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"नियम सबके लिए"

"नियम सबके लिए"

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दीपा और महेश दोनों नौकरी करते थे। दिल्ली मे एक छोटे से फ्लैट मे रहते थे। साथ मे दादी भी रहती थी। उनके दो संतान थीं मीनू और सोनू । मीनू सातवी कक्षा मे पढ़ती थी और सोनू अभी चौथी कक्षा मे ही था। दादी दोनो बच्चों का पूरा ध्यान रखती थीं। जब तक दीपा बहू दफ्तर से नही आ जाती थी, तब तक दादी बच्चों की एक केयर टेकर की तरह देखभाल करती थी। दादी ने कुछ नियम बनाए हुए थे । जो दोनो बच्चों को मानने होते थे। मीनू और सोनू दोनों दादी द्वारा बनाए नियमों को बहुत पसंद करते थे।

 समय व्यर्थ नहीं करना, खाना प्लेट में नहीं छोड़ना, स्कूल से आकर अपनी यूनीफार्म सही ढंग से रखना, जो कोई आदरणीय व्यक्ति कुछ करने के लिए कहे उसे पूरी लगन और विश्वास से पूरा करना, किसी को भद्दे शब्द नहीं बोलना, लड़ाई या बहस नहीं करना, टिफिन शेयर करके खाना आदि बहुत सारी बातें थी, जो दादी ने खेल खेल मे मीनू और सोनू को सिखा दी थी। महेश और दीपा बहुत खुश थे कि उनकी माँ ने बच्चों को इतने अच्छे संस्कार दिए हैं। सोनू छोटा था उसके बहुत से काम दीपा आकर कर देती थी, पर मीनू स्वयं ही अपने सभी कार्य करती थी। एक दिन मीनू के स्कूल में "बाल मेला " लगा । मीनू की टीचर ने झूले का कार्य भार संभाला। बाल मेले मे बच्चे, उनके माता पिता, सभी आ सकते थे। मीनू के मम्मी पापा को छुट्टी नहीं मिल पाई थी इसलिए वे अपने दफ्तर के ऑफ होने पर ही शाम तक आ सकते थे।

मीनू की टीचर ने मीनू को झूले वाले गेट पर खड़ा करके कहा-" मीनू, देखो जिसके पास कूपन होगा वही विधार्थी झूला झूलने आ सकता है। बिना कूपन किसी को भी मत आने देना।" टीचर ने फिर कहा-" अगर हमारे पास सबसे अधिक कूपन होगें तो हमारा "झूला स्टोल" जीत जायेगा और हम सबको उपहार मिलेगा। मीनू को नियमों की जानकारी भली भाँति थी। वह गेट के पास खड़ी होकर विधार्थियों से कूपन लेती है फिर उन्हें झूले पर बैठने की आज्ञा देती थी।

थोड़ी देर पश्चाताप वहाँ प्रधानाचार्य जी के दो बच्चे आए और उन्होने मीनू से कहा कि वे झूला झूलना चाहते हैं।मीनू ने कूपन माँगा जो उनके पास नहीं था। मीनू ने उन्हें साफ मना कर दिया कि वे बिना कूपन झूला नहीं झूल सकते। उन्होने बताया कि वे प्रधानाचार्य जी के बच्चे हैं।मीनू ने कहा -" नियम सभी के लिए एक समान होते हैं। मुझे केवल नियम फॉलो करने के लिए कहा गया है जिन्हे मानना मेरा कर्तव्य है।" इतने मे क्लास टीचर आ गई। उसने देखा कि प्रधानाचार्य जी के बच्चों को भी मीनू ने झूला नहीं झूलने दिया । टीचर कुछ कहती इससे पहले ही प्रधानाचार्य जी के बच्चे अपने पापा से मीनू की शिकायत लगा देते हैं। प्रधानाचार्य जी मीनू और उसकी टीचर को बुलाते हैं। टीचर काफी डरी हुई होती है पर मीनू पूरे आत्मविश्वास के साथ ऑफिस मे डटी खड़ी थी। प्रधानाचार्य जी ने मीनू से उसका परिचय पूछा और कहा कि मेले मे उसके माता पिता कब तक आयेगें? मीनू ने कहा शाम तक आयेगें। प्रधानाचार्य जी ने कहा जब आयेगें तो मुझसे अवश्य मिलवाना। फिर वह मीनू और टीचर को जाने को बोल देते हैं। प्रधानाचार्य के बच्चे कूपन लेकर झूला झूलते हैं। टीचर मीनू को कहती है-" कभी कभी हमे नियम बदलने भी पड़ सकते हैं।" मीनू कहती है -" मैम यदि बहुत ही आवश्यकता हो तब हम नियम बदल सकते हैं पर ......"यहाँ मुझे नहीं लगा कि प्रधानाचार्य जी के बच्चों के लिए मैं नियमों से बाहर जाऊँ।" थोड़ी देर बाद मीनू बोली -" नियम सबके लिए समान होने चाहिए।"

टीचर मीनू को कुछ कह पाती, उसके माता पिता आ गए वे प्रधानाचार्य जी के ऑफिस ये गए। उन्हें बैठाया गया। मीनू और मीनू की टीचर भी वहीं ऑफिस मे आ गए। प्रधानाचार्य ने मीनू की मम्मी से पूछा-" आपकी बेटी बहुत होनहार और आत्मविश्वास से परीपूर्ण है। मुझे आज इसकी एक बात बहुत पसंद आई......." उन्होने सब बता दिया। दीपा और महेश बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि मीनू एक संस्कारी लड़की है क्योंकि उसकी दादी उसे प्रतिदिन नियम, आत्म सम्मान, आत्मविश्वास से भरी शिक्षा देती हैं। अगर आज मीनू की तारीफ हो रही है तो इसका क्रेडिट इसकी दादी माँ को देना चाहिए। प्रधानाचार्य जी ने बाल मेले मे घोषणा की कि मीनू को उसकी काबिलियत और सबको समान समझने के लिए एक विशेष पुरस्कार दिया जाता है। उसने नियमों का बहुत अच्छी प्रकार से पालन किया। टीचर बहुत खुश थी कि आज मीनू जैसी संस्कारी व आदर्शों वाली शिष्या के कारण उन्हे प्रधानाचार्य ने काफी सराहा था। घर पहुचँ कर उसने अपनी दादी को सब बातें बता दी।आज घर मे सब बहुत खुश थे। एक घंटे बाद महेश सबको बाहर डिनर के लिए ले गया। सबने साथ मे भोजन किया और खूब मस्ती की।


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