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Sushma s Chundawat

Abstract

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Sushma s Chundawat

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सही किया ना?

सही किया ना?

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आज मन बहुत उदास था, आँखों के आगे बार-बार वयोवृद्ध संत का चेहरा घूम रहा था। कितनी बेरहमी से उनकी हत्या की गयी थी, ऐसी हरकत तो हमारे देश में किसी आतंकवादी या रेपिस्ट के साथ भी नहीं की जाती !

असहाय संत के साथ ही ऐसा अमानवीय व्यवहार क्यों हुआ?

मरने से पहले उनकी खाकी के प्रति भरोसे की मुस्कान और भीड़ के बीच उनके हाथ झटके जाने की घटना ने मुझे बहुत व्यथित किया था।

 एक तरफ़ तो महिला डॉक्टर के हत्यारों को सज़ा-ए-मौत देने वाले जाबांज जनरक्षकों का उज़ला चेहरा था वहीं दुसरी और कोरोना महामारी से बचाते बहादुर पुलिस-कर्मियों का अमूल्य योगदान !

ऐसी घटनाओं से वर्दीधारी पर भरोसा और बढ़ गया था परंतु एक जनरक्षक के विश्वासघात ने इस भरोसे पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया ।

मैं अपने विचारों में खोई थी कि तभी मेरी रूममेट कमरे में आयी, मुझे उदास देखा तो कारण पूछा।

मेरे मन की व्यथा सुनकर वह बोली-" अरे, कम ऑन यार ! बूढ़े आदमी थे वो, जाना ही था ऊपर...पाँच-सात साल और जी लेते तो भी क्या निहाल कर देते?

हाँ, होते हैं कुछ लोग जिन्हें प्राकृतिक मृत्यु नहीं मिलती पर बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती है डियर....सो रिलेक्स, ओके !"

अपने शब्दों से मेरे दिल के घाव पर मरहम लगाने की बजाय नमक छिड़ककर वह उल्टे पाँव लौट गयी।

मैं अनमनी ही रही कई दिनों तक...

एक दिन सुबह-सुबह देखा कि रूममेट मुँह लटकाये बैठी थी, कारण पूछने पर उसने बताया कि एक वयोवृद्ध फिल्म अभिनेता की लम्बी बीमारी के चलते मृत्यु हो गयी थी, इसी वज़ह से वो उदास थी।

मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया-" अरे, कम ऑन यार ! बूढ़े आदमी थे वो, जाना ही था ऊपर...पाँच-सात साल और जी लेते तो भी क्या निहाल कर देते?

हाँ, होते हैं कुछ लोग जिन्हें प्राकृतिक मृत्यु नहीं मिलती पर बड़े- बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती है डियर...सो रिलेक्स, ओके !"

रूममेट ने अंगारे बरसाती निगाहों से मुझे ऐसे देखा मानो भस्म ही कर देगी...मैंने रूम ही बदल दिया।

वैचारिक मतभेद के साथ रहने की बजाय अकेला रहना बेहतर था।


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