Shelly Gupta

Abstract


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नई शुरुआत

नई शुरुआत

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फोन की घंटी लगातार बज रही थी। लता ने लपक कर मोबाइल हाथ में उठाया पर फोन डिस्पले में नंदोई प्रेम का नाम देख उस ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने मोबाइल नहीं बल्कि बिच्छू उठा लिया हो। उसने फोन तुरंत वहीं पास में बैठे अपने पति मुकुल की ओर बढ़ा दिया। उनका भी फोन पर प्रेम का नाम देखते ही मुंह बन गया।

मन ना होते हुए भी मुकुल ने फोन उठाया।और बस नमस्ते ही कह पाया। उधर से प्रेम लगातार बोलना शुरू हो चुका था और मुकुल बस हूं, हां, जी में ही जवाब दे रहा था। चंद मिनटों में ही प्रेम ने अपनी बात कहकर फोन काट दिया और इतनी सी देर में ही मकुल का चेहरा दुख और अपमान से काला सा पड़ गया था।

उसने मोबाइल कान से हटा साइड पर रखा और निढाल सा कुर्सी पर बैठ गया। लता ने हल्के से उसके सिर को सहलाया। उसने कुछ नहीं पूछा मुकुल से कि प्रेम ने क्या कहा। पूछती भी क्या। ये तो आए महीने दो महीने का सिलसिला था।

प्रेम यानी की लता की इकलौती ननद तनु का पति। बड़े ही लालची परिवार में हुई तनु की शादी। अगर शादी होने से पहले मुकुल को जरा सा भी अंदाज़ा लग जाता तो वो शादी रोक देता पर इन लोगों ने शुरुआत में अपनी नेचर का पता ही नहीं लगने दिया। 'बस हमें तो तनु से मतलब है' उनकी इस एक लाइन के मोहजाल में सब फंस गए थे।

उनका असली रंग तो शादी के दो महीने बाद नज़र आया। ऐसे ही एक दिन प्रेम का फोन आया। उसने तनु की खूब बुराई की कि घर में सब दुखी है उस से, आप यहां जल्दी आओ। मुकुल और लता ने अपनी औलाद की तरह मां बाबूजी के जाने के बाद संभाला था। फोन सुनते ही उनके हाथ पैर कांप गए। दोनों फटाफट तनु की ससुराल गए।

वहां जाकर तनु की ससुराल वालों ने उसकी खूब बुराई की। पर लता उनकी बातों में नहीं आई। मुकुल बेशक नौकरी पर चला जाता था पर तनु अपना आधा दिन अपनी भाभी के साथ ही निकालती थी। तो जो लड़की कभी लता को अकेले काम करने नहीं देती थी परीक्षा के दिनों में भी, वो ससुराल में कैसे कामचोरी दिखा सकती है। तनु की आंखों के आसूं लता के दिल को दुखी कर गए। उसे तनु के कुछ बोले बिना मामला समझ आ गया था। किसी तरह उन्होंने सारा मामला ठंडा किया और जाते हुए काफी सारा सामान और सारे परिवार को शगुन देकर वो दोनों वापिस लौटे। शगुन मिलते ही तनु के ससुराल वालों के बर्ताव में फर्क आ गया। दो महीने सब शांत फिर वही ड्रामा शुरू। दो साल की शादी में यही सब चल रहा था। खूबसूरत सी तनु एकदम कुम्हला सी गई थी। फिर भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती कि भाई भाभी को तंग ना होना पड़े। पर लालची लोगों के सामने उसके सारे प्रयास कम पड़ जाते।

बड़ा मन करता था लता का कि सबको सुनकर तनु को वापिस ले आए पर उसे डर लगता था कि सब यही कहेंगे कि मां बाप होते तो यूं तनु का घर ना उजड़ने देते। बस इसी लोक लाज के डर से मुकुल और लता तनु को दुखी देखते रहे।

आज भी प्रेम का फोन रख मुकुल फफक पड़ी और दोनों तनु की ससुराल जाने की तैयारी करने लगे। जैसे ही दोनों वहां पहुंचे , तनु की सास हमेशा की तरह तनु की बुराइयां करनी शुरू हो गई। पर इस बार लता का सारा ध्यान तनु की ठोढ़ी के पास पड़े नील पर लगा रहा। उसने तनु की सास की बात बीच में ही काट दी और तनु से पूछा कि ये निशान कैसे पड़ा।

लता के इस प्रश्न से सब सकपका गए और लता को अपना जवाब मिल गया। उसने तनु का हाथ पकड़ अपने गले से लगा लिया और उसकी सास और प्रेम को बोली, " अब तक हम लोक लाज के डर से आपकी बदतमीजियां बर्दाश्त कर रहे थे। पर आपकी इतनी हिम्मत कैसे हुई हमारी तनु पर हाथ उठाने की। आपने हमारी शराफत का नाजायज फायदा उठाया पर हम अपनी बेटी को और इस घर में सड़ने के लिए नहीं छोड़ सकते। आप हमारा शादी से लेकर अब तक किया हुए सारा खर्चा शराफत से हमें वापिस कर दीजिए और तलाक के पेपर्स हम जाते ही भिजवा देंगे।"

इतना कहकर लता ने तनु को अपना सामान बांधने को कहा और बोली, " ये हमारी गलती थी जो हम अब तक चुप रहे। पर अब और नहीं। तुम खुद इतनी सक्षम हो कि अपने पैरों पर आराम से खड़ी होकर खुशहाल और इज्जतदार ज़िन्दगी गुज़ार सको। इसी लिए तुम्हें अच्छे से पढ़ाया था ताकि तुम कल को किसी की मोहताज ना रहो। अब चलो और घर चलकर अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत करो।"


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