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लघु कथा-"बदला"

लघु कथा-"बदला"

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अपने घर में सुधा की आदतें सब बहनों मे बहुत अलग थी। वह दिल खोलकर खर्च करती थी। उसके पास अगर पैसे होते थे तो वह अच्छे से अच्छा सामान खरीदने मे विश्वास रखती थी। उसके ससुराल में उसकी एक देवरानी और एक जेठानी थीं । उन दोनों ही की आदत कंजूसी वाली थी। वे किसी को कुछ भी देना हो तो सस्ते से सस्ता देती थीं । सुधा जैसा स्वयं के लिए खरीदती थी ऐसा ही दूसरों को देना पसंद करती थी। सुधा की सास को सुधा की यह आदत अच्छी लगती थी। सास ने कभी भी सुधा को मना नहीं किया कि वह ऐसा क्यों करती है। सुधा के जेठ , देवर और पति का सांझा स्टील के बर्तनों का कारोबार था। काफी धनी परिवार मे इनकी गिनती होती थी। सुधा के पति अधिक कुछ कहते नहीं थे इसलिए सुधा लेन देन मे कोई कमी नहीं छोड़ती थी। सुधा की जेठानी और देवरानी सुधा से बहुत जलती थी। पर सुधा पर कोई फर्क नहीं पड़ता था।

सुधा के दो बेटे थे। जेठानी के एक बेटी और एक बेटा था। देवरानी के दो बेटियाँ थी।देवरानी अक्सर सुधा को कहती -" तुम्हें क्या पता ,बेटियों के लिए बचपन ही से दहेज इकट्टठा करते रहना पड़ता है।" जेठानी बोलती-" यह क्या जाने, भगवान ने तो इसे बेटी दी ही नहीं। वरना इसे पता चल जाता।" सुधा केवल मुसकुरा कर रह जाती थी। एक बार इनके घर की कामवाली राम प्यारी की बेटी की शादी थी। राम प्यारी ने सास से छुट्टी की बात कही और साथ मे कार्ड भी दिया। जेठानी और देवरानी ने मना कर दिया कि छुट्टी नहीं मिलेगी। पर सुधा ने कहा कि वह चाहे जितने दिन की छुट्टी लेना चाहे ले सकती है। हम सब मिलकर घर के काम कर लेगें। खैर तीनों बहूओं ने मिलकर काम संभाल लिया। अब राम प्यारी ने कार्ड दिया था , बेशक ना जाएं पर शगुन तो देना ही था। तीनों बहूएँ खरीदारी करने दुकान पर पहुँच गई। जेठानी और देवरानी दुकानदार से बोली -" भैया सस्ती सी दो तीन साड़ियाँ दिखा दो। हमारी नौकरानी की बेटी की शादी है।" 

सुधा ने कहा -" भैया मुझे अच्छी से अच्छी साड़ी, दो सूट और पैंट शर्ट का कपड़ा सब दिखाओ।" दोनों बहूएँ अंदर ही अंदर जल रही थी। सुधा ने दुकान का अच्छा सामान पैक कराया और घर वापिस आ गई।

राम प्यारी के घर शादी वाले दिन तीनों बहूएँ केवल सामान देकर आ गई। क्योंकि सुधा नहीं चाहती थीं कि गरीब नौकरानी पर किसी भी प्रकार का बोझ पड़े। ठीक पन्द्रह दिन बाद राम प्यारी वापिस काम पर आई। उसके हाथ मे मिठाई के डिब्बे और लिफाफे थे। दोनों बहुएँ देखते ही खुश हो गई और लालची निगाहों से राम प्यारी को देखने लगीं। सुधा ने पूछा कि कैसी रही शादी? राम प्यारी बहुत खुश थी। कहने लगी -"सुधा मेम साब ,आपने जो साड़ी बेटी को और दामाद जी को जो कपड़े दिए थे वो मैने अगले दिन फेरे पर दे दिए थे।....मिठाई का डिब्बा देती हुई बोली-" फिर आपके दिए कपड़े बेटी की ससुराल मे बहुत पसंद किए गए। लड़की की ससुराल से कुछ सामान और कपड़े हमारे यहाँ आते हैं । इनमें आप लोगों के लिए भी हैं और आप तीनों को ये लेने ही पड़ेगें।" सुधा इंकार करने ही वाली थी कि सास ने इशारे से कहा कि ले लो गरीब का दिल नहीं तोड़ना चाहिए। राम प्यारी न जिस बहू का सामान था उसके हाथ मे दे दिया। दोनो बहुओं ने देखा कि उनकी साड़ी एक दम साधारण थी, पर सुधा की साड़ी बहुत महंगी थी साथ ही चूड़ियाँ भी मैचिंग थी। यह सब देखकर सास बहुत खुश हुई। राम प्यारी के चले जाने के बाद सास ने कहा "हम जैसा किसी को लेन देन करते हैं वह सब लौटकर अवश्य आता है। आज सुधा ने साबित कर दिया था कि जैसा करोगे वैसा ही बदले में मिलेगा।"

दोनो बहुएँ पछता रहीं थी कि काश वे भी अच्छा सामान दे देती तो आज उन्हें भी बदले मे अच्छा ही सामान मिल जाता।



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