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Neha Bindal

Inspirational


4  

Neha Bindal

Inspirational


मनहूस

मनहूस

10 mins 401 10 mins 401

दुबारी से तेज़ रोने की आवाज़ें पूरे घर को गुँजा रही थीं। दाई अपनी झुकी कमर लिए जा चुकी थी और श्यामा अपनी दम छोड़ चुकी पत्नी के पास बिल्कुल शांत बैठे थे। ग़म या रुदन का कोई भाव उनके चेहरे पर न था। बराबर पड़ी बिलखती बच्ची की ओर बिना एक नज़र देखे वो दुबारी से बाहर निकल आए।

पत्नी जी की अंतिम क्रिया कर उन्होंने दुकान को ही अपना सदा का घर बना लिया। उनकी अर्धांगिनी अपने पीछे अपना एक अंश भी छोड़ गई है, इसकी खबर भी न ली उन्होंने।

चाची ने समाज के दबाब उसे गोद से तो लगाया लेकिन दिल से न लगा सकीं। और इस तरह इस दुनिया में राजस्थान के बरमेल में एक और अनचाहा जीवन शुरू हो गया।

नाम रखा गया रूमी! लेकिन पुकारा उसे मनहूस ही जाता रहा।

"ऐ मनहूस, अठे के कर रही से? चल, म्हारे लाडेसर पे नज़र डारेगी क्या?" चाची की आवाज़ आई तो अपने चचेरे भाई को घी चुपड़ी रोटी खाती देख रूमी अपने जीवन में सदा रही कमी को सोचती फुर्र से बाहर निकल गई। अपने घर से अधिक तो उसे पड़ोस की ताई का घर भाता था। ज़्यादा अपनापन लगता था उसे। कम अज़ कम उस घर में वो मनहूस न थी।

8 बरस की हो चली थी और पिता का प्यार भरा हाथ अभी तक भी सिर पर न पड़ा था। पिता को दुकान से कभी अरसे में घर आते भी देखती तो बस उनके कमरे में धुँए से अपना जिगर जलाते ही पाती। और एक दिन उस धुँए के साथ उसके पिता भी हवा में गुम हो गए, औरों के लिए बस चंद घंटों की धुंध छोड़ते हुए और उसके लिए सदा की....

पिता का होना भर ही उसके सिर पर एक साया था, जो भले ही फल न देता हो पर छाया तो दे ही रहा था।

अब राजस्थान की उमस भरी गर्मी में उसके सिर से वो छाया छीनकर पिता भी अपना रास्ता पकड़ चुके थे, अंत की ओर, जहाँ से कभी कोई वापिस न आता!

पढ़ाई छुड़ा दी गई, और हाथों में झाड़ू बुहारी पकड़ा दी गई।

अब उस उमस में अपना मन तापती वो, रेगिस्तान की रेत को और तपा देती थी।

सब्जियों के काटने पर साथ में कटे हाथों को जब वो ताई जी छुपाती मुस्कुराती तो ताई भी ऊपरवाले के भेदभाव से त्रस्त हो मन में उभरते उबाल को बड़ी मुश्किल से थाम उसके साथ ही मुस्कुरा देतीं।

ताई के साथ बैठी वो कशीदाकारी कर रही थी। सुई में लिपटे धागे को ऊपर से नीचे लाकर वो कपड़ों को सुंदर रंगों से भर रही थी। एक यही काम था, जिसमें लगी चोटें, व इससे मिले घाँव उसके चेहरे पर झूठी मुस्कान नहीं लाते थे। सुई धागे के साथ वो जैसे अपना दिल भी पिरो देती थी उस कपड़े में। उसके हाथों से उभरे आकारों को देख कोई कह नहीं पाता था कि ये एक 10 साल की लड़की ने उकेरे हैं। अक्सर इनमें इतना खो जाती वो कि फिर उसकी तंद्रा चीखती हुई चाची की आवाज़ से ही खुलती और हाडे को एक तरफ रख वो ताई को बाद में आने का कह निकल जाती उस घर के लिए जहाँ घुसते ही एक बेचारगी सी उसपर तारी हो जाती। बस एक ही चीज़ न बदलती, उसके चेहरे की मुस्कान! अब वो असली हो या नकली किसे फ़र्क पड़ता था? चाची के लिए तो वो उसकी बेशर्मी ही थी कि अपने माँ बाबु को खा जाने के बाद भी उसके चेहरे वो मुस्कान चस्पां थी।

कोई शायद ही जानता था कि उस मुस्कान के पीछे उसने किस भभक को दबाया था! भभक जो गर्म रेत पर पड़े छींटों की भांति कड़कड़ की आवाज़ करती उठती थी उसके भीतर जब जब भी वो चौखट पर बैठी, अपनी उम्र की लड़कियों को बस्ता टांगे स्कूल जाते देखती।

तब, जब वो 8-8 किलोमीटर के बस के सफ़र को करती, घर के लिए पानी लाने के लिए कमर पर लटके उस मटके को देखती, और फिर देखती उसी बस में बैठी, गोड़ों(घुटने) पर किताबें टेककर पढ़ती लड़कियों को। एक भभका उसके भीतर से गुज़र जाया करता और फिर से ओढ़ लेती वो वही मुस्कान जो बेशर्मी सी थी उसकी चाची के लिए!

आज फिर दुबारी से रोने की आवाज़ें आ रही थीं। सभी औरतें लाल जोड़े में लिपटी रूमी से लिपट कर रो रही थीं। आज उसकी विदाई थी। 17 साल की उम्र में उसे उससे 10 साल बड़े आदमी से ब्याह दिया गया।

सभी औरतों के आँखों में चंद लम्हों के लिए आँसू थे, लेकिन ताई और उसकी आँखें शायद भविष्य को भी अंधकार में देख बरस रही थीं।

अपनी आँखों में एक बार फिर एक भभका लिए और चेहरे पर फिर एक मुस्कान ओढ़े उसने अपने ससुराल की ड्योढ़ी पर कदम रख दिया। मायके में गरीबी में पली बड़ी रूमी ससुराल में भी गुरबत से रूबरू हो रही थी। पति के रूप में एक अच्छा जीवनसाथी मिल गया था लेकिन अब उसके जीवन में जंग के लिए ज़िम्मेदारियों से बनी और गुरबत से सींची एक और दीवार खड़ी थी।

लेकिन इस बार उसने मन बना लिया था उनसे लड़ने का, उनसे जीतने का!!

दिन भर के काम से थकी वो आज फिर हाडा लेकर रात में बैठ गई थी। आस पास के घरों में रहती औरतों को सब्जी मंडी या कहीं और बाहर जाते वक़्त पड़ती किसी थैले की ज़रूरत को देख उसके दिमाग़ में एक विचार कौंधा जिसको अस्तित्व में लाने के लिए उसने पहला कदम बढ़ाया था।

घर में घुसते ही पति ने उसे टोकते हुए कहा था,"कांईं अपनी आँखा फोड़ रहीं इणमें। इण सबसे कुछ न मिलणा तन्ने। चल उठ और आजा।"

उठकर उसने उनकी ज़रूरत पूरी की और फिर उसी कमज़ोरी के लम्हें में अपनी बात उनके सामने रख दी,"देखो जी, मैं चाहूँ हूँ कि इस तरह के थैला बणा बणाकर इन्हें बेचूँ। जो थारा साथ मन्ने मिला तो काम आसाण हो जावेगा, न तो म्हारा ख़्याल ख़्याल ही रह जावेगा।"

उन्हें अपनी ओर ताकता देख एक बार फिर से बोली वो,"ए, एक बार म्हारी बात माणकर तो देखो."

"मैं तो मान जाऊँगा, पर अम्मा को कैसे मनावेगी?"

"वो थम म्हारे पे छोड़ दो।"

अगले दिन उसने अम्मा को भी अपनी जलेबी जैसी बातों में उलझाना शुरू किया और उनकी भी हामी ले ली अपने विचार को आगे बढ़ाने के लिए।

धागे से आकृति उकेर लेना तो उसके बाए हाथ का खेल था लेकिन उस कपड़े को एक थैले का आकार देना ही उसके विचार का दूसरा चरण था जिसके लिए एक सिलाई मशीन की ज़रूरत थी।

न तो उसके पास कोई मशीन थी और न ही उसे खरीदने के लिए पैसों का कोई ठिकाना था।

बड़ी मेहनत से उसने हाथों से ही सिलाई करके अपना पहला थैला तैयार किया और फिर उसे पड़ोस में रहती कुछ औरतों के सामने रखा। थैला इतना सुंदर बनकर निकला था कि सभी की नज़रें जैसे उसपर टिक सी गईं।

उसका पहला थैला हाथों हाथ बिक गया और साथ ही कुछ और थैलों का काम भी उसे मिल गया।

बात चौपाल तक पहुँच चुकी थी और फिर धीरे धीरे पूरे गाँव में। उसके हाथों की कलाकारी अब पूरे गाँव के सिर चढ़कर बोल रही थी। हाथों से ही मशीन जैसी पक्की सिलाई और आकर्षक कला के ज़रिए अब बात गाँव की चौपाल से बाहर गांवों तक पहुँचने लगी और अपने साथ वापिस लाने लगी ख्याति और पैसा!!

घर की गुरबत दूर करने में थोड़े से योगदान ने उसकी अहमियत अब घर में बढ़ा दी।

बात तीसरे गाँव में खुले लघु उद्योग संस्थान तक पहुँची और जैसे रूमी के भाग खुल गए।

संस्था की दीदी को उसकी कला इतनी भायी कि उन्होंने उसे अपनी संस्था से जुड़ने का प्रस्ताव दिया। अंधा क्या माँगें, दो आँखें! उसने झट से ये प्रस्ताव स्वीकार लिया।

अब उसके सपने में औरों की आँखें भी शामिल हो रही थीं। तपती रेत पर मीलों पैदल चलकर, जब पैर रेत में धँसे धँसे जाते थे। उमस भरी गर्मियों में घूँघट के भीतर से, घर घर की धूल छानकर उसने अपनी कला को गाँव गाँव की हर औरत तक पहुँचाने का सपना साकार करने की ओर कदम बढ़ाया था। अकेले सफ़र करने वाली रूमी के साथ अब कारवाँ बंध चला था। आसान न था ये सफ़र, हर घर से उसे कला के प्रेमी नहीं मिलते थे। कुछेक से फटकार भी मिलती थी।

"ऐ, जा न! म्हारे घर की औरतों को बहकावे न। चूल्हा चौका छोड़ अब के ये थैले सीवेंगी? जा,अठे थारे बहकावे में कोई न आणे वाला।" लोगों की चुभती बातें सुनकर भी वो अपने पैरों को थकने न देती।

जब सूरज अपने चरम पर आता था तो एक भभका अब उसके मन के साथ तन में भी उतर जाया करता था। लेकिन गुरबत को अपनी आँखों से इन 21 सालों से देखती आई रूमी ने उन औरतों को रोजगार देने की ठानी थी जिन्हें घर के चूल्हे चौके में सारा दिन जलने के बाद भी गुरबत और नाकारी के तानों का सामना करना पड़ता था।

कोशिशों और मेहनत के दम पर उसका काफ़िला अब 500 औरतों तक पहुँच चुका था।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में चंद पढ़े लिखे व सम्मानित लोगों के बीच मंच पर खड़ी रूमी ने अपनी बात की शुरुआत "खम्मा घणी" के साथ की तो पूरा हॉल "खम्मा घणी" के शोर से गूँज उठा।

आज रूमी के मन का भभका बोल बनकर उसके होंठों से फूट रहा था,

"वो लड़की जिसने चौथी कक्षा भी पास न की, उसका इस मंच तक का सफ़र अद्भुत है। ताई की सिखाई कला मुझे यहाँ तक ले आएगी, मैंने कभी न सोचा था। पर अब जब ये हो रहा है तो ख़ुद को छूकर देखने का मन है, कि ये सच है या सपना!

चाची ने जब म्हारे बदन पर पहला थप्पड़ जड़ा था, उस समय उठी भभक आज जाकर शांत हुई है। इस मंच के ज़रिए मैं बस यही कहना चाहूँगी कि हुनर बस तुम्हारे जज़्बे का मोहताज है। तो बस उठो और लगा दो अपना सारा जज़्बा, अपने हुनर में और फिर बस उस हुनर का हाथ थामे उड़ चलो अपनी मंज़िल की ओर..."

तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा और सीढ़ियों से नीचे उतरती रूमी के ज़हन में पिछले कई साल एक रील की तरह चलने लगे.....

घर घर जाकर औरतों को रोज़गार देने का सफ़र अब फैशन शो की रैंप तक पहुँचने को था। अब तक मोहल्ले की महिलाओं की आँखों में रूमी के लिए प्रशंसा की जगह जलन ने ले ली थी। जगह जगह झुंडों में बात हो रही थी कोई उसके चरित्र पर सवाल उठा रहा था, और कोई उसकी किस्मत पर केवल रश्क़ खाकर बेवजह ही उसे नीचे गिराने के तरीके खोज रहा था।

इस सबका असर होना था और हुआ। घर में अम्मा ने हंगामा मचा दिया था और अब तक उसके साथ खड़े पति का भी विश्वास डोलने लगा था। वो सारा दिन घर से गायब रहती और अब उसका घर में न रहना सभी को खलने लगा था।

भरी आँखों से अम्मा को एक तरफ़ बिठाती हुई रूमी बोली," अम्मा, विश्वास कर म्हारा। मैं कुछ ग़लत न कर रही। संस्था ने ही आयोजित किया है ये कार्यक्रम। सरकारी योजना है अम्मा। देख, म्हारे एक कदम ने हमारा तो भविष्य संवार दिया। लेकिन उन बाकी औरतों का क्या अम्मा, जिनके पास थारे जैसी अम्मा न है, और थारे जैसे पति?

अम्मा, हमारे कारण अगर कुछ घर सुधर जाएँ तो सोच, कितना पुण्य मिलेगा तन्ने और मन्ने!"

आख़िर अपनी चिकनी और प्यार भरी बातों की काई पर उसने अम्मा और पति के पैरों को फिसला ही दिया था और चल पड़ी थी एक कदम और बढ़ाने और भरने उजियारा दूसरों के जीवन में।

फैशन शो में जब उसके हाथों की कलाकारी से सजे कपड़े पहनकर लड़कियों और लड़कों ने जलवे दिखाए तो सभी को उसकी कला का लोहा मानना पड़ा। उस सरकारी आयोजन से काफ़ी पैसा अब उसकी संस्था तक पहुँच चुका था जिसकी वो इस समय में प्रेजिडेंट थी।

उसके इस फैशन शो ने उसकी पहुँच अब राजस्थान के बाहर कर दी और 500 महिलाओं का काफ़िला कब 50000 महिलाओं तक पहुँचा इसका पता किसी को नहीं चला।

सीढ़ियों से नीचे उतरती उस महिला ने अपने घर की मनहूस होने से हज़ारों औरतों की नायिका होने का सफ़र बड़ी मुश्किलों को पार करके, अपने दृढ़ हौंसले के दम पर आज आख़िरकार पूरा कर ही लिया था।


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