Meera Ramnivas

Abstract

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Meera Ramnivas

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पिता का दर्द

पिता का दर्द

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पुलिस थाने की सीढ़ी चढ़ते हुए विजय सिंह के कदम लड़खड़ा रहे थे। चेहरे पर उदासी थी। आज वे पोती की गुमशुदगी रिपोर्ट लिखवाने आये थे।

चंद माह पूर्व वे इसी थाने में सेवारत थे।संतरी प्रतीक्षा कक्ष में बैठने को कहता है "सर इंस्पेक्टर साहब अभी आये नहीं हैं" आप बैठिए जैसे ही आते हैं। मैं बताता हूं, ठीक है।   

चलिये सर पुलिस इंस्पेक्टर साहब आ गए हैं। सर नमस्कार कैसे आना हुआ।

 मेरी पोती कालेज गई थी लौट कर नहीं आई।बेटे के यहां भी नहीं पहुंची। दोस्तों से पूछताछ की किंतु कुछ पता नहीं चला। कृपया उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखें। कहां चली गई कोई हादसा तो नहीं हुआ होगा। विजय का गला रूंध गया।   

इंस्पेक्टर अमर ने ढांढस बंधाते हुए कहा सर धीरज रखें। कृपया उसका फोटो,

मोबाइल नंबर ,दोस्तों के नाम व नम्बर दीजिए। मैं तुरंत खोजबीन शुरू कर करवा देता हूं। रिपोर्ट लिखवा कर विजय घर लौट रहे थे अचानक उन्हें ऐसी ही एक धटना याद आ गई। एक पिता का रोता हुआ उदास चेहरा सामने आ गया। उस शाम वे थाने में बैठे हुए थे कि एक पिता बेटी की गुमशुदगी रिपोर्ट लिखवाने आए थे।उस दिन वे मंत्री के आगमन के कारण व्यस्त थे। रिपोर्ट लेने के वजाय कुछ अटपटा सा बोल गए "अपनी लड़की का ध्यान रखना चाहिए था। किसी लड़के के साथ तो नहीं भाग गई होगी। थोड़ा ढूंढो,कल आना।"

 नहीं साहब!मेरी बेटी मजदूरी के लिए गई थी।वो किसी के साथ भागी नहीं है। साहब जरुर कोई हादसा हुआ है वह जोर जोर से रोने लगा। विजय ने कांस्टेबल को "गुमशुदगी की रिपोर्ट लेने का आदेश दिया और बंदोबस्त के लिए निकल गये।

 बंदोबस्त के बाद रात वे घर लौट रहे थे। गाड़ी तेजी से आगे बढ रही थी कि उनकी नजर सड़क किनारे खड़े एक ऑटो पर पड़ी। जिसमें से एक दुप्पटा बाहर की ओर लटक रहा था। ड्राईवर से गाड़ी रोकने को कहा। आटो के नजदीक जाकर देखा तो पाया कि बदहवास हालात में एक लड़की आटो की पिछली सीट पर हाथ पैर मार रही थी। उसके मुंह पर रूमाल बंधा था। हाथ पैर बंधे हुए थे। लड़की को बंधन मुक्त कर जीप में बिठा थाने लौट आए।

  ये लड़की कहीं वही तो नहीं जिसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने के लिए पिता आये थे। थाने पहुंच कर रिपोर्ट पढ़ते ही पिता को बुला भेजते हैं। लड़की के पिता खूबचंद अपनी बेटी को सही सलामत देख खुश हो जाते हैं।बेटी को गले से लगा लेते हैं।

 लड़की अपने पिता को देख आश्वस्त हो जाती है। अपने अपहरण के बारे में बताती है शाम को पगडंड़ी से सड़क की तरफ मुड़ ही रही थी कि अचानक एक ऑटो से दो लड़के उतरे रूमाल सुंघाया और ऑटो में खींच लिया। हाथ पैर बांध दिये। ऑटो रफ्तार से दौड़ता रहा। कहा चलें निश्चित नहीं कर पा रहे थे। पुलिस की गाड़ी देख वे भाग खड़े हुए।  

 विजय सिंह की हालत आज उसी पिता जैसी थी। आज उन्हें गुमशुदा बेटी के पिता का दर्द मालूम हो गया था। 


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