Nisha Singh

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4.7  

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पंछी

पंछी

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 चेप्टर -4 भाग-2

समीर ने फिर पूछा "अब बता भी दे यार क्यों परेशान है?"

इस बार उसकी आवाज़ में थोड़ी संजीदगी थी।

"तू क्या करेगा जान के, रहने दे तेरी समझ में नहीं आएगा।"

मेरे जवाब से शायद उसे कोई फर्क नहीं पड़ा।

"हो गया तेरा… अब बता क्या बात है?" इस बार मैं फूट पड़ी, आंसू निकले जो थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

"सम्भाल यार खुद को…" कहते हुए समीर उठा और मेरा सामान उठा कर मुझे लाइब्रेरी से बाहर ले गया।

"पहले… इन आंसुओं को पोंछ और रोना बंद कर" कहते हुए उसने मेरे आंसू अपनी हथेली से पोंछ दिए। वहाँ से निकल कर कर हम गार्डन में बैठ गए।

"ओये मनीष… भाई, दो फ्रुटी ला दे…" गार्डन में समीर को उसका दोस्त दिखा तो उसने बेचारे को वेटर बना दिया। मनीष ने मेरी तरफ देखा, रोनी सूरत देख के उसने मना नहीं किया। हम दोनों हरी-हरी घास पर बैठ गए। मैं भी अब तक थोड़ा शांत हो चुकी थी और फ्रूटी भी हाज़िर हो गई। मनीष फ्रूटी तो ले आया, पर मेरी तरफ ही, न जाने क्यूँ देखे जा रहा था।

"ओये… भाई।"समीर की आवाज़ से मनीष का ध्यान टूटा।

"हाँ"

"अबे क्या हाँ…"

अब उसने समीर की तरफ देखा।

"अबे लुक मत दे फ्रुटी दे… फ्रूटी ।"

मनीष ने फ्रूटी दी और वहीं पास में खड़ा हो गया।

"क्या चाहिए?" समीर ने पूछा तो मनीष ने सर हिला के मना कर दिया।

"तो निकल…" इतना सुन के कौन रुक सकता है। मनीष चला गया। मनीष के जाते ही समीर ने मेरी क्लास लेनी शुरू कर दी।

"अब बता… क्या बात है…?" समीर ने फ्रूटी का सिप लेते हुए पूछा।

"क्या बताऊं यार, आज सुबह से ही मूड ख़राब है"

"क्यों… क्या हुआ?"

"कुछ नहीं… क्या बताऊं…"

मेरी इस बात पे समीर भड़क गया। 

"तू मुझे खुन्दक मत दिला, सीधे सीधे बता वरना डूब के मर जा…"

अब मैंने बात की सीधे सीधे बता देना ही ठीक समझा।

"आज मम्मी पापा राहुल से बात कर रहे थे, उसके करियर के बारे में। उसे IIT कराना चाहते है।" इतना कहते ही मेरा गला रुंध गया और आगे कुछ बोल ही नहीं पायी।

"हम्म… तो क्या फर्क पड़ता है इस बात से… अब वो 11th में आ गया है यार उसे अपने करियर के बारे में अवेयर रहना चाहिए।"

"मेरा भी तो करियर था न समीर… मेरे भी तो सपने थे, क्यों तोड़ दिए? क्या गलती थी मेरी? क्या बस इतना ही कि मैं लड़की हूँ… मेरे सपने क्या सपने नहीं है?" कहते कहते मेरी आँखों से आँसू बह निकले।

"संभाल यार खुदको… ऐसे कमज़ोर नहीं पड़ते। अभी तो तुझे बहुत कुछ करना है।"

"अब मुझसे कुछ नहीं होगा समीर… मैं बिलकुल कमज़ोर पड़ चुकी हूँ। और मेरा किसी काम में मन भी नहीं लगता है।"

"ऐसे नहीं कहते यार… ज़िन्दगी बहुत लम्बी है। ऐसे उदास होने से थोड़े ही काम चलता है।"

"तो तू ही बता मैं क्या करूं? पढ़ने में अब मेरा मन नही लगता, कोई ख़ास हॉबी मेरी है नहीं,तो मैं अब करूं तो क्या करू?"

"देख… अब तू ऐसा मत बोल, तू हमेशा से ही पढाई में तेज़ रही है।"

"नहीं यार… अब मन नहीं लगता, तुझे याद है मेरा फिजिक्स कितना अच्छा था और आज मेरा मन नहीं लगता है इसको पढ़ने में। IIT का सपना क्या टूटा मेरी ज़िन्दगी की उम्मीदें ही टूट गयी यार। पापा ने यहाँ एडमिशन करा दिया। फिजिक्स में मेरा कितना मन लगता था पर आज तो किताब भी उठा कर देखने की इच्छा नहीं होती है…" कहते कहते मेरी आँखों से आँसू फिर बह निकले पर इस बार खुद को बिखरने से पहले संभाल लिया।

"तू अपना दिल छोटा मत कर, होता है ना… अच्छे के लिए होता है।"

"होता होगा यार… इससे मेरा तो कुछ अच्छा नहीं हुआ।"

"होगा… ज़रूर होगा बस देखती … वो ऊपर वाला अपनी मैजिक विंड घुमायेगा और तेरी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी।"

समीर की बात ने मुझे राहत दी। लगा कि शायद ऐसा हो सकता है।

"चल अब घर चलते हैं, यार ट्रिप से आया हूँ थका हुआ हूँ ।"

"ठीक है चल, आज तू ही मुझे घर छोड़ दे।"

"ओके"


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