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Ruchi Singh

Abstract Children

4.7  

Ruchi Singh

Abstract Children

पहली विदेश यात्रा

पहली विदेश यात्रा

5 mins
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"सोनू ... मेरे सन गागल्स कहां रखे हैं ?" मोनू ने अपनी छोटी बहन से अधीरता से पूछा।

"वही तो रखे हैं जहां तुम्हारा छोटा ट्रेवल बैग रखा है और.... मेरी हैट तुमने कहा रख दी ?" सोनू को भी अपनी सामानों की लिस्ट देखते हुए याद आता है।

दोनों भाई बहन बहुत तन्मयता व उत्साह से अपने परिवार संग इस अनूठी व पहली विदेश यात्रा की तैयारियों में दिन रात लगे हुए थे। उनका उत्साह पहली हवाई यात्रा की कल्पना से भी अपने चरम पर था।

इस बार उनके मम्मी और पापा आशीष व किरन ने कई महीने पहले ही गर्मी की छुट्टियों में न्यूजीलैंड की यात्रा का प्रोग्राम बना लिया था। आशीष व किरन ने ऑफिस से छुट्टी लेकर टिकट बुकिंग, होटल बुकिंग, वीजा आदि सारे काम काफी पहले कर लिए थे। जैसे-जैसे जाने का दिन करीब आ रहा था, बच्चे व मम्मी पापा का दिन भर का समय लगेज पैकिंग, नए कपड़े की शॉपिंग व न्यूजीलैंड के टूरिस्ट स्पॉट्स इत्यादि की जानकारी इंटरनेट पर खंगालते बीत रहा था।

आखिर वह सबसे खूबसूरत दिन आ ही गया। जिस दिन रात में फ्लाइट पकड़ने एयरपोर्ट जाना था। इतने दिनों की तैयारी का आज बहुत सुंदर परिणाम यात्रा की आकर्षक शुरुआत के रूप में आ गया था। एयरपोर्ट की भव्यता साज सजावट और चकाचौंध को देखकर बच्चों की खुशी का पारावार ना था। सारी औपचारिकताओं के बाद कुछ घंटे में हवाई जहाज पर सवार होने का समय आ गया। दोनों बच्चे खिड़की वाली सीट पर बैठने के लिए मचल गए।

फ्लाइट के टेक ऑफ के रोमांच ने उनको एक बार झँझकोर कर रख दिया। कुछ देर में फ्लाइट की खिड़की से पूरब दिशा में सूरज के आने का आभास आकाश की लालिमा ने दे दिया। सोनू मोनू की आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्हें खिड़की के बाहर हल्की उजाले में हवाई जहाज के नीचे दूर-दूर तक रुई के फाहों जैसे सिर्फ बादल ही बादल दिखाई दिए। दोनो आज इतनी सारी नई चीजों को अपने छोटे जीवन में पहली बार देख रहे थे। वो रह-रह के मम्मी पापा को अपने नए अनुभव उल्लास से बताते नहीं थकते। बच्चों को इतना हर्षित देखा आशीष किरन की खुशी भी दोगुनी हुई जा रही थी। कई घंटों की उड़ान के बाद वेलिंगटन के अपने गंतव्य पर फ्लाइट की लैंडिंग हो गई।

नए देश की चकाचौंध व नये लोगों देखकर बच्चों को मानो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। एयरपोर्ट से होटल जाते समय वेलिंगटन के शहर की इमारतों की गगनचुंबी ऊंचाई व भव्यता शहर की सलीके सी सजी चमचमाती चौड़ी, सड़कें, बड़े-बड़े पार्क, हरियाली, अनूठे फूल, साफ-सफाई, सुहाना मौसम, नई-नई फर्राटे भरती टैक्सियां....यह सब देख सबको लगा मानो स्वर्ग लोक में ही पधारे हैं।

अपने होटल की ऊंची बिल्डिंग को देखकर बच्चे तो खुशी से उछल पड़े किरन ने फटाफट सब लोगों की बहुत से फोटो खींच ली। बच्चे व किरन वहां के हर एक पल को अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे। अपने होटल के टॉप फ्लोर के कमरे के एक-एक फीचर्स को दौड़-दौड़ कर निहारते और खिड़की से नीचे वाले फ्लोर पर आसमान में टांगे स्विमिंग पूल को देखकर मोनू और सोनू अपनी सुध बुध खो बैठे थे। हर एक जगह के ढेरों फोटो कई घंटों तक खींचते रह गए।

उस दिन यात्रा की थकान उतारने के बाद अगले दिन सी बीच, एनिमल शोज़, एम्यूज़मेंट पार्क, बोट राइड, पैरासेलिंग व बहुत से वाटर स्पोर्ट्स के लिए दिनभर का प्रोग्राम पूर्व निर्धारित था।

2 दिन इन सब में कहां बीत गए, पता ही नहीं चला। बच्चों को हर दिन कुछ नये आश्चर्यजनक अनुभव होते जो उनके लिए यादगार थे। एक दिन सब लोग वहां की फेमस मार्केट में विंडो शॉपिंग का लुफ्त उठा रहे थे। बच्चों के हाथ में आइसक्रीम थी। वो हर शॉप पर अपनी पसंदीदा नई चीजों का प्राइस चेक करते व मम्मी पापा को भारतीय करेंसी में कीमत बताते जा रहे थे। कुछ सामान जो उनको सस्ते व लेटेस्ट लगते वो फौरन खरीद लेते।

इन सब के बीच एक शॉप पर आशीष को ऐसा लगा कि उसका पर्स कहीं मिल नहीं रहा। काफी देर तक सारे पाकेट व बैग सर्च करने के बाद यह कंफर्म हुआ कि पर्स कहीं छूट गया और सारे पैसे उसी में हैं। आप तो आशीष व किरन के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंचति चली जा रही थी। बच्चों को जब पता लगा तो उनकी सारी मस्ती पल में ही काफूर हो गई।

नये देश में इतनी बड़ी बाजार में इतनी दुकानों में घूमते घूमते पर्स कहां छूट गया, कैसे पता चलेगा। हताश बच्चे व माता-पिता अपने गुजरे रास्ते को याद कर वापस इस आस मे चलने लगे कि शायद कहीं वो पर्स किसी दुकान के काउंटर या रास्ते में गिरा पड़ा मिल जाए। मगर इस आशंका से दुखी भी होते कि कहीं किसी के हाथ लगा तो पता नहीं वह ले जा चुका होगा। इसी उधेड़बुन और शंकाओं में सारी मस्ती चेहरे से कितनी दूर चली गई, इसका एहसास भी ना हुआ।

वापस चलते-चलते सोनू को दूर से एक जगह एक छोटा सा डंडा रास्ते के बगल की मिट्टी में खड़ा हुआ दिखाई दिया। पास जाकर देखा तो उसके ऊपर एक पर्स भी टँगा हुआ दिखाई दिया। सोनू ने पापा को ये दिखाया तो आशीष की खुशी का ठिकाना न रहा। यह तो उसी का पर्स है जो शायद पाकेट से निकल कर गिर गया होगा और किसी की नजर पड़ने पर उसने यहां टांग दिया है। सबने उस अनजान सज्जन को ढेरों धन्यवाद दिये व भगवान का शुक्रिया अदा किया।

अब उन्हे एहसास हुआ कि इस देश के नागरिक कितने ईमानदार वह महान है। देश की उन्नति के पथ पर अग्रसर होने के लिए वहां के नागरिकों का सबसे बड़ा योगदान होता है।

अपने टूर के सकुशल समापन के बाद सब लोग वापस अपने देश व अपने शहर पहुंच गए। मन में एक मीठी यादें काफी दिनों तक महसूस होती रही। कुछ-कुछ दिनों में फोटो देखकर वहां के अनुभव अपनी स्मृतियों में वापस ले आते। उस देश के नागरिकों की मिसाल अपने दोस्तों व परिवार वालों को देते नहीं थकते। अब इस परिवार ने पिछली घटना से सीख लेते हुए ईमानदारी को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाने का प्रण कर लिया था।


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