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स्वतंत्र लेखनी

Others

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एक प्याली चाय

एक प्याली चाय

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"राघव जी, चाय लीजिए।" शर्मा जी ने कहा।

"नहीं, मैं चाय नही लेता।" राघव ने उत्तर दिया।

कभी चाय राघव को बहुत प्रिय थी। चाय उसके हर सुख-दुःख की साथी थी। चाय ने राघव के हर भाव को देखा और समझा था। लेकिन अचानक कुछ यूँ हुआ कि उससे उसकी चाय की प्याली छूट गई।

"तुम्हारे जाने के साथ ही मैं अपनी सबसे प्रिय चीज़ को छोड़ दूँगा। मैं चाय की प्याली को हाथ नही लगाऊँगा।" राघव ने विदुषी से बिछड़ते वक्त यही कहा था।


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