Meera Ramnivas

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ममता

ममता

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शुभा की मां कौन थी उसने कभी देखा नहीं था। जब भी मां की याद आती वह अनाथ आश्रम की वार्डन सरोज मां की साड़ी का पल्लू पकड़ खड़ी हो जाती। वो प्यार से सर पर हाथ फेर देती उसे ममता मिल जाती। कई बार उसके मन में सवाल उठता आखिर क्यों छोड़ गई मां उसे। अपने जैसी दूसरी लड़कियों को देख धीरे धीरे जीवन से समझौता करना सीख गई। अनाथ आश्रम के प्रांगण में खेलते खाते कब बड़ी हो गई ।

       स्कूली पढ़ाई केे बाद आश्रम में चलने वाली कुकिंग क्लास जोईन कर ली।

 उसे रसोई बनाने में खासी रुचि थी। वार्डन ने आश्रम के पास ही रहते वृद्ध दंपति के घर खाना पकाने का काम दिलवा दिया। वह स्वादिष्ट खाना बनाना जानती थी। अपनी पाक कला से उसने जल्द ही वृद्ध दंपति का दिल जीत लिया था।  


   महीने की पगार मिलाते ही वह सबसे पहले मंदिर गई प्रसाद चढ़ाया फिर अनाथ आश्रम के बच्चों के लिए मिठाई खरीदी। सरोज मासी के लिए डायरी तथा अपने लिए बढ़िया सी ड्रेस खरीदी। शुभा से वार्डन का विशेष लगाव था। शुभा अनुशासित और होशियार थी। हर काम बढ़िया से करती थी । नैन नक्श सुंदर थे । किंतु कद छोटा और रंग सांवला था शायद इसीलिए उसे किसी ने गोद नहीं लिया । इस कारण भी वार्डन उससे सहानुभूति रखती थी।

        मिसेज सरोज अनाथ आश्रम की संरक्षिका थीं। सरल स्वभाव ममतामयी । सभी लड़कियों को बड़ा स्नेह करती थी । छोटी बच्चियों को कहानी सुनाती थी। कोई बीमार हो जाए तुरंत सेवा देती। सबको समय पर अच्छा भोजन मिले इसका ध्यान रखती। महीने में एक बार पिकनिक पर ले जाती। वे कविताएं लिखती थी। एक बार आश्रम में कवि सम्मेलन रखा और आश्रम के लिए अच्छा खासा फंड इकट्ठा हुआ। सरोज कालेज की पढ़ाई के बाद यहां नौकरी करने चली आई। अनाथ आश्रम के बच्चों से इतनी ममता हो गई कि विवाह ही नहीं किया।

      सरोज की कालेज सहेली राधा भी उसी शहर में रहती थी। अक्सर सरोज से मिलने आया जाया करती थी। बच्चों के लिए फल और मिठाई लाया करती थी। राधा के पति का देहांत हो गया था। वो अपने दो बेटों और बहू के साथ रह रही थी। राधा जब भी मिलने आती दोनों घंटों इधर उधर की बातें करतीं। एक दिन राधा ने सरोज से दिल की बात करते हुए कहा कि वह। अनाथ लड़की शुभा को अपनी बहू बनाना चाहती है।  

    "आश्रम में शुभा नाम की लड़की है। हां लेकिन क्यों पूछ रही हो। मैंने सुना है शुभा बड़ी भली है। हां है तो। तुम्हें कैसे पता चला। वो जिस घर में खाना बनाती है वह परिवार मेरी ननिहाल से है। मेरा उनके यहां आना जाना है। उन्होंने ही शुभा के बारे में बताया था।  

   बात आगे बढ़ाते हुए राधा बोली "मैं शुभा को अपनी बहू बनाना चाहती हूं।" ये तो बड़ी खुशी की बात है 'शुभा को अच्छा घर मिल जायेगा। लेकिन उसकी इच्छा जाननी होगी । ऐसा करो तुम कल बेटे को लेकर आ जाओ। मैं शुभा को बुला लूंगी सरोज ने कहा। हां ये ठीक रहेगा। अच्छा चल कल मिलते हैं । राधा मन ही मन खुश होती हुई चली गई।

      अगली सुबह सरोज ने शुभा को कहला भेजा कि कल घर पर मेहमान आ रहे हैं मदद के लिए आ जाए। शुभा नियत समय पर सरोज के क्वार्टर पर पहुंच गई। राधा अपने बेटे संग आई। शुभा चाय नाश्ता ले आई। सरोज ने उसे भी चाय पीने बिठा

लिया। राधा से पहचान करवाई। कुछ औपचारिक बातें हुई। मेहमानों के चले जाने के बाद सरोज ने शुभा को राधा का बहू वाला प्रस्ताव सुनाते हुए कहा देखो शुभा निर्णय तुम्हें करना है। तुम्हारी मर्जी हो तो मैं आगे बात करूं।

    आप मेरी मां समान हैं । जैसा आप

 उचित समझें। आप का निर्णय मुझे मंजूर है। मुझे तो घर और वर अच्छा लगा । तुम्हारी जिंदगी संवर जायेगी । राधा दिल की अच्छी है । दो बेटे हैं। बड़े बेटे की शादी हो गई है । घर में दोनों भाइयों के अलग हिस्से हैं । दोनों की अपनी मिठाई की दुकान हैं । लड़का दुनिया को देखते हुए थोड़ा शरीफ लगा। अपनेे समाज में उसे लड़कियां मिल जायेंगी लेकिन राधा किसी अनाथ लड़की का जीवन संवारना चाहती है ।  

    शुभा पूरी रात सोचती रही । अपना घर होगा अपनों का साथ होगा। उसे और क्या चाहिए। उसने हां कर दी। सरोज मासी पर उसे भरोसा था। शुभा और देव की कोर्ट 

मैरिज सम्पन्न हो गई । शादी की पहली रात शुभा की सास राधा उस के कमरे में आई और उसके सर पर प्यार से हाथ फेर कर बोली बेटी देव भोले बच्चे जैसा है। बड़ा नहीं हो पाया है। मैं कितने दिनों की मेहमान हूं पता नहीं। मुझे भरोसा है कि तुम इसे संभाल लोगी। आज से तुम मेरी बेटी हो। यह कह कर राधा ने शुभा को गले लगा लिया । प्यार पाकर शुभा रोने लगी । देव भी आ गया । शुभा को रोते देखे बोला मां ये क्यों रो रही है इसे अपनी मां की याद आ रही है। हां बेटा !अब तुम दोनों सो जाओ। सुबह पूजा रखी है। सभी रिश्तेदारों के लिए भोजन भी रखा है।

      शुभा जल्दी नहा धोकर तैयार हो रही थी कि सासू मां चाय लेकर आ गई। मां आपने कष्ट क्यों किया मैं बना लेती। सुनो बेटे आज से हम ये तय कर लेते हैं कि जो भी पहले उठेगा चाय वही बनायेगा ।

कोई बंधन कोई नियम नहीं। ठीक है मां।

    देव बच्चे की तरह अभी तक सो रहा था । चाय पीकर सास बहू मिल कर पूजा की तैयारी करने लगीं । पूजा के बाद भोजन की व्यवस्था थी। शहर में रहने वाले सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया था। उपस्थित सभी रिश्तेदार अनाथ कन्या को बहू बना कर लाने पर राधा की प्रशंसा कर रहे थे। सभी मेहमानों के चले जाने के बाद राधा के दोनों बेटे दुकान चले गए । अब घर में राधा अपनी दोनों बहुओं के साथ बैठी थी। राधा ने बड़ी बहू रानी से कहा तुम दोनों आपस में बतिया लो। मैं तनिक आराम लेती हूं । चार बजे शाम की चाय साथ पीयेंगे।

    बड़ी बहू रानी रानी ने शुभा को मुंह चिड़ाते हुए कहा तुम से क्या पूछूं तुम्हारे ना मां है न पिता न भाई बहन। ना कोई गांव तुम तो अनाथ आश्रम से आई हो। मैं अपने बारे में बता देती हूं । मेरा पीहर कानपुर में है।  पिताजी और भाई की किराने की दुकान है। पिताजी और ससुरजी की आपसी मित्रता

थी । हमारे यहां आना आना था । एक दिन मुझे देखा और मेरा हाथ मांग लिया।  

     चार बज गए चलो चाय बना कर सासू मां को उठाते हैं रानी ने कहा।

    राधा अलार्म लगा कर सोई थी जैसे ही जागी बहुऐं चाय ले आईं । चाय पीकर राधा शुभा से बोली "चलो शुभा हम सरोज से मिलने चलते हैं। रास्ते के एक गार्डन में बैठ कर राधा ने शुभा से कहा "शुभा मुझे माफ करना बेटा मैं तुझे जो कहने जा रही हूं वह बड़ा ही कठोर सच है । देखो बेटी !देव शायद बच्चे पैदा करने में सक्षम न हो । कदाचित तुम्हें शारीरिक सुख भी न दे पाये। तू चिंता मत करना । बच्चा तेरी ही कोख से पैदा होगा । मैंने जानी मानी ड़ाक्टर से बात कर ली है। सब ठीक हो जायेगा। इसे मेरा स्वार्थ समझ या ममता। मैं भी आठ साल बाद ही विधवा हो गई थी । मैंने भी बच्चों के सहारे से जिंदगी को जिया है ।

शुभा चुपचाप सुनती रही । उसने इसे अपना भाग्य समझ स्वीकार कर लिया ।

   सरोज ये सब नहीं जानती तू उसे मत बताना मेरी विनती है।

    अगले ही दिन राधा देव और शुभा को लेकर डॉक्टर के पास गई। डॉक्टर कोमल बहुत ही काबिल डाक्टर थी। वो बहुत से दंपतियों को संतान का उपहार दे चुकी थी। डा कोमल ने शुभा और देव का इलाज शुरू करने के लिए राधा को कुछ टैस्ट करवाने का आदेश दिया और सात दिन बाद आने को कहा । एक शाम राधा का बड़ा बेटा मिलने आया । शुभा चाय नाश्ता बनाने रसोई में चली गई । किंतु कान वहीं लगे थे क्यों कि जेठजी को जब उसने अभिवादन किया तो एक अजीब ही भाव उनके चेहरे पर देख उसे कुछ अप्रत्याशित सा लगा ।

    चाय चढ़ा वह दबे पांव आकर बातें सुनने लगी। मां आप इलाज में इतना रुपया क्यों बर्बाद कर रही हैं। ये काम नियोग से भी तो हो सकता है। मैं कब काम आऊंगा । खबरदार जो फिर कभी ऐसी बात जुबान पर लाई है तो । शुभा तेरे छोटे भाई की पत्नी है । खबरदार जो उसकी शान के खिलाफ एक शब्द भी बोला तो मुझसे बुरा कोई न होगा। मैं देव और शुभा को खुशियां देना चाहती हूं। उन्हें जीते जी मारना नहीं चाहती। शुभा को मैं बेटी बना कर लाई हूं। मेरे जीते जी उसकी मान मर्यादा पर कोई आंच नहीं आ सकती।  शुभा की आंख भर आई। सासू मां के लिए दिल में मान और भी बढ़ गया।  


    राधा ने तय कर लिया था कि वह शुभा और देव के जीवन में खुशियां लाकर ही रहेगी। इलाज के साथ साथ प्रार्थना,दान, उपवास सब करने लगी । ईश्वर ने राधा की सुन ली साल भर के इलाज के बाद शुभा के गर्भ में शिशु बीज का अंकुरण करने में डा कोमल सफल हो गई । राधा बहुत खुश थी। वह ईश्वर की कृपा का बदला तो नहीं चुका सकती थी किंतु दान पुण्य तो कर सकती है। वह देव को लेकर अनाथ आश्रम, वृद्धाश्रम, गौशाला सब जगह दान पुण्य के लिए जाने लगी। एक दिन सड़क दुर्घटना में मां बेटे चल बसे ।

   शुभा पर कहर टूट पड़ा। उसका सहारा छिन गया। एक बारगी तो उसने मौत को गले लगाना चाहा किंतु दूसरे ही पल सासू मां का चेहरा सामने आ गया । उसने निश्चय किया कि वह किसी भी कीमत पर इस बच्चे को जन्म देगी। राधा के बड़े बेटे और बहू ने घर हथिया लिया। उसके घर में घुस गये । यहां तक तो ठीक था । यह जानते हुए कि वह पेट से है घर का काम उस पर छोड़ दिया । उस पर हुक्म चलाने लगे ।   

  राधा ने सरोज मां को सारे कष्ट सुनाये। उन्होंने राधा को अपनी भतीजी डा भूमिका के यहां भेज दिया। डा भूमिका एक अच्छी डाक्टर होने के साथ एक संवेदनशील महिला थी। उन्होंने शुभा को घर काम के लिए रख लिया। शुभा नर्सिंग की पढ़ाई और भूमिका का टिफिन बनाने का काम करने लगी।

   शुभा ने एक सुंदर शिशु को जन्म दिया। शिशु शक्ल सूरत से नन्हा देव था। बच्चे को देख उसे सासू मां की याद आती। काश! वो इसे गोद में खिला पाती। काश देव अपने छोटे देव को देख पाते । बच्चे का नाम देवांश रख दिया ।

       नर्सिंग का कोर्स पूरा होते ही डा भूमिका ने उसे अपने ही वार्ड में ड्यूटी पर रखवा दिया । देवांश की परवरिश अच्छी तरह से हो रही थी । शुभा अक्सर सरोज मां से मिलनेे चली जाती। देवांश स्कूल जाने लगा। पढ़ने लिखने में वह होशियार था। देवांश भूमिका आंटी सेे बहुत प्रभावित था। वह उन्हें स्टैथैस्कोप लगा होस्पीटल जाते देख मन ही मन सोचा करता था। मुझे भी बड़े होकर ड़ाक्टर बनना है। डा भूमिका के मार्गदर्शन से मेडिकल कालेज पहुंच गया। डाक्टर की पढ़ाई पूरी हो गई। देवांश की कामयाबी से शुभा बहुत खुश थी। डा भूमिका ने घर पर बुला कर शुभा और देवांश को बधाई दी। देवांश को सरकारी होस्पीटल में नौकरी मिल गई ।

    देवांश ने उसे नौकरी छोड़ आराम करने के लिए कहा। किंतु शुभा ने समझाते हुए कहा था बेटे मैं खाली घर पर नहीं बैठ पाऊंगी। हां तुम शादी कर लोगे बच्चे हो जायेंगे तब मैं नौकरी छोड़ दूंगी। ठीक है मां जैसी आपकी इच्छा ।  

   देवांश को अपनी सहकर्मी डा दिव्या से प्यार हो गया। शुभा की अनुमति से दोनों का विवाह हो गया। दिव्या के पिता विदेश में थे। दिव्या को भी विदेश लेे जाना चाहते थे। दिव्या देवांश को विदेश चलने के लिए मजबूर करने लगी। देवांश का मां को छोड़ कर विदेश जाने का कतई मन नहीं था। दिव्या और देवांश में आये दिन झगड़े होने लगे। एक दिन शुभा ने सब सुन लिया।             


      शुभा नहीं चाहती थी उसके बेटे की शादी टूट जाए। शुभा अपने बेटे की खुशी में खुश थी। उसने देवांश को विदेश जाने के लिए मना लिया। विदा करते हुए वह बहुत रोई थी" बेटा मेरी चिता को अग्नि देने जरूर आ जाना।" कैसी बातें करती हो मां मैं आप को जल्दी ही साथ ले जाऊंगा। देवांश साल में दो बार मां से मिलने अवश्य ही आ जाता था। लेकिन मां को ले जाने का मन ना बना सका क्योंकि पत्नी ने कभी नहीं कहा मां जी को ले आओ। वह ससुर के घर में रह रहा था। शुभा भी जाना नहीं चाहती थी। बेटे की जुदाई में मन अशांत रहने लगा। आखिर नर्स का काम छोड़ अपनी सारी जमा पूंजी अनाथ आश्रम को भेंट कर अनाथ आश्रम में बच्चों की सेवा करने लगी।


     



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