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Deepak Kaushik

Abstract


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Deepak Kaushik

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शोधप्रबंध

शोधप्रबंध

8 mins 13 8 mins 13

अभी मैं खाना खाने बैठा ही था कि मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी। 

"कौन होगा...?" 

मैंने मन ही मन झल्लाते हुए कहा। 

"चैन से खाना भी नहीं खाने देते हैं लोग।"

मुझे खाने के समय किसी का भी व्यवधान अच्छा नहीं लगता। गनीमत थी कि अभी मैंने खाना शुरू नहीं किया था, अन्यथा मैं फोन उठाता ही नहीं।

"हैलो...!"

मैंने फोन उठाया और मरी-मरी सी आवाज में कहा।

"मैं दिव्या बोल रही हूं। क्या आज तुम मुझसे मिल सकते हो।"

"अभी तो मैं भोजन कर रहा हूं।"

"मैं तुरंत नहीं, दिन में किसी भी समय मिलने के लिए पूछ रही हूं।"

"कब और कहां?"

मैंने कुछ सोचकर प्रश्न किया।

"यूनिवर्सिटी में। मैं चार बजे तक यूनिवर्सिटी में ही रहूंगी। तुम किसी भी समय आकर फोन कर देना। मैं आकर मिल लूंगी।"

"ठीक है। मैं पहुंच कर फोन करता हूं।"

"ओके।"

और फोन डिस्कनेक्ट हो गया। मैंने शांति के साथ भोजन किया। कुछ देर आराम किया फिर कपड़े पहन कर विश्वविद्यालय की तरफ चल पड़ा।

दिव्या।

इससे मेरा परिचय कोई छ:-सात साल पहले हुआ था। जब मैं बी.काम. फाइनल ईयर में था और दिव्या बी.काम. प्रथम वर्ष में थी। बी.काम. सेकेंड ईयर और बी.काम. फाइनल ईयर के छात्रों ने प्रथम वर्ष के छात्रों को वेलकम पार्टी दी थी। मैं पिछले दोनों सालों से अपनी फैकल्टी में टाप कर रहा था। आशा यही थी कि इस वर्ष भी टाप ही करूंगा। फैकल्टी में सबसे ज्यादा मेधावी छात्र होने के कारण फैकल्टी में मेरी अच्छी धाक थी। शिक्षकों से लेकर शिक्षार्थियों तक, सभी मेरा सम्मान करते थे। इसलिए पार्टी को होस्ट करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसी पार्टी में मैं पहली बार दिव्या से मिला था। जब मैंने उसे पहली बार देखा था तब जैसे मेरी दृष्टि उस पर जम सी गई थी। तीनों वर्षों में इतनी सुंदर लड़की नहीं थी। ऊपर से चाकलेटी कलर की साड़ी में कयामत ढ़ा रही थी। वैसे यूनिवर्सिटी में रैगिंग वगैरह आम बात थी। मगर मैं रैंगिंग जैसी कुप्रथाओं से दूर रहने के कारण और अपनी पढ़ाई की तरफ ज्यादा ध्यान देने के कारण अपने बैच के छात्र-छात्राओं के अतिरिक्त ज्यादा किसी की तरफ ध्यान भी नहीं देता था। इसलिए मेरा दिव्या से पहला परिचय वेलकम पार्टी में ही हुआ था। इसके अतिरिक्त दिव्या ने भी एक सप्ताह पहले ही फैकल्टी में आना शुरू किया था। उस पार्टी में हुआ परिचय बाद में अच्छी दोस्ती में बदल गया, जो अब तक कायम था।


मैंने विश्वविद्यालय पहुंच कर दिव्या को फोन किया।

"हां, कहां हो।"

"गेट नं० तीन पर।"

"गेट नं० तीन के बगल में जो बगीचा है, उसमें एक बरगद का पेड़ है...।"

"हां! है।"

"बस, उसी के नीचे इंतजार करो। मैं वहीं आती हूं।"

"ठीक है। मैं इंतजार कर रहा हूं।"

मैंने फोन काट दिया। बरगद के पेड़ के नीचे एक चबूतरा बना था। जिस पर अक्सर विश्वविद्यालय के प्रेमी जोड़े बैठकर प्यार भरी बातें किया करते थे। उसी चबूतरे पर जाकर मैं बैठ गया। गनीमत थी कि इस समय विश्वविद्यालय के अधिकांश संकाय और विभाग बंद हो चुके थे। इसलिए इस समय यहां कोई भी प्रेमी जोड़ा नहीं था। 

दिव्या ने बहुत देर इंतजार नहीं कराया। मुश्किल से दस मिनट बीते होंगे कि वो आ गई। उसके चेहरे से साफ दिखाई दे रहा था कि वो काफी परेशान है। प्रारंभिक कुशल-क्षेम के बाद मैंने पूछा-

"कुछ परेशान सी लग रही हो।"

"हां, परेशानी वाली बात ही है।"

"क्या बात है?"

"मेरे गाइड ने मेरी थीसिस रिजेक्ट कर दी है। मैंने बड़ी मेहनत से लिखी थी।"

"इससे पहले भी रिजेक्ट हुई थी?"

"नहीं! पहली बार ही ऐसा हुआ है।"

"दिव्या, तुम पहली बार में ही घबरा गई। मेरी तो चार बार रिजेक्ट हुई थी। तब जाकर मुझे एहसास हुआ था कि मैं इस जिंदगी में तो डॉ० नहीं बन पाऊंगा। तब मैंने थीसिस लिखने में समय व्यर्थ गवांने की जगह दूसरा रास्ता चुन लिया। अब मैं अच्छा खासा कमा रहा हूं। हां, मुझे वो रुतबा हासिल नहीं हुआ जिसके लिए मैं डिजर्व करता था।"

"इसका कोई तो उपाय होगा?"

"ये यूनिवर्सिटीज में फैली एक लाइलाज बीमारी है। अव्वल तो भारत की यूनिवर्सिटीज में शोध होते ही नहीं। शोध के नाम पर कट-पेस्ट ही होता है। दस किताबें पढ़ लो, कुछ यहां से उठाओ- कुछ वहां से, अपने गाइड को खुश करो और शोध-प्रबंध पास करा लो। नये विचारों और नये अनुसंधान के लिए यहां कोई जगह नहीं है। इन शोधकर्ताओं को अपने शोधप्रबंध को पास कराने के लिए किस-किस तरह से अपने स्वाभिमान को मारना पड़ता है, इसका तुम्हें पहला अनुभव मिला है। तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। या तो मेरा रास्ता चुनो और शोध को भूलकर जिंदगी की दौड़ में शामिल हो जाओ या फिर... तुम लड़की हो, सुंदर हो। तुम्हारे लिए शोध-प्रबंध पास कराना बहुत आसान है, बस अपने गाइड की इच्छा पूरी कर दो। तुम्हारा वही शोध-प्रबंध, जो रिजेक्ट हो गया है, पास हो जाएगा। और यदि वो पास नहीं हुआ तो तुम्हारा गाइड खुद ही तुम्हारा शोध-प्रबंध लिखकर पास कर देगा।"

दिव्या सोच में पड़ गई। जहां तक मैंने दिव्या को जाना था- दिव्या एक संस्कारी लड़की थी। अति सुंदरी होने और बी.काम. प्रथम वर्ष से लेकर एम.काम. फाइनल तक दर्जनों लड़कों से दोस्ती होने के बावजूद भी उसका किसी के साथ अफेयर नहीं चला। सच कहूं तो उसके रूप के जाल में मैं खुद भी फंस गया था। मैंने खुद उससे एक बार प्रणय याचना की थी। जिसे उसने बड़ी शालीनता से ठुकरा दिया था। यह कहकर कि आप के जैसे अच्छे व्यक्ति को ये सब शोभा नहीं देता। हम अच्छे दोस्त हैं और अच्छे दोस्त ही रहेंगे। उसके बाद उसने मुझ से बात करना बंद कर दिया था। मुझे भी स्वयं पर ग्लानि हो रही थी। कुछ दिनों तक बातचीत बंद रहने के बाद, ये अवधि शायद एक-डेढ़ महीने की रही होगी, प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष के छात्रों की तरफ से हम लोगों को विदाई की पार्टी दी गई। जैसे वेलकम पार्टी से मेरी दिव्या से दोस्ती की शुरुआत हुई थी उसी तरह विदाई समारोह में मलिनता समाप्त भी हो गई और हम फिर से अच्छे दोस्त बन गए।

मैं कुछ देर के बाद वापस लौट आया। कोई दो-ढाई महीने के बाद पुनः दिव्या का फोन आया। 

"मैं मिलना चाहती हूं।"

"कोई विशेष बात!"

"हां! तुम्हें मिठाई खिलाना चाहती हूं।"

"किस खुशी में।" 

"मिलो तो बताऊंगी।"

"ठीक है। जगह और समय बताओ।"

"चार बजे से पहले। यूनिवर्सिटी में। उसी जगह पर। गेट नं० तीन के पास वाले बगीचे में। बरगद के पेड़ के नीचे।"

उसने एक सांस में पूरा पता बता दिया। 

मैं तीन बजे ही पहुंच गया। इस बार भी दिव्या ने ज्यादा इंतजार नहीं करवाया। अपने हाथों में मिठाई का डिब्बा लिए आ पहुंची। आते ही डिब्बा खोलकर मेरे मुंह में बर्फी ठूंस दी। मैंने मिठाई खाई। काजू की बर्फी थी। 

"खुशी तो बताओ।"

मैंने बर्फी खाते हुए पूछा।

"मेरी थीसिस पास हो गई।"

एक ही पल में मैं समझ गया कि थीसिस पास कराने के लिए दिव्या ने क्या त्याग किया है।

"मैं असमंजस में हूं कि तुम्हें थीसिस पास हो जाने के लिए बधाई दूं या तुमने जो खोया है उसके लिए अफसोस जाहिर करूं।"

"लेकिन...।"

"हां! मैंने ही तुम्हें सलाह दी थी। मगर मैंने तुम्हारे सामने दो सुझाव रखे थे। उन दोनों में से किसी एक का चयन तुम्हें करना था। तुम्हें जो उचित लगा वो तुमने चुना। ये मत समझना कि मुझे तुमसे किसी तरह की कोई शिकायत है। तुम मेरी दोस्त थी दोस्त बनी रहोगी। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। जिंदगी तुम्हारी है जैसे चाहे जियो।"

हम दोनों में इधर-उधर की दुनिया जहान की बातें होने लगी। एक घंटा साथ रहने के बाद मैं वापस आ गया। क्योंकि शाम छः बजे से रात नौ बजे तक मैं आई.एस. प्रतिभागियों को पढ़ाने एक कोचिंग में जाता था। लेकिन उस दिन मैं अपने कोचिंग सेंटर नहीं गया। मैंने बीमारी का बहाना बना दिया था। उस दिन किसी भी काम में मेरा मन नहीं लग रहा था। उस दिन मुझे बार-बार वो दिन याद आ रहा था जब मेरे गाइड ने चौथी बार मेरे शोधप्रबंध को अस्वीकार किया था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे प्रेजेंटेशन में ऐसी क्या कमी रह जाती है जिसकी वजह से हर बार मेरा गाइड मेरे प्रेजेंटेशन को कैंसिल कर देता है। कारण जानने के लिए मैंने एक उपाय निकाला। मेरे एक मित्र हैं। मुझसे दो साल सीनियर। एक अन्य यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं। मैंने उनसे संपर्क किया। अपने चारों रिजेक्टेड शोधप्रबंध उन्हें दिखाए। उन्होंने उसे खुद भी पढ़ा और अपने विभाग के एक प्रोफेसर को भी दिखाया। दोनों ही एकमत थे कि किसी भी शोधप्रबंध में कोई त्रुटि नहीं है। यह जानने के बाद मैंने खुलकर अपने गाइड से बात करने का निर्णय किया। मेरे गाइड ने जो मुझसे चाहा, उससे मुझे एक गहरा धक्का लगा। उन्होंने कहा-

"कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है।"

"सर! आप बताइए, मुझे क्या खोना है।"

मुझे लगता था कि दूसरे शोधकर्ताओं की तरह मुझे उनकी कुछ चापलूसी करनी होगी। या कुछ भेंट-उपहार, या कुछ धन, या मदिरा, या किसी औरत की व्यवस्था, या ऐसे अनगिनत विकल्प हो सकते थे। मगर उन्होंने जिस विकल्प की बात की वो मेरे लिए अकल्पनीय ही नहीं घृणित भी था। उन्होंने कहा-

"इतने बुद्धिमान होकर भी अंजान मत बनो।"

कहकर उन्होंने अपना हाथ मेरी जांघ पर रखा और ...। उस समय मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। मैं चाह कर भी विरोध नहीं कर पा रहा था। कुछ देर तक यही स्थिति बनी रही। ‌‌‍अचानक मेरे मस्तिष्क में एक बिजली कौंधी। मैंने कहा-

"सर! आप व्हिस्की पसंद करेंगे या रम। या कुछ और। मैं लेकर आता हूं।" 

उनकी आंखों में चमक आ गई। उन्होंने कहा-

"ठीक है। व्हिस्की ले आओ।"

मैं व्हिस्की लाने के बहाने जो वहां से निकला तो पलट कर उनके पास नहीं गया। उन्होंने मुझसे संपर्क करने की बहुत कोशिश की। वो फोन करते मैं फोन उठाता ही नहीं। उन्होंने अपने दूत भेजे। मैं उनसे या तो मिला ही नहीं ‌या उन्हें टाल दिया। उन्होंने मुझे धमकी भी दिलवाई। मैंने उसका भी मुस्कुराकर जवाब दिया कि तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाओगे।

रात भर मेरे सामने उहापोह की स्थिति बनी रही। लेकिन अगले दिन की सुबह जैसे मेरे लिए नया संदेश लेकर आई थी। अगले दिन सुबह मेरे मन में विचार आया कि शायद ईश्वर को मुझसे कोई इससे भी बड़ा काम लेना होगा। इसलिए उसने वो रास्ता बंद कर दिया। मगर अब मेरे सामने और भी रास्ते हैं। मैं आई.एस. प्रतिभागियों को पढ़ाता हूं तो क्यों न मैं स्वयं ही आई.एस. की तैयारी करूं। अभी कम से कम दो बार मैं परीक्षा में शामिल हो सकता हूं। 

यह विचार आते ही मुझमें एक नये जोश ने जन्म लिया। और अब मैं पढ़ाने के साथ ही साथ स्वयं भी आई.एस. की तैयारी कर रहा हूं।


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