Yashwant Rathore

Abstract Romance Fantasy


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Yashwant Rathore

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मनोरमा

मनोरमा

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मनोरमा, नहीं यह उसका नाम नहीं है लेकिन उसे देखते ही जो पहला  नाम मन में उभरता है, वह है मनोरमा।

जैसे किसी रेलवे स्टेशन के एक छोटे से बुक स्टॉल में रखा बड़ा सा नॉवेल जिस पर एक नायिका की पेंटिंग बनी हो।

मनोरमा जिसे देखकर और देखने का मन करता है। साथ बैठकर घंटों बतियाने का मन करता है, बस वह बोलती जाए और मैं सुना भर करू।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका ऑरा, आभास आप में जीवन भर देता है।  

मनोरमा को जोधपुर जैसे छोटे से शहर में आज से 3 साल पहले एक ड्रामा टीचर मिल गए थे,  जीवन को जैसे पंख मिल गए,  जैसे नई बारिश ने मन को तृप्त कर दिया हो।

उसका बैच शाम का है लेकिन एक प्ले के रिहर्सल, प्रैक्टिस के लिए वह आज  जल्दी आ गई । दोपहर में 'गुरु जी' का नया बैच भी शुरू हुआ है।

मनोरमा ने क्लास में कदम रखा तो नए स्टूडेंट ' राज' से नजर टकरा गई। मन जैसे स्वच्छंद हो मनमाना व्यवहार करने लगा। सीने की धड़कन बढ़ गई और वह असहज सी हो गई जैसे उसकी आंखें न चाहते हुए भी राज को देखे जा रही थी।

 25 साल की मनोरमा से उसका मन तीसरी बार यह गुस्ताखी कर रहा था। 4 साल पहले जब वह 21 की थी तब वह उसका पहला अनुभव था।

वह अपने को- एक्टर से क्या और क्यों बोले जा रही थी उसे पता ना था। क्यों उसकी आवाज इतनी उठी हुई थी, शायद राज को सुनाना चाह रही थी लेकिन बोलने के बाद उसे यह भी लग रहा था कि उसे यह सब नहीं बोलना था।

तीन बहनों में सबसे बड़ी है मनोरमा। लड़का ने होने की वजह से मां-बाप का सारा ग़ुस्सा मनोरमा पर ही ज़्यादा निकलता था । एक वजह पैसों की तंगी भी थी।

इन सब बातों का मनोरमा पर कम ही असर होता था। वह अपने में आत्ममुग्ध थी। आईना उसे अपने आप से प्यार करवा देता था और लोगों की नज़रें भी उसे यह अहसास करवा देती थी।

उसकी काली गहरी आंखें जैसे एक नजर से सबको बांध देती, आंखों में समा जाने का मन करता, जीवन कितना सघन और गहरा है उसकी आंखें यह आभास करवा देती। उसके लंबे घने बाल जहां सम्मोहित करते हैं, वही  मासूम सा चेहरा जीवन रस से भरपूर हैं।

कुछ चेहरे सुंदर या सामान्य में मापे नहीं जा सकते। वह बहुत आकर्षित लुभाने वाले व अलग ही तरह के होते हैं। 

बहुत चंचल होते हुए भी उसमें एक ठहराव सा है, जो उसे और मनभावन बना देता हैं।

उसके पास दो तीन कपड़ों की ही जोड़ी थी लेकिन साफ, साधारण कपड़े उसे और  रूपवान बना देते हैं।  उसकी छोटी बिंदी उसे और मुग्धवान बना देती हैं।

ऐसे ही कॉलेज का सबसे स्मार्ट व अमीर लड़का समीर भी उस पर लट्टू हो बैठा। मनोरमा खुद भी उसकी तरफ आकर्षित थी लेकिन कुछ सोच कभी भी आगे न बढ़ी। लेकिन जब समीर ट्राई करता रहा तो एक दिन वह हंस पड़ी और उसकी दोस्ती स्वीकार कर ली।

महीनों कैसे निकल गए, पता ही ना लगा। घंटो -घंटो मनोरमा समीर के कंधे पर सिर रख, उससे बतियाती रहती।  समीर आगे बढ़ना चाहता था लेकिन मनोरमा को अपने बहनों की, घर की फिक्र होने लगती।

समीर ने जब शादी का वादा किया तो उसे लगा जैसे जिंदगी ने अपनी बाहें उसके लिए खोल दी हो।समय पंख लगा के उड़ रहा था और जीवन प्रेम की महक से परिपूर्ण था कि एक दिन समीर ने अपनी शादी का कार्ड थमा दिया।

मनोरमा का मन बंजर भूमि की तरह टुकड़े टुकड़े में बंट सा गया। बहता जीवन ठहरे हुए पानी की सी दुर्गंध देने लगा।

अपना दर्द वह अपनी दोस्त रिचा के अलावा और किसी को भी बता न सकी, न ही बहनों को बता सकती थी, ना ही माता-पिता को। जहर को गले में ही कैसे रोका जाता है, वह अब समझ पा रही थी।

रिचा ने उसे डांस क्लास या सिंगिंग कुछ ज्वाइन करने को कहा ताकि उसका ध्यान भटक जाए लेकिन हताशा ने उसकी ऊर्जा छीन ली थी।रिचा उसे अपने साथ थिएटर क्लास ले जाने लगी। मनोरमा का ध्यान कुछ देर के लिए अपने से हट जाता था।

 वह धीरे-धीरे क्लास में घुलने मिलने लगी। तीन महीनों के बाद भी जब वो अभिनय में अच्छा नहीं कर पा रही थी तो गुरुजी ने उससे एक दिन अकेले में बात की। जिसे थिएटर एक्सरसाइज में कोर्ट मार्शल कहा जाता है, हालांकि यह एक्सरसाइज सबके साथ में होती है लेकिन मनोरमा की हालत देख गुरुजी ने अकेले में ही बात करना ठीक समझा।

पहले तो वह सकपकाई लेकिन धीरे-धीरे खुलने लगी। एक घंटे बाद आंसु अनवरत बह रहे थेेे । गुरुजी संभालने आये तो उनसे लिपट के 20 मिनट तक रोती रही।

अगले दिन से उसके अभिनय में जैसे चमत्कार सा हो गया। थिएटर क्लास उसमें एक नया जीवन भर रही थी। उसकी लगन देख गुरुजी भी उसकी तरफ ध्यान देने लगे।

22 साल की मनोरमा, 41 साल के गुरु जी से अत्यधिक प्रभावित हो गई। उसका मन फिर मनमाना व्यवहार करने लगा। उसकी आंखें गुरुजी को एकटक देखा करती। उनके बुद्धि से, विचारधारा से वो अत्यंत आकर्षित हो गई, उनके विचारों ने मनोरमा के जीवन को भी नई राह दी थी।

थिएटर करने से मनोरमा अपने बारे में भी ज्यादा जागरूक हो गई थी। आंगिक और वाचिक ने उस में बहुत सुधार किए। जल्दी-जल्दी बोलने वाली मनोरमा, धीरे-धीरे सहज तरीके से बात करने लगी। भाषा शुद्ध होने से कई गणमान्य लोग भी उसे आदर देने लगे।

आज उसका जयपुर में प्ले था। 200 लोगों के सामने उसने परफॉर्म किया, तालियों की गड़गड़ाहट सुन मनोरमा की आंखों से अश्रु बहने लगे, वह घंटों रोयी.

आज वह जीवन का धन्यवाद कर रही थी। चांद, तारे, रात का धन्यवाद कर रही थी। बहती हवा उसके तन से टकरा उसे सुख दे रही थी। शीतल हवा सांसो में घुल उसे सुकून दे रही थी।

अगले दिन सुबह जल्दी ही वे अपने गुरु जी के कमरे में पहुंची तो कमरे में कोई और न था। गुरुजी के गले लगी, कस के उन्हें गले लगाया। प्रकृति हावी हो गई......, ऐसा बस एक ही बार हुआ।

थिएटर क्लास की फीस देने के लिए और घर को संभालने के लिए मनोरमा ने एक नौकरी भी ज्वाइन कर ली थी। वहां एक अच्छा दोस्त मिला, सौरभ। सौरभ की तरफ वो अट्ट्रैक्ट तो नहीं थी लेकिन उसकी परिपक्व बातें और उसके व्यवहार पर उसे भरोसा हो गया था।

सौरभ उससे शादी भी करना चाह रहा था और उसने कभी उसे छूने की कोशिश भी नहीं की।

सब ठीक ही चल रहा था कि मनोरमा की नजर आज राज से टकरा गयी। पता लगा कि राज शादीशुदा है और उससे 5 साल बड़ा भी, फिर भी उसका मन उससे बातें करने को, उसके नज़दीक जाने को बेचैन हो उठता।

क्या यह जीवन उसे ऐसे ही आश्चर्यचकित करता रहेगा ?

 क्या उसे जीवन से मुंह फेर लेना चाहिए ? 

सौरभ के लिए उसने कभी वो महसूस नहीं किया जो समीर या राज को देखकर उसे महसूस हुआ।

क्या मनमाना व्यवहार उसे समाज में उचित स्थान देगा या उसे सौरभ के साथ जिंदगी में आगे बढ़ना चाहिए, शायद नीरसता के साथ।

सोचते हुए कभी उदासी और कभी मुस्कुराहट के भाव, उसके चेहरे पर आ जा रहे थे।


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