अजय '' बनारसी ''

Abstract Tragedy Inspirational


4.6  

अजय '' बनारसी ''

Abstract Tragedy Inspirational


शिक्षासदन

शिक्षासदन

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 सूरज आज कड़ी धुप में महाविद्यालय के गेट पर अपनी ड्यूटी दे रहे थे। आने जाने वाले सभी छात्रों के पहचान पत्र देख रहे थे कुछ को तो वो पहचानते भी थे, लेकिन जो कभी-कभार आते हैं, ऐसे छात्र-छात्राओं पर उनकी कड़ी नज़र रहती है। पिछले दो महीने से गेट की ड्यूटी मिली है। समय-समय पर यह ड्यूटी बदलती रहती है कभी किसी फ्लोर पर,कभी लाइब्रेरी के सामने, कभी गेट पर ऐसे ही दिन कट रहे थे।  

सूरज कड़ी मेहनत करते हैं और कर्म को ही प्रधान मानते हैं। सूरज आज याद कर रहे हैं जब इस महानगर में उन्होंने अपना पहला कदम रखा था, महज १८ वर्ष के थे। बारह पास करने के बाद आर्थिक स्थिति ने उन्हें मुंबई का रास्ता देखने पर मजबूर कर दिया था । गरीबी ने पीठ और पेट को एक कर दिया था। सी। एस। टी। तब वी। टी। हुआ करती थी। आज भी उसकाल के लोग भूले भटके वी। टी। कहना नहीं भूलते।

पड़ोस के गाँव के काका बुधिराम मिल मजदूर थे। सात रास्ता धोबी तलाव के पास मिल में काम करते थे। सूरज के पिता के बड़ी चिरौरी करने पर साथ में लाये ज़रूर थे, लेकिन उनकी इच्छा नहीं थी कि सूरज यहाँ टिक कर कमाई करे। बुधिराम की कमाई गाँव में सरनाम है, वो तो सूरज के दादाजी का दबाव न होता तो किसी कीमत पर अपने साथ नहीं लाते। क्योंकि उनकी बनी बनाई पोल जो खुल जाती। खैर दस बाई दस की खोली में कुल आठ लोग रहते थे कपडा मिलें चौबीस घंटा चलती रहती थी। सभी का आठ-आठ घंटे का शिफ्ट होता था कभी कभी ओवर टाइम भी इसलिए सभी लोग एक साथ कभी भी खोली में रहते नहीं थे।

बुधिराम ने आते ही सूरज को बर्तन धोने और खाना बनाने में मदद करने की ज़िम्मेदारी दे दी और नौकरी के लिए बात करता हूँ कहते हुए टालते रहे। सोच रखा दो महीने बाद छोटा भाई जब गाँव जायेगा साथ में सूरज को भी लटका देंगे। सूरज स्वयं उदित होता है उसे कोई क्या लटका सकता है। जल्द ही सूरज ने यह भांप लिया। खोली में ही बिरजू रहा करते थे बिरजू और सूरज दोनों की खूब जमने लगी। सारी बातें जानने के बाद बिरजू ने सूरज की नौकरी अपने गाँववाले संजीवन के लालबाग स्थित दाना मिल में नौकरी लगवा दी। कुछ ही दिनों में सूरज मुंबई से अभ्यस्त भी हो गया जल्दी ही बुधिराम की खोली छोड़ संजीवन के साथ रहने लगा।

दाना मिल में जानवरों के लिए दानों की दलाई की जाती थी। बोरी में देश भर के सभी तबेलों में सप्लाई की जाती थी। सूरज की ईमानदारी से सेठ जी बहुत प्रसन्न रहते थे। एक दिन बात बात में ही उन्हें पता चला सूरज इंटर पास है मज़बूरी में उसकी पढाई छुट गई है। सेठ जी बड़े दयालु और समझदार व्यक्ति थे उन्होंने सूरज को आगे पढ़ने की सलाह ही नहीं दी अपितु मदद भी की जिससे सूरज ने बी। ए।  फ़िर हिंदी से एम। ए। की डिग्री प्राप्त की। इसी बीच गाँव आना जाना लगा रहा। छोटे भाई और तीन छोटी बहनों की शादी का जिम्मा अभी बाकि था। सूरज ने तय किया था कि वह शादी नहीं करेगा। लेकिन सामाजिक दबाव के चलते सूरज की शादी हो गई। पत्नी गाँव में ही रहकर माता पिता का ख्याल रखती थी।  

एक दिन अचानक सेठ जी ने सभी कर्मचारियों को बुलाया। सेठ जी की कोई औलाद नहीं थी। उनके छोटे भाई मध्यप्रदेश भोपाल में रहते थे। छोटा भाई कई दिनों से भैया से कह रहा था कि सब बंद करके भोपाल चले आओ यहाँ पूरा परिवार है,आखिर यह सब किसके लिए कर रहे हो। सेठ जी का छोटा भाई भी यहीं रहा करता था किन्तु सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद उसकी नियुक्ति भोपाल के सिंचाई विभाग में हो गई थी। वह वहाँ पिताजी और अपने परिवार के साथ पुश्तैनी मकान में रह रहा था। सेठजी के पिताजी का वहां किराने का व्यापार भी था। छोटा भाई पढ़ाई करने मुंबई उनके पास आया हुआ था। छोटे भाई की बात मानते हुए भोपाल में ही छोटा व्यवसाय किराने की होलसेल दुकान खोलने की योजना सबको बताई। यह भी कहा जो साथ में चलना चाहता है उनके साथ भोपाल चले और नये व्यवसाय में उनका हाथ बटाएँ। गिनती के कुल पांच लोग थे। जिनमे से तीन लोगो ने भोपाल जाने के लिए हामी भरी और सूरज चुप रहा उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।

जैसे-तैसे रात कटी सूरज को रात भर नींद नहीं आई। सुबह जल्दी उठकर वह काम पर लग गया। अभी यहाँ से मिल के उठने में दो से तीन महीने का समय था। सूरज ने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन भी किया लेकिन नौकरी नहीं मिली वह हताश हो गया था। सेठ जी उसकी मनोदशा को अच्छे से समझते भी थे। पंद्रह दिन ही बचे थे सूरज अभी तक यह तय नहीं कर पाया था कि वह सब के साथ भोपाल जाएगा या यहीं कहीं उसे नौकरी मिल पाएगी।

एक दिन बड़े सबेरे सेठ जी आये और सूरज को अपने पास बुलाया। उन्होंने बड़े भारी मन से कहा । । सूरज मैं यहाँ के सभी बड़े लोगो को जानता हूँ और तुम्हारे लिए मैंने कई जगह सिफ़ारिश भी की लेकिन हिंदी अध्यापक के लिये कहीं भी जगह खाली नहीं हैं। मैंने तुम्हे एम। ए। तक इसलिए पढ़ने कहा था कि मुझे तुम्हारे भीतर एक प्रतिभा दिखाई देती थी । ऐसा लगता था कि तुम्हें आगे और पढना चाहिए। मुझे कहते हुये संकोच हो रहा है एक महविद्यालय में वाचमैन की नौकरी की बात हुई है। मैंने उनसे कहा की मुझे हिंदी अध्यापक के लिये नौकरी चाहिए लेकिन मौजूदा स्थिति यह है की कहीं भी जगह खाली नहीं है, और जहां खाली है वहां कुछ सरकारी अड़चन है। उस महाविद्यालय का मेरा ट्रस्टी मित्र मुझे निराश नहीं करना चाहता इसलिए उसने मुझसे इस नौकरी का प्रस्ताव दिया है, यदि तुम्हे मंजूर हो तो कल से वहां काम पर जा सकते हो मुझसे तुम्हारे लिए इतना ही हो सका मैं चाहता था मेरे सभी कर्मचारी मिल बंद होने के बाद बेरोज़गार ना हों। देखो शायद आगे तुम्हे वहां या किसी दूसरी जगह ढंग की नौकरी मिले तो बदल लेना।  

वह दिन है और आज का दिन सुरज यहीं का होकर रह गया। कई जगह आवेदन भी किया लेकिन नतीजा ठनठन गोपाल ही रहा। सूरज फ़िर भी खुश हैं यहाँ इस नौकरी में वह कर्मयोग में विश्वास रखता है। उसका मानना है कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। दो वर्ष के भीतर ही वह परमानेंट भी हो गया यहीं की कमाई से छोटे भाई-बहन की शादी की। गाँव में पक्का मकान बनवाया, सिंचाई के लिए ट्यूबवेल लगवाया। आज उसे एक बेटा और बेटी भी है जो कक्षा बारहवीं और दसवीं में गाँव में ही पढ़ते हैं।

सूरज ने रहने के लिए एक मकान किराये पर लिया है, साथ में कुछ और लोग भी शेयर करते हुए साथ में रहते हैं। लगभग सभी सुबह साथ में निकलते हैं और रात नौं बजे के बाद ही जुटते हैं सूरज शाम को जल्दी पंहुच जाते हैं। थोडा बहुत लाइब्रेरी से लाई किताबों को समय देते हैं, बाद में भोजन की तैयारी में जुट जाते हैं यही दिनचर्या बन चुकी हैं। फ़िलहाल सूरज जयशंकर प्रसाद रचित कामायनी का रसास्वादन फ़िर से कर रहें हैं उनकी रूचि के अनुसार वे अक्सर किताबे पढ़ते रहते हैं और अपने ज्ञान को बढ़ाते ही रहते हैं। इससे पहले उन्होंने अभी हाल ही में रामचंद्र शुक्ल जी का हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा था। साहित्यिक किताबों से एक अलग ही प्रेम था सूरज को शायद उन्हें वह सही स्थान नहीं मिल पाया था जिसके वो योग्य थे आजकल महविद्यालय में ऐसे लोग हिंदी पढ़ा रहें हैं जिनका हिंदी से दूर तक कोई लेना देंना नहीं हैं बस सरकारी जुगाड़ से स्थान पा गए हैं और जितना उन्हें समझता है उतना ही लोगो को समझा पा रहे हैं।   

अगले दिन सूरज की ड्यूटी फ्लोर पर लगाई गई। सूरज सभी बच्चो पर विशेष ध्यान देते थे। इशारे-इशारे में उन्हें मदद भी करते थे। आज दो छात्राएं जो की बी ए फ़ाइनल इयर में पढ़ती थी आपस में बात कर रही थी। जिसे सूरज ने सुना एक कह रही थी। । क्या पढ़ाते हैं कुछ समझ में ही नहीं आता। आज जयशंकर प्रसाद की कामायनी में आनन्द सर्ग किस तरह से पढ़ा रहे थे ऐसा लग रहा था मानो सीधे-सीधे किताब को देखकर पढ़ रहें हो ये हमारे प्रोफ़ेसर हैं या छात्र कुछ समझ में ही नहीं आता। । । दूसरी बोली अरे ! मैंने उनसे कुछ पूछ क्या लिया गंदे तरीके से देखते हुए बोले क्लास के बाद मिलो तुम्हे नोट्स देता हूँ पढ़ लेना। । कौन जायेगा ऐसे लोगो से नोट्स लेने जिनकी नज़र ही गन्दी हो। सूरज यह सब सुन रहे थे और उन्हें भीतर ही भीतर गुस्सा भी आ रहा था आखिर करें तो क्या करें। यहाँ कुछ लोग नोट्स की लालच बाद में एम फिल और पी एच डी के बहाने क्या कुछ नहीं होता और ऐसा इसलिए भी होता हैं औसत १०० में से यदि ४-५ भी उनके झांसे में आ जाये तो बाकियों से उन्हें क्या लेना देना और कुछ लोग इस चक्कर में बहक भी जाते हैं।

सूरज काफ़ी देर तक उनकी वार्तालाप सुनता रहा । उससे रहा नहीं गया आखिर वह भी एक पोस्ट ग्रेजुएट हैं भले वह यहाँ वॉचमैन है तो क्या हुआ उसका अध्ययन अभी भी रुका थोड़े ही हैं। और आजकल वह उसका अध्ययन भी कर रहे हैं। उसने बड़े सहजता उनके पास जाकर पूछा । आनन्द सर्ग के बारे में क्या जानना हैं ,क्या आपको उसमे समझ में नहीं आया, पूछो मैं बता देता हूँ । लड़कियों ने सूरज को उपर से नीचे देखा जैसे उन्हें अपने कानो पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। एक लड़की बोली। क्या कहा फ़िर से कहना । सूरज ने फ़िर वही सवाल दोहराया इतने में दूसरी लड़की का पारा चढ़ गया और गुस्से में तमतमाते हुए बोली । ठरकी बुड्ढे तू हमें पढ़ायेगा जो रात दिन मेहनत करके पी एच डी होने के बाद हमें रट्टू तोते की तरह किताब खोल कर पढ़ा रहें हैं उनसे भी आगे जाएगा , जो कर रहा है वही कर ज्यादा होशियारी मत दिखाना हमें सब समझता हैं। आज हिम्मत कर ली दुबारा मत करना वरना प्रिंसिपल से शिकायत करुँगी कि यह हमें छेड़ता हैं।

सूरज को काटो तो खून नहीं अपनी बेटी की उम्र की लड़की से प्रकार ज़वाब की उम्मीद नहीं थी। लेकिन बड़े जल्दी ही उन्हें यह समझ में आ गया गलती सूरज की ही थी जब उनके प्रोफेसर उन्हें ढंग से पढ़ा नहीं पा रहे हैं तो एक वाचमेन उन्हें क्या पढ़ा पायेगा ये प्रश्न सूरज के दिमाग में होना ही चाहिए था। सूरज जल्दी इस बात को भूलना चाहते थे लेकिन अब उनकी रातों की नींद हराम हो गई । साथ में उनकी भी एक बेटी हैं और महविद्यालय में शिक्षा के नाम पर मुट्ठी भर लोगों से होने वाले शोषण से उन्हें घिन आने लगी थी, आखिर क्या शिक्षा के मंदिर में यह शोभा देता हैं। इसी उधेड़बुन में वो पागल से हो गए। सूरज के भीतर न जाने क्यों एक अपराध बोध घर कर गया था मानो वह बिना कुछ गलत किये बहुत नीचे गिर गया हो। सूरज के लिए यह एक बहुत बड़ा दंड था और एक पाप भी उससे हो गया था ऐसा उसे लगता था वह इस पाप की प्रायश्चित करना चाहता था। इसके लिए वह चाहता था कुछ करे ताकि वह इस मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर आये नहीं तो वह सचमुच पागल हो जायेगा।

इसी चिंता में उससे अब कुछ खाया पीया भी नहीं जा रहा था। कभी दाल में नमक ज्यादा तो कभी चावल जल जा रहे थे। इतना सब होने के बाद भी सूरज समझ नहीं पा रहे थे आखिर वह करे तो क्या करे उसका दिमाग फटा जा रहा था। साथ में रहने वाले बलबीर ने सूरज की स्थिति को समझने की कोशिश की उसके भीतर आ रहे बदलाव को वह पिछले दो दिनों से महसूस कर रहा था। बलबीर उसके साथ इस किराये के मकान में पहले से ही रह रहा था।

रविवार का दिन था सुबह सुबह सूरज बरामदे में बैठा बाहर आकाश की ओर देख रहा था। वैसे रविवार को सभी देरी से उठते हैं एक सूरज को छोड़कर क्योंकि उसे कभी कभी रविवार को भी ड्यूटी जाना होता था इसलिए उसके छुट्टी का कोई ऐसा क्रम वाला दिन नहीं था कि आज वह लेट उठेगा और बाकि दिनों में जब उसकी छुट्टी होती थी तो घर के अन्य सदस्य काम पर जा रहे होते थे इसलिए उसे सुबह उठकर पूजा पाठ से निवृत होकर सात बजे घर छोड़ना होता था। कॉलेज ज्यादा दूर नहीं था पैदल पांच मिनट का रास्ता था और उसे साढ़े सात तक कॉलेज पंहुचना ही होता था।

सुबह की लालिमा आकाश में दिखाई दे रही थी सूर्य अभी उदित नहीं हुआ था सूरज अपलक आकाश में देखे जा रहा था। बलबीर को भी मानो आज नींद नहीं आई थी उसका भी शिफ्टो में काम होता था कभी लगातार काम होता था कभी हफ़्तों घर बैठना होता था। वह सूरज के निकट आकर बैठा और सूरज के काँधे पर अपना हाथ रखते हुए बोला । ’’क्या बात हैं परेशान लग रहे हो ??। गाँव में सब ठीक तो है? तुम्हे हुआ क्या है ?? आजकल तुम्हे देखकर मुझे चिंता हो रही हैं ?? मुझे बता सको तो दिल थोडा हल्का होगा’’ । बलबीर ने एक साथ कई सवाल एक साँस में सूरज के सामने रख दिए।

सूरज ने एक लम्बी गहरी साँस ली। बलबीर से सूरज के बारे में कुछ भी नहीं छुपा था दोनों एक साथ कई वर्षो से साथ में रहते आये हैं। यह मकान भी बलबीर की गाँव के खन्नाजी का ही है जो अब अपने बेटे के साथ कनाडा में रहते हैं, शुरवाती दिनों में बलबीर उनके यहाँ नौकरी करता था बाद में फिल्मो में मेकअप आर्टिस्ट बन गया। बलबीर भी एक मेहनती व्यक्ति था मुंबई के फुटपाथों पर उसने भी कई दिन गुज़ारे है वहीँ लालबाग में सूरज से दोस्ती हुई थी खन्ना जी का ट्रांसपोर्ट का बिजनेस था। सूरज के मिल से ट्रकों का कारोबार खन्ना जी के यहाँ से ही होता था। इसलिए दोनों बहुत पहले से ही परिचित थे आज इस मकान का किराया मात्र एक दिखावा है वास्तव में ये दोनों इस मकान की देखरेख भी कर रहे हैं, मामूली किराया भी दे रहे हैं, खन्ना जी जब अपना कारोबार समेट कर कनाडा अपने बेटे के पास जा रहे थे तो वह यह मकान नहीं बेचना चाहते थे। इसकी देखरेख एक बड़ी चिंता तो थी ही इस मुंबई शहर में कौन किसका मकान न हड़प ले। बलबीर और सूरज दोनों के होने के कारण ही इतना बड़ा मकान खन्ना जी ने इन्हें किराये पर दिया था ताकि इसकी सुरक्षा और रखरखाव भी हो सके। मकान बहुत बड़ा था उसका आधा हिस्सा आज भी खन्ना जी के सामान से भरा पड़ा है। उनका यह मानना हैं जाने कब उन्हें भारत लौटना पड़े।

सूरज ने लम्बी साँस लेने के बाद बलबीर की ओर देखा। एक-एक कर कॉलेज में हुई घटना बलबीर को बता दिया अब वह थोडा हल्का महसूस कर रहा था। बलबीर थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गया फ़िर सर खुजाते हुए बोला सुरज भाई आप क्यों इन झमेलों में पड़ते हो । ’’जाने दो जो होता है होने दो अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं आखिर आप कर भी क्या लोगे आखिर वो कल के बच्चे तुम्हें नहीं समझे ना। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो। सूरज ने कहा ‘’बलबीर भाई, मैं मानता हूँ मैं वहां एक वाचमेन हूँ लेकिन, मुझसे अन्याय देखा नहीं जाता । कभी कभी मेरा खून खौल उठता हैं। । मैं यह सब देखकर इन सबके के लिए खुद को भी जिम्मेदार मानने लगता हूँ। तुम्हारी बात सही हैं जो होता है होने दो । लेकिन कभी कभी एकाध लोग ऐसा कृत्य कर जाते हैं कि शर्म से वहीँ गड जाने का मन करता हैं। मैं यह सब अपने सामने होता देखता हूँ मुझसे बर्दाश्त नहीं होता । बदले में वो दे भी क्या पाते हैं उनको सिर्फ गलत तरीके से कुछ अच्छे नंबर । । ऐसे कुछ लोगों ने तो शिक्षा का स्तर बिल्कुल नीचे गिरा दिया हैं हो न हो ये भी कुछ इसी तरह के जुगाड़ से यहाँ आये हुए हैं इसलिए शिक्षा के मंदिर में इस प्रकार शिक्षा का अनादर करते हैं।

बलबीर शांत बैठा रहा फ़िर वह बोला तुम ऐसा क्यों नहीं करते यहीं अपने मकान में कम फ़ीस में कोचिंग कर लेते इससे तुम्हारी आत्मा को कुछ तो शांति मिलेगी और कहीं न कहीं जो तुम नहीं कर पाये हो उसे करने का एक सुनहरा अवसर भी मिलेगा इसी के साथ जो भी आपसे पढेंगे वो उनके चंगुल में आखिर क्यों फंसेंगे । सूरज ने एक बार फ़िर लम्बी गहरी साँस ली और कहा इसी बात का तो दुःख है मैं ठहरा एक वाचमेन आखिर कोई मुझपर भरोसा क्यों करेगा। माँ बाप भी सुनेगे तो क्या कहेंगे कॉलेज के वाचमेन के यहाँ कोचिंग । मैं मानता हूँ मैं उन सब से अच्छा पढ़ा सकता हूँ। लेकिन दो दिन पहले मेरे साथ जो हुआ वह मुझे यही बताता हैं मैं सिर्फ गेट खोलने और बंद करने लायक हूँ ऐसा कहते ही सूरज की आँखों से आंसूं झरने लगे। वास्तव में बात गहरी थी बलबीर ने कभी भी सूरज को इस तरह रोते नहीं देखा था। आज बलबीर ने ठान ही लिया था चाहे जो हो जाये सूरज को इस डिप्रेशन से बाहर निकाल कर ही रहेगा।

कुछ देर दोनों खामोश रहे।। बलबीर उछलते हुए बोला । ’’एक काम कर सकते हैं’’। ‘’अगर तुम्हे मंज़ूर हो तो’’ और चुप हो गया। । । उसे लगा शायद यह आइडिया काम नहीं कर पायेगा इस लिए जोर नहीं दे पाया। । । लेकिन सूरज कुछ करना चाहता था उसने थोड़ी देर बाद पूछा ‘’क्या बोल रहे थे चुप क्यों हो गए। बलबीर बोला बुरा तो नहीं मानोगे। भाई मैं फ़िल्मी आदमी हूँ फ़िल्मी आइडिया ही आएगा। । हमने विक्टोरिया नंबर २०३ फिल्म कई बार देखी । हमदोनों को वो फिल्म भी बहुत पसंद हैं। । । आगे बलबीर कुछ कहता सूरज के चेहरे पर हंसी आ गई अरे बलबीर मेरी समस्या का विक्टोरिया नंबर २०३ फिल्म से क्या लेना देना।

बलबीर ने सूरज को याद दिलाते हुए कहा जब हिरोइन के पिता को जेल हो जाती है तो घर चलाने के लिए हिरोइन को लड़के का भेष बदलना पड़ा था क्योंकि उस समय विक्टोरिया चलाने का लाइसेंस सिर्फ लडको को मिलता था। मैं भी तुम्हे सूरज से सरदार तारा सिंह बना दूंगा मेरे मेकअप आर्ट से और तुम खुद अपने आपको पहचान नहीं पाओगे और तुम्हे सिखा भी दूंगा कैसे मेकअप करना है ताकि मेरे न रहने पर तुम सूरज से तारा सिंह और तारासिंह से सूरज चुटकी बजाते बन सको। सूरज कुछ देर चुप रहा । लेकिन वह कुछ करना चाहता था। उसे बलबीर की बात से इतना यकीन होने लगा था कि यदि वह भेष बदलकर लोगो को पढ़ायेगा तो उस पर से वाचमेन वाला दाग तो हट ही जायेगा। वह कुछ देर चुप रहा और बोला मुझे मंज़ूर हैं लेकिन तुम्हे पहले मुझे कुछ अभ्यास कराना होगा कहीं पोल खुल गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे। बलबीर चहकते हुए बोला ऐसा मेकअप करूँगा की सूरज खुद अपने आपको नहीं पहचान पाएगा। आओ मिलाओ हाथ चलो आज मरीन ड्राइव पर सुबह चाय पीते हैं। बलबीर सूरज का हाथ खींचते हुए उसे बरामदे से बाहर सडक पर ले आया और दोनों योजना बनाते हुए मरीन ड्राइव के लिए निकल पड़े।

अभी नया सत्र शुरू होने में कुल तीन महीने बाकि थे। सूरज भीतर ही भीतर बहुत खुश था। बलबीर ने कई बार सूरज को तारासिंह बनाया और अब तो सूरज भी मेकअप अपने आप कर लेता था। उसे लगने लगा था उसकी इच्छा और बच्चो की भलाई अगर वह इस छद्म भेष से भी कर पाए तो उसे जो आत्मसंतुष्टि मिलेगी उसका कोई मोल नहीं है। सूरज ने गाँव चिट्ठी लिखी इस बार गर्मी की छुट्टी में वह गाँव नहीं आएगा। उसने ढेर सारी पाठ्यक्रम की पुस्तके खरीदी और उनसे उसने सभी विषयों के आसान और दुर्लभ नोट्स बनाने में जुट गया।   

 धीरे धीरे दिन बीते। अगले वर्ष का नया सत्र शुरू हुआ वो लड़कियां अब इस कॉलेज में नहीं आती। जब तक वे यहाँ पढ़ रही थी। नया सत्र शुरू ही हुआ था कि सूरज ने किफायती दरों में कोचिंग का प्रचार सरदार तारासिंह कोचिंग सेंटर का कार्य कॉलेज के सामने चायवाले से शुरू किया वह जानता भी था और वह अब सीधे छात्रों से सम्पर्क में नहीं आना चाहता था।

चायवाले का प्रचार काम कर गया कुल तीन छात्र और दो छात्राओं ने सरदार तारासिंह कोचिंग सेंटर में दाखिला लिया। तारासिंह के यहाँ उन्ही छात्रों ने दाखिला लिया जिनके लिए दुसरे कोचिंग में ज्यादा फीस देने की हेसियत नहीं थी। फीस किफायती होने से कुछ छात्र इसे निचले दर्जे का कोचिंग सेंटर समझ बैठे और कुछ वहां के चुम्बकीय प्रभाव से दाखिला नहीं लिए। लेकिन सूरज निराश नहीं हुए। इस वर्ष उनके पांचो विद्यार्थी ने बहुत बढ़िया अंक हासिल किया। सूरज को अपार प्रसन्नता हुई। उन्हें लगा छात्र नहीं सूरज ने सारे वो अंक अर्जित किये हों। बच्चो से सूरज का प्रचार होने लगा महज तीन वर्ष में सूरज के यहाँ छात्रों की संख्या बढ़ गई अब तो दो बैच पढ़ाने लगे। सूरज को एक आत्मसंतुष्टि का अनुभव होने लगा। जब वह उन छात्रों को कॉलेज में देखता था तो उसे गर्व होता था अब वे छात्र जायदा किसी के बहकावे में नहीं आते थे। इसी प्रकार सूरज वर्ष प्रतिवर्ष अपना कोचिंग सेंटर चलाते रहे और उन्हें आत्म संतुष्टि का अनुभव भी होने लगा।

सरदार तारासिंह कोचिंग सेंटर ने कुछ लोगो का दानापानी बंद कर रखा था यह बात जब उन्हें पता चला काफ़ी रियायती दर में कोई बच्चो को पढ़ा रहा है और बच्चे अब उनकी मुठ्ठी से फिसल रहे हैं ऐसा दो लोग जो पति पत्नी एक साथ उस कॉलेज में कार्य करते थे। पत्नी पति के लिये बच्चियों को फँसाया करती थी और दोनों अपने तरीके से मानसिक और शारीरिक शोषण करते थे। ऐसा करने में उन्हें काफ़ी आनन्द आता था स्वयं स्वछन्द विचारधारा का साबित करना उनकी मानसिकता बन गयी थी।

प्रमोशन के चक्कर में कुछ वरिष्ठों को भी सेवा दिया करते थे एक तरह का भ्रष्टाचार मचा रखा था दोनों ने। उनदोनों को काफ़ी खटक रहा था। उन्होंने आपस में तय किया कि इस तारासिंह को कुछ सबक सिखाना होगा अगर ऐसा रहा तो कल उनको यहाँ कौन पूछेगा उनका एकछत्र राज्य अब खतरे में आ गया था। सरदार तारासिंह का नाम उन्हें फूटी आँख भी नहीं सुहा रहा था।

आज दोपहर को खाना खाने के समय दोनों आपस में बात कर रहे थे हो न हो आज इस तारासिंह का किस्सा खत्म करके ही रहेंगे। आज एक छात्रा ने ज़वाब में उसके पति को चांटा जो जड़ दिया था गालपर , काफ़ी अपमानित महसूस कर रहे थे और कहीं न कहीं वे उसे इसका जिम्मेदार तारासिंह को ही समझ रहे थे। दोनों आज शाम को तारासिंह के कोचिंग शुरू होने से पहले मिलेंगे और उसे सबक सिखायेगे कि वह यहाँ से अपना बोरिया बिस्तर लेकर कहीं और चला जाय। इसके लिए मोटी रकम देकर गुंडे भी बुला रखे थे दोनों आपस में जब बात कर रहे थे तो अपर्णा ने यह बात सुनी। उसका कलेजा धक्क करके रह गया। कहीं ये लोग तारासिंह के साथ कुछ गलत व्यवहार न कर बैठे। ये लोग वैसे ही छोटी मानसिकता के हैं।

 वह बाकि साथियों को यह बात बताती तब तक कॉलेज छुट चुका था। दोनों अपनी कार से तारासिंह कोचिंग की ओर चल पड़े जहाँ किराए के गुंडे पहले से ही इंतज़ार कर रहे थे वे सिर्फ इन दोनों में से किसी एक का इशारा पाते ही हमला करने वाले थे ऐसी योजना बनी थी। यहाँ छात्र भी एक जुट होकर कोचिंग सेंटर की ओर चल पड़े कुछ पुराने छात्र छात्राएं भी साथ हो लिये।

कोचिंग सेंटर पंहुचते ही दोनों भीतर दाखिल हुये दोनों को अपने सामने देख सूरज के पैरो के नीचे की ज़मीन सरकने लगी उसे लगा आज उसका खेल खत्म लेकिन दोनों उसे पहचान नहीं पाये थे तारासिंह कड़क आवाज़ में पूछे कहो क्या काम हैं यहाँ क्यों आये हो। । दोनों एक साथ चेतवानी भरे स्वर में तारासिंह को यहाँ से चले जाने और कोचिंग सेंटर बंद करने की बात करने लगे। बात धीरे-धीरे बढ़ने लगी सूरज जानते थे बच्चे किसी भी वक्त यहाँ आ सकते हैं इसलिए इन लोगो को जल्दी निपटाने के लिए बात करते करते बाहर सड़क पर आ गए। तारासिंह अब भी उन लोगो से लड़ ही रहे थे कि एक ने अपना आपा खो दिया और गुंडे को इशारा कर दिया। पेशेवर गुंडे ने आव न देखा ताव दो तीन हाकी स्टिक तारासिंह के सर पर जड़ दिया खून का फव्वारा फुट गया। तारासिंह की पगड़ी सर से लग हो गई। खींचातानी में दाढ़ी भी उधड गई। दोनों सूरज को देखकर चौंक गये। ‘’अरे ! यह क्या ? यह तो चौकीदार सूरज निकला अब तो बुरे फँसे’’। वे जैसे ही पलटना चाहे इतने में पीछे से छात्रों की टोली आ गई। छात्रों ने तारासिंह को घेर लिया कोई उनके नब्ज़ टटोलने लगा कोई सर पर चोट से बहते रक्त को रोकने की कोशिश करने लगा।

तारासिंह की लम्बी कराह के बाद गर्दन एक ढुलक गयी शरीर ढीला हो गया, साँसे बंद हो गई यह सब अचानक एक साथ हो गया। सभी छात्र तारासिंह के प्रति अपने आपको समय पर न पंहुचने और न बचा पाने के लिये अपराधी भी महसूस कर रहे थे । वातावरण पूरी तरह शांत हो गया।

तारासिंह की आँखें खुली हुई मानो सभी से सवाल पूछ रहीं थी। साँस थम चुकी थी, तारासिंह बेनकाब हो चुका था। छात्रों में रोष के साथ-साथ सूरज को लेकर पश्चाताप के भाव दिखाई दे रहा था। सभी मूक एक दुसरे को अचम्भित होकर देख रहे थे। काश ! उनके शिक्षासदन में सूरज चपरासी की जगह उनके शिक्षक होते, सभी छात्रों में उस समय यही भाव विद्यमान था अचानक होश आते ही कुछ छात्र तेज़ी से उस दिशा में दौड़ पड़े जहाँ से वे दोनों भागे थे।


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