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Laxmi Dixit

Abstract


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Laxmi Dixit

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प्रिय डायरी सफ़ेद खाकी

प्रिय डायरी सफ़ेद खाकी

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 अभी तक देश दुनिया में जितने भी युद्ध हुए हैं- पुरातन से आधुनिक युग तक, सभी में सेनाएं लड़ती रही हैं। हर देश अपनी- अपनी सेनाओं को युद्ध के लिए प्रशिक्षण देता है। सैलरी देता हैं । शांति के समय यह सेनाएं सीमाओं की रक्षा करती हैं। सेनाओं के लिए हर देश आधुनिक उपकरण खरीदता है ।उन्हें आर्मर से लैस करता है, लेकिन इस वैश्विक महामारी कोरोना , जिसे तीसरे विश्वयुद्ध से भी अधिक खौफ़नाक माना जा रहा है, में किसी भी देश की सेना काम नहीं आ रही है।


 किसी भी युद्ध की मारक शक्ति का आकलन युद्ध से प्रभावित होने वाले लोगों के अनुपात से लगाया जाता है । यह कैसी लड़ाई है जो किसी देश या देश के समूह द्वारा दूसरे देश से नहीं लड़़ी जा रही, बल्कि पूरी दुनिया एक साथ मिलकर लड़ रही है।


 यह युद्ध किससे लड़ा जा रहा है ? एक अज्ञात शत्रु से, जो नंगी आंखों से दिखता भी नहीं। एक ऐसा शत्रु जिसने इंसान को इंसान का शत्रु बना दिया है। यह वायरस इंसान के शरीर में छुप कर सारी दुनिया को अपना गुलाम बना रहा है ।


एक वायरस इंसानी शरीर की मशीनरी को अपने वश में करके, कैसे अपनी संख्या में वृद्धि करता जा रहा है। लगता है जैसे हमारी पुराणों में वर्णित कोई रक्तबीज हो जो रक्त की एक-एक बूंद से बढ़ता जाता था। और फिर उसने अपनी संंख्या में वृद्धि कर, पूरी दुनिया को ही अपने कब्जे में कर लिया था। वैसे ही यह वायरस ड्रॉपलेट इफेक्ट द्वारा फै़लता जा रहा है । चीन के एक छोटे से शहर वुहान से निकलने के बाद आज पूरी दुनिया के 200 से ज्यादा देशों पर अपना साम्राज्य स्थापित कर चुका है ।


इसने महाशक्ति को भी घुटनों पर ला दिया है। इसने अपने विकसित देेश होने का दंभ भरने वाले देशों को धूल चटा दी है । एक छोटे से वायरस कोरोना ने विश्व की अर्थव्यवस्था को डामाडोल कर दिया है । यह वायरस जाते-जाते भी बेरोजगारी और भुखमरी ही देकर जाएगा।


 क्या किसी विश्वयुद्ध में ऐसा हुआ होगा कि लाशों पर रोने वाला भी कोई ना हो। अपने ही अपनों की लाशों को लेने से इंकार कर दें। कब्रिस्तान में लाशों को दफ़नाने की भी जगह ना बची हो । हम एक ऐसा युद्ध लड़ रहे हैं जिसके लिए हम तैयार ही नहीं थे । हमने कितनी मिसाइलें बनाई कितने रॉकेट बनाए लेकिन आज सब बेकार साबित हो रहे हैं।


अब समझ में आ रहा है, दुनिया में आग लगाने के लिए एटम बम की आवश्यकता नहीं है बल्कि एक छोटा सा वायरस ही ये काम कर सकता है। दुनिया में तबाही लाने के लिए किसी सु़नामी या जलजले की जरूरत नहीं।मानव -जाति को खत्म करने के लिए एक वायरस ही काफी है ।और फिर दुनिया को सबसे ज्यादा नुकसान तो इंसानों ने ही पहुंचाया है और सुनामी या जलजले में पशु-पक्षी भी खत्म हो जाते हैं ।


मानव जाति के लिए अब तक के सबसे विध्वंसक इस युद्ध को सेना नहीं लड़ रही बल्कि डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ लड़ रहे हैं । जी हां ,सफेद वर्दी वाले डॉक्टर और नर्स जिनके पास ना तो इस युद्ध से लड़ने के लिए पर्याप्त सुरक्षा है और न ही पर्याप्त उपकरण ।


यह कैसी लड़ाई है ? सीमा पर लड़ने जाने वाले सैनिकों को तो हम सलाम करते हैं लेकिन इन सफेद वर्दी वाले योद्धाओं का स्वागत पत्थरों और गालियों से किया जा रहा है ।युद्ध में लड़ते हुए जब कोई ज़वान शहीद होता है तो उसकी अंतिम यात्रा भी कितनी गर्व से निकाली जाती है और कोरोना वॉरियर्स की तो लाशों को दफ़नाने के लिए भूमि तक मुहैया नहीं होने दे रहे। इतना अपमान हो रहा है इनका।


 सीमा पर जवान युद्ध लड़ते हुए अपनी जान देता है तो उसे शहीद की उपाधि से संबोधित किया जाता है । लेकिन सफेद वर्दी वाले योद्धाओं को क्या हम शहीद कहेंगे , जो अपने घर-परिवार से दूर रहकर कई -कई घंटे बिना खाए- पिए इस कोरोना महामारी से फ्रंट लाइन पर खड़े होकर हमारे लिए अपने जीवन को दांव पर लगाकर लड़ रहे हैं ,लोगों का इलाज कर रहे हैं। यह चाहे तो छुट्टी लेकर घर में सुरक्षित बेैठ सकते हैं, हमारे -आपकी तरह ।लेकिन यह निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा में लगे हैं। बिना किसी जाति- धर्म का अंतर किए बिना, सब का इलाज कर रहे हैं।


 यह एक ऐसा युद्ध लड़ रहे हैं जिसमें लड़ने के लिए किसी देश की सरकारों ने इन्हें हथियार नहीं दिए हैं। इस युद्ध को लड़ने के लिए हथियार भी इन्हें स्वयं बनाने हैं ; हम सब की, समूची मानव जाति की रक्षा के लिए। सच है, आज खाकी का रंग सफेद हो गया है।


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