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Meera Ramnivas

Abstract


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Meera Ramnivas

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पिता का दर्द

पिता का दर्द

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जीवन के लगभग चालीस साल जिनके पुलिस सेवा में गुजरे। रोज जो शान से सीना ताने थाने आते रहे।उन्हीं गुमान पाराशर के कदम आज पुलिस थाने की सीढ़ी चढ़ते हुए बोझिल हैं।कल तक जो हाथ पुलिस जवानों से सलाम लेते हुए नहीं थकते थे ,आज कांप रहे हैं ,चेहरे पर उदासी, है, आज वे एक अर्जदार की हैसियत से पोती की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने आये हैं।

प्रवेश द्वार पर तैनात संतरी उन्हें पहचान लेता है ,चंद माह पहले वे इसी थाने में सेवा करते हुए रिटायर हुए हैं।संतरी उन्हें प्रतीक्षा कक्ष में बिठाकर पानी पिलाते हुए है कहता है "सर इंस्पेक्टर साहब अभी आये नहीं हैं" आप बैठिए जैसे ही आते हैं मैंबताता हूँ।ठीक है । " 

प्रतीक्षा कक्ष में बैठे हुए वे अपने जीवन की खट्टी मीठी यादों में खो जाते हैं।चालीस साल पहले बतौर कांस्टेबल वे पुलिस विभाग में भरती हुए थे।नौकरी मिलते ही माँ उनके पिता से कहने लगी बेटे की शादी कर लेते हैं।

मैंने लड़की देखना शुरू कर दिया है, किंतु बेटा पुलिस कांस्टेबल है सुनते ही लोग ठंडे हो जाते हैं ।क्यों? उनका मानना है कि पुलिस कर्मी बहुत व्यस्त रहते हैं, अपने परिवार को समय नहीं दे पाते हैं ।खैर पिताजी को उनके दोस्त की लड़की पसंद आ गई। धूमधाम से मेरी शादी रत्ना से हो गई।

 रत्ना बहुत ही समझदार और संस्कारी थी ।देर सबेर घर पहुंचने पर उसने मुझे कभी उलाहना नहीं दिया।घर की तमाम जिम्मेदारियों को खूबसूरती से निभाया।न कभी खुद नाराज हुई न मुझे नाराजगी का मौका दिया। साल भर के बाद हमारे यहां बेटे ने जन्म लिया ।हमें एक बेटी भी चाहिए थी किंतु हमारी इच्छा अधूरी ही रह गई। 

कालेज की पढाई पूरी करते ही हमने बेटे की शादी कर ली । बहू के रूप में बेटी मिल गई। हमने बहू को बेटी सा प्यार दिया । बेटे के यहाँ पहली संतान के रूप में बेटी ने जन्म लिया । हम सब बहुत खुश थे।हमारी दिली तमन्ना पूरी हो गई थी । रत्ना दिन रात उसकी देख भाल करती । हमने उसका नाम कोयल रखा।पत्नी ने बेटी का सुख पोती को पाल पोष कर पा लिया।लंबे अरसे के बाद नन्ही सी परी को आंगन में खेलते देख हम दोनों बहुत खुश थे। जैसे ही पोती ने बोलना सीखा वह मेरी पत्नी को माँ और मुझे पापा कह कर पुकारने लगी ।हम ही उसके जन्मदाता हों जैसे। 

बेटा बहू निश्चिंत थे अपनी बेटी के इस सुंदर लालन पालन को देख कर । बहू ने कोयल को हमारे पास छोड़ दिया।

कोयल कब बड़ी हो गई पता ही न चला ,कालेज में पढ़ने लगी,।वह मेरी तरह पुलिस में भर्ती होना चाहती थी ।हम दोनों उसके निर्णय से खुश थे ।


अचानक पत्नी चल बसी।दादी के चले जाने से कोयल अकेली हो गई ।चुपचुप सी रहने लगी ।मैं उसकी उदासी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। एकदिन मैंने उसे समझाया था,बेटा अब तेरी देखभाल करने वाली दादी नहीं रही। तू माँ के पास चली जा ।किंतु वो मुझे अकेला छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी। मैंने महसूस किया वह अंदर ही अंदर घुटने लगी है।घर में खालीपन आ गया।दादी पोती के ठहाके बंद हो गये हैं।

मैं उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहने लगा ।कुछ नियम कुछ अनुशासन उस पर लादने लगा।रात को दस बजे सो जाना है ,रात नौ बजे मोबाइल बंद कर मेरे कमरे में रख देना,है, अपने मित्रों के मोबाइल और पता लिख कर मुझे देना ,कालेज ढंग के कपड़े पहन कर जाना ,कालेज से सीधे घर आना आदि आदि । शायद उसे मेरा ये अनुशासन पसंद नहीं आया। नाराजगी के चलते उसने मुझसे बात करना कम कर दिया। एक शाम वह अपनी दोस्त के यहां नाइट स्टे की आज्ञा लेने आई ।मैंने मना कर दिया ।वह बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में चली गई ।सुबह कालेज गई लौट कर नहीं आई।

चलिये सर पुलिस इंस्पेक्टर साहब आ गए हैं ।पाराशर को देखते ही पुलिस इंस्पेक्टर अमर ने अभिवादन किया" सर कैसे आना हुआ"

अमर मेरी पोती गुम है ,हर दिन की तरह कालेज गई थी, लौट कर नहीं आई।बेटे के यहाँ भी नहीं पहुँचीं है। दोस्तों से पूछताछ की किंतु कुछ पता नहीं चला।उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने आया हूँ। कहाँ चली गई उसके साथ कोई हादसा तो नहीं हुआ होगा कहते कहते पाराशर का गला रूंध जाता है ।  

इंस्पेक्टर अमर ने ढांढस बंधाते हुए कहा "सर आप धीरज रखें।आप कृपया उसका फोटो ,मोबाइल नंबर एवं दोस्तों के नाम व नम्बर दीजिए ।मैं तुरंत खोजबीन शुरू कर करवा देता हूँ ।"

दुखी मन से पाराशर घर लौट रहे हैं। उन्हें अपने कार्यकाल की एक धटना याद आ जाती है ।रोते हुए एक पिता का चेहरा सामने आ जाता है ।वे उस शाम थाने में बैठे हुए थे कि एक पिता दयनीय हालत में बेटी की गुमशुदगी रिपोर्ट लिखवाने आते हैं।उस दिन वे मंत्री के आगमन के कारण व्यस्त थे ।पिता की रिपोर्ट लेने के वजाय कुछ अटपटा सा बोल कर बंदोबस्त के लिए निकल गए "अपनी लड़की का ध्यान रखना चाहिए था ,भाग तो नहीं गई किसी लड़के के साथ ,थोड़ी खोजबीन करो कल आना"।

पिता हाथ जोड़कर निवेदन कर रहा था, साहब मेरी रिपोर्ट लिख लीजिए ।मेरी बेटी मजदूरी के लिए गई थी।वो किसी के साथ भागी नहीं है ।मुझे अनहोनी का शक है ।उन्होंने जाते जाते कांस्टेबल को आदेश दिया "इन्हें ले जाओ, गुमशुदगी की रिपोर्ट ले लो ।सभी थानों को मैसज कर दो।"

उसी रात मंत्री के गमन के बाद वे घर जा रहे थे, गाड़ी तेजी से आगे बढ रही थी कि उनकी नजर सड़क किनारे खड़े एक ऑटो पर पड़ी, जिसमें से अस्पष्ट सी कुछ आवाज भी सुनाई दे रही थी।


पाराशर ड्राईवर को गाड़ी रोकने को कहते हैं ,नजदीक जाकर देखते हैं बदहवास हालात में एक लड़की आटो की पिछली सीट पर हाथ पैर मार रही थी ।उसके मुंह पर रूमाल बंधा था, हाथ पैर बंधे हुए थे,उन्होंने उसे तुरंत आजाद किया, जीप में बिठाया और ड्राइवर को थाने चलने का आदेश दिया।

ये लड़की कहीं वही तो नहीं जिसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने के लिए पिता आये थे ।वे तुरंत थाने पहुँच कर रिपोर्ट निकाल कर पढ़ते हैं और रिपोर्ट में लिखे पते पर से पिता को बुला भेजते हैं ।खूबचंद अपनी बेटी को सही सलामत देख खुश हो जाते हैं।बेटी को गले से लगा लेते हैं।

लड़की अपने पिता को देख आश्वस्त हो जाती है ,अपने अपहरण के बारे में बताते हुए कहती है है"खेत में काम ज्यादा होने से शाम हो गई थी ।पगडंड़ी से सड़क की तरफ मुड़ ही रही थी कि अचानक एक ऑटो से दो लड़के उतरे रूमाल सुंघाया और मुझे ऑटो में खींच लिया। मेरे हाथ पैर बांध दिये । ऑटो रफ्तार से दौड़ता रहा था ,कहाँ लेकर चलें निश्चित नहीं कर पा रहे थे । , सामने पुलिस की गाड़ी देख दोनों भाग खड़े हुए ।आपका का शुक्रिया साहब ,मेरी बेटी सही सलामत मिल गई । 

पाराशर घटना को याद कर व्यथित हो जाते हैं आज उन्हें गुमशुदा बेटी के पिता का दर्द महसूस होता है।बेटी यदि घर न पहुँचे तो पिता की हालत क्या होती है, आज आभास हुआ । 

रात आंखों में ही कट जाती है । सुबह फोन की घंटी बजती है,बेटे की आवाज आती है " हैलो पापा कोयल हमारे यहाँ पहुँच गई है आप चिंता न करें ,नादान है,नाराज हो कर बिना बताए चली आई "। मैं कोयल को लेकर आता हूँ ।

  "बेटा तू कोयल को अपने साथ ही रख ।कोयल को माँ की जरूरत है",कह कर पाराशर आश्वस्त हो जाते हैं ।।

            


            


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