Deepak Kaushik

Romance Tragedy Crime


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Deepak Kaushik

Romance Tragedy Crime


प्यार की सजा

प्यार की सजा

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आज सुबह का सूरज विनय के लिए काला उगा था। जबकि विनय को क्षेत्रीय पुलिस उसके बेड से उठा लायी थी। यहां तक कि उसके फ्रेश होकर चलने की बात पर पुलिस टीम के मुखिया ने थाने पर ही फ्रेश होने की बात कही थी। थाने पर लाकर उसे काफी देर तक यूं ही बिठाने के बाद उसे बताया गया कि उसके खिलाफ बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई गई है। सुनकर उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई थी। उसके अब तक के जीवन में सिवाय श्रद्धा के और कोई भी स्त्री नहीं आयी थी जिससे विनय के अंतरंग संबंध रहे हों। श्रद्धा से भी लगभग पंद्रह दिन पहले ब्रेकअप हो गया था। श्रद्धा जैसे उसके जीवन में आयी थी वैसे ही विदा भी हो गई। अभी उसे ये पता नहीं था कि आरोप लगाने वाली 'देवी जी' कौन हैं। दो घंटे तक यूं ही बैठाने के बाद उसे घर से उठा लाने वाले एस आई पांडे ने अपने अधिकारी इंस्पेक्टर सक्सेना से पूछा-

"सर! इसका क्या करना है?"

"कौन है ये? और क्या केस है इस पर?"

इंस्पेक्टर सक्सेना ने प्रश्न किया था।

"सर, वो रेप वाला केस...।"

"अच्छा-अच्छा, तो ये विनय है।"

इंस्पेक्टर सक्सेना ने पांडे की बात को बीच में ही काटते हुए कहा।

"जी सर!"

"फिलहाल तो इसे लाकअप में रखो। फिर इसके बारे में सोचते हैं।"

कहकर इंस्पेक्टर सक्सेना राउंड पर चले गए। और अब विनय लाकअप की दीवार से पीठ टिकाए अपने दुर्भाग्य को रो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जब उसने श्रद्धा के अतिरिक्त किसी और से संबंध बनाया ही नहीं तो उस पर बलात्कार का आरोप किसने लगा दिया। तो क्या श्रद्धा ने... ? नहीं, नहीं! श्रद्धा ऐसा नहीं कर सकती। श्रद्धा से भले ही उसका ब्रेकअप हो गया हो, फिर भी श्रद्धा ऐसा नहीं कर सकती। श्रद्धा उससे अब भी प्यार करती है। तो फिर इस तरह का आरोप उस पर किसने लगाया? विनय ने सारे दिन झख मारा फिर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका। इस बीच इंस्पेक्टर सक्सेना राउंड से वापस भी आये और आकर अपने घर चले गए। खा-पीकर, कुछ देर आराम करने के बाद अपने चैंबर में आकर बैठे। इस बीच विनय भूखा-प्यासा बैठा रहा। यहां तक कि उसे चाय-नाश्ता तक नसीब नहीं हुआ। एक बार उसने एक कांस्टेबल से कहा भी-

"हवलदार साब! बड़ी भूख लग रही है। कुछ खाने को मिल सकता है।"

"बड़े साहब आकर खिलायेंगे।"

उसने लट्ठमार सा जवाब दिया। उसके बाद फिर विनय की हिम्मत नहीं हुई कि दोबारा किसी से चाय भी मांग सके। बहरहाल, बड़े साहब के आने के कोई आधे घंटे के बाद एक हवलदार ने आकर लाकअप का ताला खोला।

"चलो, तुम्हें बड़े साहब ने बुलाया है।"

आते ही उसने कहा।

विनय उठ खड़ा हुआ और मरी-मरी सी चाल चलता हुआ बड़े साहब के सामने पहुंच गया। बड़े साहब ने पहले तो भरपूर नजर विनय को देखा। फिर सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा-

"बैठो!"

विनय ने ऐसे सौजन्य की आशा नहीं की थी। मगर साहब की आज्ञा न मानने का हश्र भी वो समझ सकता था इसलिए चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया।

"सुबह से कुछ खाने-पीने को मिला है या ऐसे बैठे हो?"

साहब ने बड़ी नर्मी से पूछा। विनय हां या ना में कुछ जवाब देता इससे पहले ही साहब ने खुद ही कहा-

"चेहरा बता रहा है कि सुबह से भूखे हो।... कहां है पाण्डे। बुलाओ उसे।"

साहब ने हवलदार से कहा। अपनी बात के दूसरे हिस्से को कहते-कहते साहब की आवाज़ में आक्रोश छलक आया।

हवलदार लपक कर गया और सब इंस्पेक्टर पांडे को बुला लाया।

"सुबह से इसे लाकर बंद कर रखा है और कुछ खाने को भी नहीं दिया। ले जाओ इसे और पहले कुछ खिलाओ-पिलाओ फिर मेरे सामने लाना।"

इंस्पेक्टर सक्सेना ने कुछ क्रोधित स्वर में कहा। सब इंस्पेक्टर पांडे विनय को लेकर चल पड़ा।

"और सुनो! इसके खाने-पीने का खर्च स्टाफ के रिफ्रेशमेंट खर्च में जोड़ देना।"

"जी सर!"

सब इंस्पेक्टर पांडे ने विनय को चाय-नाश्ता कराया। चाय-नाश्ता करने के बाद विनय की जान में जान आई। सब इंस्पेक्टर पांडे ने फिर से विनय को बड़े साहब के सामने पेश किया।

"हां भाई विनय! ये सब क्या मामला है?"

"साहब, मुझे तो अभी तक ये भी पता नहीं है कि मुझ पर इस तरह का आरोप किसने लगाया है।"

"अच्छा! अभी तक तुम्हें किसी ने नहीं बताया?" साहब की आवाज़ में आश्चर्य झलक रहा था।

"चलो कोई बात नहीं। मैं बताये देता हूं। ... श्रद्धा को जानते हो या नहीं?"

साहब ने थोड़े व्यंग्य से कहा। साहब अभी तक जिस सौजन्य का प्रदर्शन कर रहे थे विनय को उसका रहस्य धीरे-धीरे समझ आने लगा।

"जानता क्यों नहीं साहब। वो मेरी गर्लफ्रेंड है।"

"तो तुम्हारी उसी गर्लफ्रेंड ने ही ये आरोप लगाया है। अब चलो सब सच सच बता दो।"

"साहब, आप जो पूछना चाहें पूछे। मैं आपको सब सच ही बताऊंगा।"

"कब से जानते हो श्रद्धा को?"

"पिछले कोई डेढ़-दो सालों से।"

"डेढ़ या दो?"

"अब साहब तारीख तो याद नहीं है। मगर इससे क्या फर्क पड़ता है। दो साल ही मान लीजिए।"

"चलो ठीक। मान लिया। श्रद्धा ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पिछले छः महीने से तुम उसके साथ बलात्कार कर रहे हो।"

"गलत है साहब‌। पिछले छः महीने से हम दोनो रिलेशनशिप में रह रहे थे। सीधी सी बात है कि उसकी सहमति के बिना रिलेशनशिप संभव नहीं थी। वैसे भी कोई भी व्यक्ति छः महीने तक किसी के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है। वो भी उस अवस्था में जबकि महिला पार्टनर पूरी तरह से कहीं भी आने-जाने या किसी से भी मिलने के लिए स्वतंत्र हो।"

"तुम्हारा ब्रेकअप क्यों हुआ था।"

"इस बात का उत्तर तो मुझे भी सही से नहीं पता है। रिलेशनशिप के दो महीने बाद से ही वो मुझसे अकारण ही झगड़ा करने लगी थी। छोटी-छोटी बात पर झगड़ती थी। कभी ड्यूटी से लेट क्यों आया हूं, कभी कोई सामान लाना क्यों भूल गया, कभी मोबाइल पर देर तक बात क्यों कर रहा हूं, जैसी बातों पर झगड़ती थी। पांच महीने बीतते-बीतते वो रिलेशनशिप तोड़ने की बात करने लगी। और लगभग पंद्रह दिन पहले उसने ब्रेकअप कर लिया।"

"लगता है तुम ऐसे सच नहीं बताओगे। पांडे इसे वापस लाकअप में डाल दो। रात भर लाकअप में रहेगा तो सुबह खुद ही सच बताएगा।"

"साहब, एक रात नहीं, आप एक महीना भी बंद रखे तो भी सच्चाई नहीं बदलेगी।"

"ले जाओ इसे।"

इंस्पेक्टर सक्सेना ने कहा। सब इंस्पेक्टर पांडे ने हवलदार की तरफ देखा। हवलदार विनय को अपने साथ ले गया। विनय के जाने के बाद पांडे ने इंस्पेक्टर सक्सेना से पूछा-

"सर, क्या लगता है, सुबह ये सच बतायेगा।"

"पाण्डे! ये इस समय भी सच बोल रहा है। ये बात अलग है कि हमें अपनी तरफ से खानापूरी तो करनी ही है। ... पांडे इसे रात में खाना-वाना खिला देना।"

इंस्पेक्टर सक्सेना और सब इंस्पेक्टर पांडे अन्य कार्यों में व्यस्त हो गए।

लाकअप की पूरी रात विनय ने जागते ही काट दी। झूठे आरोप का तनाव तो था ही, साथ ही नई जगह का प्रभाव भी था। मच्छरों और दूसरे कीट-पतंगों का आतंक भी था जिसने विनय की नींद हराम कर दी थी। बहरहाल सुबह हुई। विनय को फ्रेश कराया गया। चाय-नाश्ता दिया गया फिर बड़े साहब के सामने पेश कर दिया गया। बड़े साहब ने पूछा-

"हां भाई! लाकअप में रात कैसी गुजरी?"

विनय को लगा जैसे बड़े साहब उस पर व्यंग्य कर रहे हों। मगर वो अपने मन की भड़ास निकालने की कीमत भी जानता था। इसलिए उसने सीधा-साधा जवाब दिया-

"पूरी रात जागा हूं साहब। अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के बारे में सोचता रहा। जितना सोचता उतना तनाव बढ़ता जाता। साहब! मैंने तो उससे सच्चा प्यार ही किया था। मैं क्या जानता था कि प्यार का बदला मुझे इस तरह मिलेगा।"

"चाय-नाश्ता मिला?"

"जी हां साहब! आपकी बड़ी मेहरबानी।"

"तो तुम अब भी यही कहते हो कि तुमने बलात्कार...।"

"एक मिनट साहब!..." विनय ने इंस्पेक्टर सक्सेना को बीच में रोकते हुए कहा। "आप एक पुलिस अधिकारी हैं और मैं एक गरीब आरोपी। आप अगर चाहे तो मेरी कोई औकात नहीं कि मैं अपने बयान पर टिका रहूं। फिर आप इतनी मेहनत क्यों करते हैं। जो बयान आप चाहें लिखवा लें मैं हस्ताक्षर कर दूँगा।"

"बड़े गुस्से में लगते हो।"

"गुस्सा नहीं है साहब। निराशा है। अपनी गर्लफ्रेंड के अनुचित व्यवहार के प्रति। समाज, सिस्टम और कानून के प्रति।"

"देखो विनय। मैं जानता हूं कि तुम्हें फँसाया गया है। तुम चाहो तो मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूं। तुम दोनों के बीच मध्यस्थता करा सकता हूं। शायद वो कुछ पैसे लेकर मान जाए।"

"साहब मैं एक गरीब आदमी हूं। बीस हजार रुपए महीने की नौकरी करता हूं। उसे देने के लिए पैसे कहां से लाऊंगा। ये तो सीधी सी बात है कि यदि वो ये सब पैसे के लिए कर रही है तो दस-बीस हजार में नहीं मानेगी। उसे लाखों रुपए चाहिए होंगे। कहां से लाऊंगा? इससे तो बेहतर है कि मैं जेल चला जाऊँ। वैसे भी मेरी बीस हजार की नौकरी भी बचेगी, ऐसा मुझे नहीं लगता।"

इंस्पेक्टर सक्सेना कुछ समय के लिए सोच में पड़ गये।

"वैसे कितना दे सकते हो?"

"छोड़िए ना साहब। ग़रीब आदमी क्या दे पाएगा। मुझे तो कोई खरीदना भी पसंद नहीं करेगा।"

"फिर भी?"

"बहुत कोशिश करूँ तो शायद पच्चीस हजार तक जुटा पाऊंगा।"

"चलो देखते हैं। अभी तुम यहीं रहो। ग्यारह बजे तुम्हें कोर्ट में पेश करेंगे। उस समय वो भी वहां होगी। तब बात करने की कोशिश करेंगे। शायद बात बन जाए।"

ग्यारह बजे विनय को कोर्ट में पेश किया गया। श्रद्धा पांच लाख पर जाकर अटक गई। इसके बाद कोई बात नहीं हुई। कोर्ट में भी केवल एक काम हुआ। उसे न्यायायिक हिरासत में भेज दिया गया।

विनय और श्रद्धा के मुकदमे की पहली सुनवाई के दिन न्यायाधीश महोदया ने विनय से पूछा-

"तुम्हारा वकील कौन है?

"कोई नहीं। मैं वकील का खर्च नहीं उठा सकता।"

"तुम चाहो तो सरकार की तरफ से तुम्हारे लिए नि:शुल्क वकील की व्यवस्था की जा सकती है।"

"कोई फायदा नहीं जज साहब। मुकदमे का निर्णय मुझे पता है। आप सीधे अपना फैसला सुना दीजिए। आपका और अदालत का, दोनों का समय बचेगा।"

"न्याय पर सभी का अधिकार है।"

"न्याय है कहां।"

ये बात विनय धीरे से कही। मगर इतने भी धीरे नहीं कि न्यायाधीश महोदया सुन न सकें।

"क्या तुम्हें न्यायपालिका पर विश्वास नहीं है?"

"जिस पर विश्वास किया था जब उसी ने विश्वास तोड़ दिया तो दुनिया में और किस पर विश्वास करूँ? और किस लिए ?"

"तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो!"

"नहीं जज साहब! मैं अपने लिए सजा की मांग अपने अपराधी होने के लिए नहीं बल्कि अपने निर अपराधी होने के लिए मांग रहा हूं। जो आरोप इसने मुझ पर लगाया है वो मैंने कभी किया ही नहीं। मगर मेरे पास न तो कोई साक्ष्य है और न ही कोई गवाह। साक्ष्य और गवाह तो इसके पास भी नहीं हैं। फिर भी इसकी बात को आप सच्चा मानेगी और मुझे झूठा। पूछिए इससे, अगर मैं छः महीने तक इसके साथ बलात्कार ही करता रहा था तो इसने पहली बार ही शिकायत क्यों नहीं की? छः महीने तक इंतजार क्यों किया? मैंने इसे कोई ताले में तो बंद करके नहीं रखा था। या अब ये मुझ पर दूसरा झूठा आरोप ये लगाएगी कि मैंने इसे कैद करके रखा था। आप कह रही हैं कि मुझे सरकार की तरफ से वकील दिया जा सकता है। नतीजा क्या होगा? केस चलेगा। दोनों पक्ष वाद-विवाद करेंगे। विपक्ष की वकील उल्टे-सीधे प्रश्न पूछ कर, शब्दों के जाल में उलझाकर, उल्टे-सीधे तर्को के आधार पर अपनी बात प्रमाणित करवा ही लेंगी। मैं इन सब ड्रामों से बचना चाहता हूं। जो काम कल होना ही है वो सीधे आज ही हो जाए।"

कमरे में सन्नाटा पसर गया था। विनय ने अपनी सच्चाई को जिस ढंग से प्रस्तुत किया था उसने सभी पर अपना असर छोड़ा था। श्रद्धा का सिर झुका हुआ था। विपक्ष की वकील की आंखों में क्रोध और उपहास के मिले-जुले भाव थे। और जज साहिबा सोच में डूबी हुई थीं।

"हां जज साहब! मैंने अपराध किया है। मेरा अपराध है कि मैंने इस औरत से प्यार किया, सच्चे मन से प्यार किया। मैंने अपराध किया कि इस पर विश्वास किया और इस पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। मैं अपराधी हूं क्योंकि मैं इससे शादी करके एक सीधी-सादी जिंदगी बिताना चाहता था। मुझे अपने इन अपराधों की सजा तो मिलनी ही चाहिए। तो सुनाइए सजा। अपना और अदालत का कीमती समय क्यों बर्बाद कर रही हैं। मैं भी इसे अपने पूर्व जन्मों के पापों का दण्ड मानकर स्वीकार कर लूँगा।"

मुकदमा तीन महीने तक चला। नतीजा वही जो पहले से ही तय था। सत्य अपराधी बनकर दण्ड भोगने जेल चला गया। असत्य और अन्याय विजयी होकर ठहाके लगाते रहे।



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