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अजय '' बनारसी ''

Inspirational


4.5  

अजय '' बनारसी ''

Inspirational


अमोला

अमोला

4 mins 71 4 mins 71

खेत के बीचों बीच आम का पेड़ अपनी जगह बनाये था। खेत के उस हिस्से में धूप नहीं पंहुचने के कारण उतने हिस्से में खेती नहीं हो पाती थी। कभी कभी मंगरु उस पेड़ को लेकर निराश हो जाता था क्योंकि एक बड़ा घेरा उस खेत का छूट जाया करता था। प्रायः ऐसा तब होता था जब फसल लहलहाने लगती थी और बीच का वह हिस्सा खाली दिखता था।

वह इस बात को लेकर अपने पूर्वजों में से जिस किसी ने भी उस पेड़ को पनपने देने और सरंक्षण किया होगा उनपर क्षुब्ध हो जाता था। मन ही मन उलाहने भी देता था , बुदबुदाता रहता था। यद्यपि यही वह पेड़ है जिसकी छाया में वो और उसके बैल इस वीरान जगह पर एक मात्र छाया का साधन होने के कारण आराम करते थे और मंगरु जलपान भी इसी पेड़ के नीचे बैठ कर किया करता था। खेतो में काम करते करते कभी थक जाने पर इसी के नीचे आंख मूंदकर आराम भी कर लिया करता था।

इस पेड़ की एक विशेषता यह भी थी कि इसमें आम के फल प्रतिवर्ष लगते थे गांव के लोगों को बांटने पर भी उसके पास रिश्तेदारों को देने और पके आम के लिये कभी उसे कच्चे या पके आम के लिये बाज़ार का मुँह नहीं देखना पड़ा था।जब भी बाज़ार में आमों के भाव सुना करता मन ही मन गदगद हो जाता लेकिन इस समय उसको इसके रोपित करने वाले की याद न आती।

समय बीता पेड़ भी अब बूढ़ा हो चला था। इस बार आंधी में वह जड़ समेत उखड़ गया और गिर पड़ा।मंगरु बहुत खुश हुआ क्योंकि इसे काटने के लिये कई बार प्रधान से दरख्वास्त कर चुका था क्योंकि नये कानून की तहत उसे अब वह काट नहीं सकता था सो हमेशा इसे कोसता ही रहता था।इस वर्ष मानो उसकी अर्ज़ी सुन ली गई थी तभी तो इतना बड़ा पेड़ जड़ समेत उखड़ गया।

अगले दिन प्रधान को बुला पंचनामा वगैरह करके खटीक को पेड़ औने पौने दाम में बेच दिया।

उसे बहुत जल्दी थी अपने खेत से इस पेड़ को हटाने की मानो इसके फल खाने से लेकर इसकी छाया में आराम करने के बाद भी वह इस पेड़ से जल्द से जल्द छुटकारा पा लेना चाहता था।जैसे ही खेत खाली हुआ, खटीक से मिले पैसों से टैक्टर बुला कर वह इसे समतल कराने लगा वह बहुत जल्दी में था। वह अपने खेत को औरों की खेत की तरह सीधा और सपाट देखना चाहता था।

रात हो गई टैक्टर वाले ने कहा आप घर जाईये अभी एक दो घण्टे और लगेंगे कल सुबह आकर देख लेना तस्सली हो तभी पैसे देना देर बहुत हो रही है, मंगरु को उसकी बात ठीक लगी और वह घर चला गया।


 सुबह लौटकर देखा दूर से ही खेत समतल और सपाट लग रहा था। वह प्रफुल्लित हो गया। जैसे जैसे नज़दीक आता गया उसके चेहरे पर खुशी बढ़ती जा रही थी। तभी अचानक उसे खेत में एक आम का अमोला कुसली को चीरते हुये बाहर की ओर झांकने की कोशिश कर रहा था। टैक्टर से मिट्टी पलटने से वह ऊपर की ओर आ गया था। उसे देखते ही मानो एक नयी मुसीबत उसे चिढ़ा रही थी ऐसा उसे प्रतीत हुआ। यह वही आम की कोई एक कुसली थी जिसे उसने कुछ दिनों पहले पेड़ के नीचे बैठकर खाया था और तृप्त भी हुआ था।

मंगरु के चेहरे की खुशी गुस्से में बदल गयी।उसके मन में ख्याल आया अगर यह यहीं पनप कर बड़ा हो गया तो फिर से खेत पर कालिमा सा छा जायेगा।

नहीं !! नहीं !! वह यह गलती कभी नहीं करेगा जो उसके पूर्वजों ने किया था और उसका फल वह आजतक भुगत रहा है।उसके नाती पोते आनेवाली पीढ़ी भी उसे वैसे ही कोसेगी। यह सब सोचते हुये वह उसे उखाड़ने के लिये तेज़ी से झुका लेकिन उसके कसैले टिकोरे, अचार,अमहर, अमावट, पके आम का पना और रोटी,और तो और जब भी कोई मांगलिक कार्य के लिये सुखी लकड़ी और पत्ते मांगने आता तो ज़मीदारों सी अकड़ और रुतबा उसके आँखों के सामने एक ही पल में दिख गया।

मंगरु उसके पास थोड़ा बाड़ा बना दो तीन ईंटे चुन रखते हुये गमछा कांधे पर झटक कर रखा और अपनी मुंछों को किसी बड़े ज़मींदार की भांति ताव देता हुआ अपने घर की ओर चल दिया।



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