Navneet Gupta

Abstract


3.6  

Navneet Gupta

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मक़सद

मक़सद

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  ये सब क्या सुनाने बैठ गये भाई!’’ सदैव से मौक़े आते रहे हैं जब हम वो अलग दूर रहे।

:स्वतन्त्रता सैनानियों ने कुछ कांड किया, अंग्रेज़ी सेना से बचने को कहीं भूमिगत हो गये।

:गर्भवती मांये, तुमने देखा होगा बाज़ार से ग़ायब हो, घर की चहारदीवारियों में पसन्द करने लगती हैं।

साधारणता से परे कुछ संवेदनशील बात करें तो, :हम सब माँ के गर्भ में पूरे नौ महीने, और कुछ ऊपर ही बंधी दीवार में विसरे रहते हैं, और हम जिस ने उतावलापन दिखाया.... उसका हस्र तुम जानते सुनते होंगे! :मेरे ताऊ, उस वक्त उम्र रही होगी ६० बरस, किसी घरेलू वारदात में बिला वजैह नामज़द हो गये थे, मान सम्मान बचाने को गिरफ़्तारी से बचने को दिन प्रतिदिन स्थान बदलते,भूमिगत रहे।

:इतिहास में अंकित है, शिवाजी ने अपने को युद्ध की तैयारी में कितना क्वैरैन्टाईन किया था।

   समय समय पर मतलब , संज्ञा बदलती रहीं है, लेकिन पात्र नर मादा और परिवार रहे, कभी शत्रु से बचने, कभी शत्रुता निभाने, कभी चैचक प्लेग माता से बचने, और कभी अपने मान सम्मान को बचाने. :आज भी अनेक सेलेब्रिटीज़ मिलेंगी जो खुद को बचाये फिरती हैं, :छुप छुप के रहना हमारी रूमानी ज़िन्दगी में भी कम नहीं रहता, और कभी :बचपने में अपनों से रूठकर कमरों में छुपते रहे हैं__अपनों से ही दूरी बनाते रहे हम।

और अब तो बड़ा ही बड़ा सा हो गया, बीसवीं सदी के सन २०२० में, सारी दुनिया को बचना, छुपना पड़ रहा है, अपनों से ( सच तो ये है कि ये भी काल्पनिक हैं), सब अपनी अपनी बचाते फिर रहे हैं और सामाजिकता की दुहाई दे ज़रूर रहे हैं, लेकिन डरे डरे से ।

बाबजूद इस सब के , भाईयों के मक़सद , एक बार फिर विभाजित से कर रहे हैं _मजबूरी में इकट्ठे हुए विश्व मानवों के ध्रुवीकरण को होते दीखते! वैश्विक आधिपत्य के मक़सद से, चीन अमेरिका। विपक्ष की भूमिका के अस्तित्व को बनाये रखने के मक़सद से सोनिया_राहुल_अखिलेश ( बेशक आज के परिवेश में वो इतने आवश्यक नहीं हैं) धर्मावलंबियों के लिये धर्म को लक्षित करते शब्द प्रयोग (शायद कुछ छोटे वर्ग नाम से सुलभ काम चलता) , कर्मचारी नेताजी के छोटे से डी ए रोकने पर विरोध स्वर__ जो कल धमकी हो सकता है, उनका अपना मक़सद है।

आज जब सब कुछ भुला कर सिर्फ़ और सिर्फ़, कोरोना के निजात के पथ पर बढ़ते कदम पर चलेंगे या अपने अपने निहित मक़सदों को पूरा करने के वास्ते एक बार फिर , बड़े बड़े विकास लीला की आड़ में प्रकृति से खिलवाड़ करेगें।

कहीं ऐसा ना हो, कोरोना का बाप , कोई और विषाणु दस्तक दे।

पहिले तो इसके इसी वर्तमान संस्करण से पूरी तरह निपट लो।

 , तो भाई, मेरे पाठक आप यहाँ तक पढ़ने के विचरण में आ गयें हैं तो समझ गये होंगे मेरा मक़सद, इस संबोधन का नाम मक़सद’ रखने का ! लक्ष्य रखता तो आप सरकारी शब्दावली समझ कर आगे ही नहीं आते।

नेता, धर्म , पंथ सब छोड़कर मानव हित में सरलीकृत, सुखद , स्वच्छ संवेदनशीलता की ओर बड़े हमारी स्वीकार्यता की और बढ़ती जीवन शैली के कदमों को हौंसला दीजिये। कितना अच्छे लगने लगे हैं , ये दिन रात ये धरती आकाश ये पक्षी ये मन और धराशायी सम्मपन्नतायें!

मेरा म क स द बस यही है, तुमसे रूबरू होने का।

अभी कुछ सप्ताह और सामाजिक विच्छेद में रहना है।



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