रिसना तुम्हारी यादों का
रिसना तुम्हारी यादों का
रीसती रहती हैं तुम्हारी यादें। चाहे मैं कितना भी मरहम पट्टी कर लूँ, चाहे बिल्कुल ना छूऊँ उसे लेकिन कहीं ना कहीं से वो रीसते हुए निकल ही आती हैं। इन यादों का उद्गम स्थल प्रेम से परिपूर्ण है। प्रेम की ऊर्जा से भरा हुआ है। जब मैं उस घाव को छूती हूँ तो मुझे पीड़ा नही होती बल्कि मुझे एक आराम मिलता है। कुरेदना नही आता मुझे वरना मैं तुम्हारे प्रेम के एक-एक कण को अपने रक्त में मिला लेती। लेकिन मैं ऐसा नही करूँगी। पता नही देर किसे हुई, मुझे या तुम्हे? लेकिन प्रेम का एक अद्वितीय उदाहरण अब यहीं-कहीं उसी घाव के इर्द-गिर्द होकर रह गया। शायद इन रीसतीं यादों में वही प्रेम है जिसे मैं प्रेम के रूप में कभी न देख सकी। तुम्हारे प्रेम की मेरे द्वारा की गई आलोचना, अवहेलना और तिरस्कार पहले मेरे हृदय में एक घाव बनी।
पीड़ा हुई, आँसू गिरे, मरहम पट्टी हुई और फिर वो घाव सूख गया।
लेकिन फिर अचानक वही सूखा घाव तुम्हारी आने वाली मीठी यादों की हवा से पकने लगा और तब इसने रीसना शुरू किया। अब ये रीसता है, हर रोज, हर क्षण और तुम्हारे सात्विक प्रेम का मरहम मुझे इससे कोई पीड़ा नही होने देता। अब यह घाव, इसका रीसना मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग है और मैं चाहती हूँ कि ये घाव अब कभी ना भरे।

