिर रही थी। इसने अपने हाथों में उसे थाम लिया था।

दो दिन पहले एक नई बच्ची को यहाँ लाया गया था। उसको भनक लगी थी तो उसने उस बच्ची में अपना ही चेहरा देखा।

लगाव ने पैर पसार लिए थे। आज जब उस बच्ची को उसके पहले ग्राहक के लिए मैडम ने उसी तरह तैयार किया, जिस तरह उसे किया गया तो उसका खून खौल गया और उसने मैडम को रोकना चाहा। जो वो ख़ुद के लिए न कर सकी वो इस बच्ची के लिए करना चाहती थी।

मैडम और उसके आदमी उसे पकड़कर खींच रहे थे लेकिन ये बच्ची को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। हाथापाई में गोली चल गई और निशाना सीधा इसके दिल पर जाकर लगा।

एम्बुलेंस को फ़ोन कर दिया गया था। पुलिस अपना काम कर रही थी लेकिन इसके लिए अब कुछ नहीं बचा था।

इसके मन का सुकून अपनी आख़िरी साँसें भर चुका था।

इसने उसकी लाश को वहीं छोड़ा और उठ खड़ा हुआ बाहर निकलने के लिए। उसने कदम बढ़ाया ही था कि इसकी शर्ट का एक हिस्सा उस बच्ची के हाथों में था।

वो डरी सहमी सी इसकी ओर देख रही थी और इसकी आँखों में सवालों के जवाब तैर गए थे।

****

पाँच साल का समय बीत चुका था।

अपने अतीत की स्याही को वो बहुत पीछे छोड़ आया था।

छोटी सी परचून की दुकान से शुरू हुआ उसका सफ़र आज अंडों के थोक व्यापार में बदल चुका था।

उसने जिस बच्ची के लिए जान दे दी, उसकी ज़िन्दगी सँवारने में इसने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। अच्छी पढ़ाई, सुरक्षित जीवन सब उसे मुहैया कराया था।

आज वो अतुल शर्मा की संस्था से जुड़ा हुआ था और ऐसी लड़कियों के पुनर्वास के लिए जितनी कोशिशें हो सकती थीं , करता था।

उसकी साथी ने उसके जीवन में जो दिया जलाया था, इस बच्ची ने उसकी लौ कसकर संभाल रखी थी और वो अब इसके जीवन में अपनी मुस्कान से उजाला कर रही थी।

इसकी रातों का एक घंटा अब भी उसी के लिए निश्चित था जिसमें ये यादों की नैया में उस संग डूबता उतराता था।

समाप्त।



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