Prabha Gawande

Abstract


3.8  

Prabha Gawande

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समर्पण

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शुभांगी कहाँ हो तुम। अचानक शौर्य की आवाज सुन शुभांगी चौंक कर दौड़ी , और दरवाजा खोलने लगी। आप इतने जल्दी अभी तो ग्यारह बजे हैं।

... मास्क उतारकर साइड में रख आँगन के वाशबेसिन में हाथ धोते हुए शौर्य बोले कुछ नही शुभु आज भूख लगी थी जोर से इसलिए दस मिनिट का कहकर आया हूँ हास्पिटल से। जल्दी से कुछ दे दो खाने को, मै यहीं आँगन में बैठा हूँ।

... शुभांगी दौडकर किचेन में आई अभी तो बस सब्जी ही बनी है, जल्दी से आटा गूँथते हुए सोचने लगी, सुबह आठ बजे से ड्यूटी पर ग ए थे शौर्य और आज तो नाश्ता भी नही किया, रात भी बारह बजे लौटे हैं, जरा भी। फुर्सत नही होती इन्हें शुभांगी की आँखें भर आईं। जल्दी से रोटी ततवे पर डालकर वह थाली लगाने लगी, दही और पराँठे शौर्य को बहुत पसंद हैं। भिंडी की सब्जी और दही पराँठे परोसकर शौर्य को डाइनिंग टेबल पर आने के लिए बुलाने लगी, मगर शशौर्य बोले नही यहीं आँगन में ले आओ।

शुभा थाली और पानी का ग्लास लेकर आँगन में आई तो शौर्य बोले रख दो मैं ले लूंगा। वह भी दूसरा परांठा सेंकने किचेन में आ गई। सोचने लगी जब से कोरोनना वायरस आया है, शौर्य को अधिकतर हास्पिटल में ही रहना पड़ता है।। उसकी छोटी सी बेटी रिद्धि अपने पापा से मिल ही नही पाती , क्योंकि शौर्य ने उसे बता रखा है, यह बीमारी घरवालों को न हो इसलिए वह हास्पिटल से आकर डिस्टेंस और साववधानी रखता है। शौर्य पर उसे बहुत गर्व है, वह उस व्यक्ति की पत्नी है, जो दिनरात मरीजों की सेवा में लगे हैं। मगर माँ को क्या समझाऊं वह बहुत चिंता करती हैं, वह शौर्य से कह रही है। तुम माँ को प्यार से समझाओ, मेरे काम के बारे में, मेरी समाज और देश के प्रति जो जिम्मेदारी है उसके बारे में, और हाँ देखो शहर में मरीज बहुत बढ़ रहे हैं, शायद अब चार पाँच दिन बाद आ पाऊं, तुम घर में सबको अच्छी तरह सँभालना।

शुभा की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, शौर्य बोले, इस जंग में तुम्हारे आँ सू मुझे कमजोर बना देंगे, तुम मेरा बराबरी से साथ दो शुभा, इस बीमारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है, मेरे लिए एक एक व्यक्ति की जान कीमती है, मैं जितना भी अपने देशवासियों के लिए कर पाऊं। तुम साथ दोगी न। बस घर से मत निकलना और घर वालों का पूरा खयाल रखना अपना भी, लव यू डार्लिंग होल लाईफ। और उसे फ्लाईंगकिस देते हुए शौर्य मास्कलगा मोटरसाइकिल पर सवार हो चल दिए। शुभांगी ने मुस्कुराकरहाथ हिलाकर बिदा किया , और अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया। माँ को देखने कमरे में गई वो आराम से सो रही थीं। आज उसने भी एक निश्चय किया, देश में मास्क की बहुत ज्यादा जरूरत है। मास्क सिलना आसान है, वह भी अपनी मशीन निकालेगी आज ही, और मास्क सिलेगी।

बस फिर क्या था , जल्द ही घर के काम निबटाकर वह ऊपर के कमरे से मशीन नीचे उतारकर ले आई। माँ कहनेलगी क्या सिलना है बेटा। माँ ये कोरोना वायरस से जो बीमारी होती है न उससे यह मास्क हमारी सुरक्षा करता है, इसलिए घर से निकलते वक्त हर व्यक्ति को मास्क लगाना चाहिए, मेरे पास कुछ काटन के कपडे रखे हैं, उसी से मास्क सिलकर देखती हूँ, अच्छा बना तो फिर थोक बाजार से कपडा लाकर बहुत सारे मास्क बनाऊंगी। माँ बहुत खुश हुईं, और मास्क बनाने में शुभांगी की मदद करने लगी। पाँच दिन मेंं करीबन पाँचसौ मास्क तैयार हो गए। शुभांगी को विश्वास नही हो रहा.था कि ये उसने बनाए हैं, वह खुशी से झूमने लगी।

संडे को शौर्य का फोन आया कि कुछ देर के लिए घर आरहा हूँ। शुभांगी जल

दी से खानाबनाकर तैयार हुई। शौर्य आये मगर गेट के पास ही खडे रहे। वहीं हाथ धोए और वहीँ बैठकर खाना खाया, बेटी को भी वहीं से प्यार जताया । शुभा ने कहा सुनिए, और मास्क का थैला लाकर सामने रख दिया।

शौर्य बोले ये क्या है ? यह मास्क हैं, मैने और माँ ने बनाए हैं, इन्हे गरीब जरूरतमंदों में बँटवा दीजीएगा।

शौर्य को बहुत गर्व हुआ । और वह थैला उठाकर चलने लगा तो बेटी मचल गई। पापा गोदी लो, शुभांगी ने उसे गोद में उठाकर समझाया , बेटा पापा को ड्यूटी पर जाना बहुत जरूरी है। हँसकर टाटा करो पाापा को, बिटिया ने नन्हा हाथ माथे पर रखकर कहा जय हिंद पापा। और जातेहुए शौर्य ने भरी आँखों और गर्व से सीना तानकर बेटी को हाथ माथेपर रखते हुए कहा जयहिंद।



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