Shahana Parveen

Inspirational


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Shahana Parveen

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क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?

क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?

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अंग्रेजों के अत्याचारों से,

जब जनता परेशान थी।

अंग्रेजों के दुर्व्यवहार से,

अपमानित होती सरेआम थी।

देश की ऐसी हालत देख,

कुछ महान पुरूष सामने आए।

जान की परवाह ना करते हुए,

ब्रिटिश सरकार से टकराएं।

अंग्रेजो ने किए उन पर अत्याचार,

कहीं किया लाठी चार्ज तो कहीं गोली दागी।

वीर पुरूषों ने निर्भीक होकर किया सामना,

डटकर खड़े रहे गोली खाई,

पर नहीं छोड़ा साहस।

लड़ते रहे मृत्यु से नहीं घबराएं,

वीर गति को प्राप्त हुए,

देश को स्वतंत्रता दिलाई।

जी हाँ मित्रों हमारे देश भारत को स्वतंत्रता बहुत कठिनाईयों से मिली है। वीरो ने अपनी जान की परवाह किए बिना देश को ब्रिटिश शासको से मुक्त कराया। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस

डॉ माघफुर अहमद अजजी, टीपू सुल्तान

मौलाना मोहम्मद अली जौहर आदि ऐसे नाम हैं जिन्होने स्वतंत्रता संग्राम मे जान की बाज़ी तक लगा दी।

15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से हमारे देश भारत को आज़ादी मिली। भारत संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के रुप में गिना जाता है।

आज हमारे देश को स्वतत्रं हुए पूरे 72 वर्ष हो चुके हैं। क्या भारत के नागरिक अपने आपको आज़ाद महसूस करते हैं। खुलकर जी पा रहे हैं। खुशी- खुशी समाज मे रह रहे हैं। अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने का अधिकार उन्हें है?

एक ऐसा प्रश्न जिसके उत्तर की हम सबको तलाश है।

लोगो की राय मे स्वतंत्रता क्या है ?

इस विषय में जिससे भी पूछेगें सबका अलग अलग मत होगा।

एक गरीब आदमी चाहता है कि गरीबी से उसे आज़ादी मिले।

कचरा उठाने वाला सोचता है कि काश वह कचरा ना उठाए, कचरे से उसे आज़ादी मिले। घर की चार दीवारी में बंद नारी सोचती है उसे बाहर जाने का अधिकार मिल जाए।

अरविंद केजरीवाल जिन्होने सूचना व अधिकार की लम्बी लड़ाई लड़ी वह चाहते हैं कि भारत से अफसरशाही समाप्त होनी चाहिए।

जनता के विचारों का स्वागत किया जाना चाहिए। जनता से भी पूछना चाहिये कि इस उसके मन मे क्या है?

नीलम कटारा जिनके बेटे नीतीश कटारा की हत्या कर दी गई थी। उन्हें अपने बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उनके मतानुसार धनी व्यक्ति पैसे के बल पर कानून को खींचते रहते हैं। केस आगे बढ़ता रहता है। समय व धन दोनो की हानि होती है। जब तक देश मे भय का माहौल रहेगा। तब तक हम स्वतत्रं नहीं कहलायेगें। जो गरीब हैं वे कहाँ से इतना धन दौलत लायेगें कि वकीलो को केस के लिए दे सके और केस लड़ सकें।

भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी मानती है कि आज़ादी वो है जिस मे हम सब अपना जीवन साथी खुद चुन सकें। बिना डर के कहीं भी घूम सकें।

ऑनर किलिंग पर रोक लगनी चाहिए। क्योकि इससे व्यक्ति मे डर उत्पन्न होगा और वह डर से कुछ नहीं कर पायेगा।

राज काचरू जो अमन काचरू के पिता हैं वह चाहते हैं कि उनके बेटे की रैंगिंग के दौरान मृत्यु हुई थी तो छात्रों को रैगिंग से मुक्ति मिलनी चाहिए।

ऐसे ही हज़ारो लाखो की संख्या मे लोग मिलेगें जो स्वतंत्रता के अर्थ को अलग अलग बतायेगें।

क्या हम वास्तव में स्वतत्रं है ?

कहने को भारत स्वतत्रं हैं परन्तु फिर भी स्वतत्रं नहीं है। गांवो मे जाकर देखेगें तो वही प्राचीन संकीर्णताएं, मान्यताएं देखने को मिलेगीं। अंधविश्वासों से भरी परम्पराएँ, वही जादू टोना टोटका आदि सब जो पहले कभी हुआ करता था।

पहले महिलाएँ घरो की चार दीवारी में रहती थीं वहाँ कुछ भी अप्रिय घटना उनके साथ घटित होती तो किसी बाहर वाले को पता नहीं चल पाता था। सारा मामला अंदर ही दबा दिया जाता था परन्तु आज महिलाओं के साथ खुले आम अप्रिय घटनाएँ होती हैं।

बलात्कार, तेज़ाब फेंकना तो जैसे आम ही हो गया है।

आज भी एक अकेली महिला को "बेचारी" कहकर सम्बोधित किया जाता है। यदि वह विधवा हो जाती है तो उसे मजबूर अबला का नाम दे दिया जाता है। बिना पुरूष के महिला को कोई सम्मान नहीं दिया जाता। किसी से हसकर बात कर लेती है तो चरित्रहीन की श्रेणी में डाल दिया जाता है। नारी तो आज भी परतंत्र ही है। नारी को कब स्वतंत्रता मिलेगी?

इसके अतिरिक्त कन्या भ्रुण हत्या ऐसा अपराध जिसमे भगवान कहे व माने जाने वाले डाक्टर भी शामिल हैं। कन्याओ को जन्म देने वाली माँ को ही कठोर तपस्या से गुज़रना पड़ता है। उस माँ को जो लगातार पुत्री को जन्म देती है उसके सिर पर ही सारा दोष मड़ दिया जाता है कि वह पापिन है इसलिए कन्याएँ जन्म ले रही हैं।

कन्याओ को जंगल में ,नालो में फेंक दिया जाता है। बलात्कार परिवार के बाहर ही नहीं परिवार मे अपने भी करते हैं। नारी को सब अपनी निजी सम्पत्ति समझते हैं और अत्याचार करते हैं। नारी शोषण की घटनाएँ तो आज आम बात हो चुकी हैं। अकेली नारी रहती है तब भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। किसी के साथ घूम लेती है या बात भी कर लेती है तो भी उस पर संदेह किया जाता है। शादी विवाह मे बेटी से नहीं पूछा जाता कि तुम्हे कैसा वर चाहिए। यहाँ मै केवल उन परिवारो की बात कर रही हूँ जहाँ ऐसा अक्सर देखने व सुनने को मिलता है। मै मानती हूँ आज परिस्थिति काफी हद तक परिवर्तित हो चुकी है परन्तु फिर भी नारी को कोई सम्मान नहीं कोई अधिकार आज भी नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ मंदिरो मे आज भी नारी के जाने पर मनाई है। मस्जिदों मे भी महिलाओ के प्रवेश पर रोक है। भगवान के घर मे पूजा अर्चना का अधिकार भी नारी को नहीं दिया गया।

यह कैसी स्वतंत्रता है अपने ही घर मे बेबस लाचार मजबूर नारी ?

भ्रष्टाचार का समाज व देश मे बोलबाला है। सच्चाई को समाप्त कर दिया जाता है। झूठ को सिर आँखो पर बैठाया जाता है।

अस्पतालो मे मरीजो के शारीरिक अंगो को निकालकर बेच दिया जाता है। बीमारी कुछ होती है आपरेशन किसी और बीमारी का कर देते हैं। मुहँ मांगा पैसा लेते हैं।

बेरोज़गारी से युवको की स्थिति अत्यंत खराब है। युवा वर्ग नौकरी व रोज़गार न मिलने पर आत्महत्या कर रहा है।

जो योग्य हैं उन्हें नौकरी नहीं मिल पाती क्योकि वे रिश्वत का पैसा नहीं दे पाते और अयोग्य व्यक्ति रिश्वत देकर नौकरी प्राप्त कर लेते हैं।

महगाँई ने तो सबकी कमर तोड़कर रख दी है।

सोने के भाव देखो आज आसमान को छू रहे हैं। यहाँ खाने को पर्याप्त भोजन नहीं है ऊपर से यह सोने चांदी , आटे, गैस, पैट्रोल के दामों ने तो लोगो की रही सही ताकत ही छीनकर रख दी है।

जिनके पास घर मे एक ही कमाने वाला है वह बेचारा क्या करे? कहीं कहीं पर महंगाई के कारण एक समय का भोजन भी बड़ी कठिनाइयों से मिल पाता है।

आप ही बताइये इतनी परेशानियों के होते हुए हम कैसे अपने आपको स्वतत्रं कह सकते हैं।

आज अपने ही देश मे अपनो के हाथो हम सब कठपुतलियों की तरह नचाए जा रहे हैं। हम सब अपनी इच्छानुसार आज भी ढंग से नहीं जी पा रहे फिर हम अपने आपको कैसे स्वतत्रं कह सकते हैं ?

निष्कर्ष:

जिस अर्थ और भाव के साथ स्वत्रंता संग्रामियों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी और हमारे जीवन को नये उद्देश्य दिए थे हम कहीं-न-कहीं उससे भटक गए हैं। हम भूल गए हैं कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे आज हम इन कुव्यवस्थाओं से सुसज्जित समाज व इसकी सोच के गुलाम है।

हम सब देश वासियो को इन बातों पर गंभीरता से विचार करना करना होगा और स्वतंत्रता के सही मूल्यो को समझना होगा।

कठिन तो है पर असंभव बिल्कुल भी नहीं।

सही अर्थ में हम सब स्वतंत्र तभी कहलाने के अधिकारी होगेंं जब हम समाज को इन कुव्यवस्थाओं से मुक्त करा देगें। हमे अपने मन को उन भावनाओ से स्वतत्रं कराना होगा जो हमे अंधकार की ओर ले जाता है।

स्वतंत्रता हमारा अधिकार है,

खुलकर जीओ और दूसरो को भी जीने दो।


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